जिउतिया..

सुबह सुबह माँ का फोन आया। पिछले कई वर्षों का क्रम है कि जिउतिया के दिन प्रातःकाल में फोन आता है, मैं अधनींदा फोन उठाता हूँ, वो फोन पर ही जिउतिया पहनाने का यत्न करती है, मैं वर्चुअल जिउतिया के गले में डाले जाने की कन्फर्मेशन देता हूँ, फिर आशीर्वादों की अंतहीन श्रृंखला.. यह क्रम तब भी कायम रहा जब ग्रेजुएशन के दौरान हॉस्टल में मोबाइल पर प्रतिबन्ध रहा। एक दिन के लिये छुप-छुपाकर फोन लाया करता था। अब सोचता हूँ जब टेलिकॉम क्रांति नहीं हुई थी तब परदेस में बैठे बेटों की माँए कैसे जिउतिया मनाती होंगी..? फिर गाँव में बीता बचपन याद आ जाता है, और आज के दिन पोखरे में मचने वाली धमाचौकड़ी.. मुस्कराते हुए सोच रहा हूँ कि कभी अपने ग्राम्य-बचपन के संस्मरण लिखूंगा। क्या पता एक और लपूझन्ने का पोटेंशियल छुपा हो.. सनातन कालयात्री (आपको टैग नहीं कर पा रहा हूँ) आज सुनने के लिये कोई गीत बतायेंगे क्या..?

ए सैटरडे (A Saturday)


कल एक ऐसी घटना से साबका हुआ कि अब तक दिमाग उसी में उलझा हुआ है।

शनिवार दिन होने के नाते कल सभी पाँचों मित्र- विवेक, धीरेन्द्र, एके, आनन्द और मैं सब्जी लेने साप्ताहिक बाजार गये हुए थे। बाजार का सबसे अच्छा समय रात को होता है, तो करीब 8 बजे हम सभी बाजार में टहल-घूम रहे थे। एक दुकान पर कई सारी हरी सब्जियाँ थीं, तो हम बैठकर छाँटने लगे।

तभी मेरे पीछे आठ-नौ साल का एक बच्चा अपना थैला लिये आकर खड़ा हुआ और बड़ी मासूमियत से पूछा कि- “लौकी कैसे है..?” दुकानदार ने तीस के भाव बतलाए। बच्चे ने दुबारा पूछा- “कम नहीं होगा?” उसकी मासूमियत को देखते हुए हम लोगों ने दुकानदार से पैसे कम करने को कहा, वह भी तुरंत 25 में देने को तैयार हो गया। और उसे इंतजार करने को कहकर हमारी सब्जी देने लगा। बच्चा मेरे पीछे कुछ यूँ खड़ा था कि उसका थैला मेरे आगे फैला हुआ मुझे आधा ढँक रहा था।

तभी मुझे अपनी शर्ट की जेब में कुछ सरसराहट सी महसूस हुई। मुझे लगा कि मेरा गैलेक्सी S-2 वाइब्रेट कर रहा है, मैनें हाथ लगाकर चेक किया, मेरा वहम मात्र था। मैं शिमला मिर्च छाँटने हेतु आगे झुका, तभी वह सरसराहट दुबारा हुई। सचेत मस्तिष्क ने सुझाया कि मामला कुछ गड़बड़ है। मैनें कनखियों से देखा तो लगा कि वह बच्चा असहज रूप से आगे की ओर झुका हुआ है। मुझे मामला समझते देर नहीं लगी, लेकिन स्वाभाविक रिफ्लेक्स एक्शन को रोकते हुए मैनें प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया। हम सब्जियाँ लगभग ले चुके थे, लेकिन मैनें कुछ समय और व्यतीत कर कोशिश की कि उसे फोन चुराने का पूरा अवसर मिले। मैनें जबरदस्ती और सब्जियाँ लेने का निर्णय किया। मित्र समझ नहीं पा रहे थे कि मामला क्या है। बच्चे और अन्य का ध्यान बँटाते हुए मैनें शर्ट की तंग जेब में फँसे मोबाइल को ढीला किया और अगले 10-15 सेकेण्ड उसके उत्साहित हाथों से मोबाइल चुराये जाने की प्रक्रिया का आनन्द लेता रहा। साथ ही बगल में खड़े विवेक को फुसफुसाकर पीछे चल रही गतिविधि के बारे में बताया। वे सब चतुराईपूर्वक उसके पीछे खड़े हो गये। दुर्भाग्यवश जेब उसकी कल्पना से ज्यादा चुस्त निकली। हताश होकर मुझे तीन-चौथाई बाहर निकले फोन से ही संतोष करना पड़ा और पलटकर उसका हाथ पकड़ लिया। हम सब उसे लेकर अगले 20 मिनट बाजार में टहलते रहे और अपने सामान खरीदते रहे। बच्चे के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। न ही भय, न भागने का प्रयास, न रोना-गाना। पहली बार में ही उसने स्वीकार कर लिया कि वह चोरी करने का प्रयास कर रहा था।

किनारे लाकर पूछताछ करने पर उसने अपना नाम रोहन बताया। पुरानी दिल्ली स्टेशन पर माँ-बाप के साथ रहता है। वे भागलपुर के रहने वाले हैं, जगह कोई साहबगंज। दोनों मजदूरी करते हैं, वह स्कूल नहीं जाता, चोरी करता है। आज पहली बार फोन चोरी करने का प्रयास कर रहा था, बोहनी बिगड़ गई। माँ का फोन नंबर दिया।

बात करने पर उसकी माँ अनीता ने बताया कि वह अपने पति की तबीयत खराब हो जाने के कारण भागलपुर वापस आ गई है और रोहन उसी के साथ है। दुबारा कड़ाई से पूछने पर उसने कहा कि वह बच्चे को उसकी मौसी के सुपुर्द कर आई थी कि उसे कुछ दिन बाद भागलपुर पहुँचवा दे। वे बहुत गरीब हैं, एक बच्चा गोद में है आदि रोना धोना.. हम उसके बेटे को छोड़ दें और पुलिस के पास न ले जायें। दाल में कुछ काला पाकर मैनें कहा कि बच्चा पहले ही पुलिस को सौंपा जा चुका है और वे मुखर्जीनगर थाने में आकर बच्चे को रिसीव कर लें। उसने अपनी दूरी का रोना रोया और कहा कि हम बच्चे को छोड़ दें।

रोहन और उसकी माँ की बातों में कई विरोधाभास देखकर हमने मामले को आगे बढ़ाने का निश्चय किया। पुलिस की एक पैट्रोलिंग पार्टी आई, जिसे सारी स्थिति समझाई गई। लेकिन दिल्ली पुलिस की लिंग व बच्चों के प्रति संवेदनशीलता के खराब ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए मुझे बच्चे को सीधे उन्हें सौंपने में कोई समझदारी नहीं दिखी। मैनें चाइल्डलाइन को 1098 पर फोन किया, और उन्हें सारी स्थिति समझाई। उन्होंने इस क्षेत्र में काम करने वाले संबद्ध एनजीओ ’प्रयास’ से मुझे कनेक्ट किया। उनसे बात करता-करता मैं थोड़ा आगे आ गया तभी सेकेण्डों में एक विचित्र घटना घटी—

मेरे फोन पर लगे होने के दरमियान बच्चे ने मित्रों व पुलिस को बताया कि वे दो-तीन एक साथ काम करते हैं। एक ऑटोवाला उन्हें रोज सुबह लाकर किसी बाजार में छोड़ता है, और शाम को वही वापस ले जाता है। उनके वापस जाने का समय हो चुका है, अत: वो ऑटो उसे ढूँढ रहा होगा।

बाकी मित्र व पुलिस पार्टी जहाँ खड़े थे वह रास्ता आगे जाकर डेड-एंड में समाप्त होता है। बच्चे के बताने के दो-तीन मिनट के भीतर उसी डेड-एंड की तरफ से एक ऑटो तेज गति से आता दिखा और बच्चे ने चिल्लाकर बताया कि यह वही ऑटो है। कॉन्सटेबल ने उसे रुकने का इशारा दिया, तो ऑटो बेहद तेज गति से भागने का प्रयास करने लगा। पैट्रोलिंग पार्टी ने गाड़ी दौड़ाकर उसे पकड़ लिया। वह इस बात का कोई संतोषजनक उत्तर दे पाने में अक्षम था कि आखिरकार वह किस तरफ से आ रहा था? उसने बच्चे को पहचानने से इनकार किया, बच्चे ने उसकी शिनाख्त करते हुए बताया कि वह उसी के घर में रहता है। ड्राइवर के पास न तो कागज़ात पूरे थे, न ही ऑटो मालिक के फोन नम्बर पर बात हो पा रही थी। वह कसमें खा रहा था कि वह बच्चे को नहीं जानता, बच्चा अड़ा हुआ था कि वह उसी के घर में रहता है। यह पूछे जाने पर कि ड्राइवर के घर में कौन-कौन है, उसने बताया कि उसकी बीवी और बच्चे। ड्राइवर ने तुरंत कहा कि उसकी तो शादी ही नहीं हुई है, हम चाहें तो तस्दीक कर लें। थोड़ी देर बाद वह अपनी बात से पलट गया, कि शादी तो हुई है लेकिन कोई बच्चा नहीं है। वह अब बुरी तरह से फँस चुका था और मामला सुलझता नजर आ रहा था।

मैनें एनजीओ ’प्रयास’ को दुबारा संपर्क किया और उनसे आगे की कार्यवाही के बारे में पूछा। उन्होंने मुझे बच्चे को पैट्रोलिंग पार्टी को सौंप देने को कहा। पार्टी का फोन नंबर लेकर मैनें बच्चे को उन्हें सौंप दिया और हम सब बातचीत करते 9 बजे घर लौट आये।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी। घर लौटने के आधे घंटे के भीतर पुलिस ने मुझसे संपर्क किया और कॉलोनी के बाहर आने का अनुरोध किया। इस बीच उसकी माँ ने मेरे फोन पर कॉल करके बच्चे को दुबारा छोड़ देने का अनुरोध किया, अपनी ग़लती की माफी माँगी और अपनी ग़रीबी की दुहाई दी।

मैं जब बताई जगह पहुँचा तो पुलिस पार्टी, ऑटोवाला, बच्चा आदि सब हमारा इंतजार कर रहे थे। पता चला कि बच्चा साफ झूठ बोल रहा था। ऑटोवाला निर्दोष था। बच्चे ने बताया कि उसका मौसेरा भाई उसका हैंडलर है। उन्होंने उसे सिखा रखा है कि पुलिस के चंगुल में बेतरह फँस जाने पर दिखने वाले पहले ऑटो की तरफ इशारा कर दो।

तुरत-फुरत एक योजना बनी। फोन को स्पीकर पर रखकर बच्चे ने अपने मौसेरे भाई को कॉल किया और उसे लंबा हाथ लगने की सूचना दी। मौसेरे भाई ने बताया कि वह करनाल बाईपास पर है और दो घंटे से पहले वहाँ नहीं पहुँच सकता। लेकिन थोड़ी देर बात करने के बाद उसे शक हो गया और उसने फोन काट दिया। कॉन्स्टेबल के नौसिखियेपन ने एक संभावित लीड खत्म कर दी। अबतक मामला इतना ज्यादा उलझ चुका था कि समझ आना बन्द हो गया था कि कौन सही है कौन गलत? बच्चे द्वारा बताई जाने वाली हर बात दस मिनट के भीतर गलत साबित हो जा रही थी। उन्होंने मुझसे थाने चलकर आधिकारिक रपट दर्ज कराने को कहा। मैनें उनकी बात मान ली और उन्हीं के साथ तीमारपुर थाने पहुँचा।

विवेचक मुकेश कुमार (एस.आई) ने हमारा स्वागत किया। उन्होंने अबतक की प्रगति हमें बताई (जो हमें पहले से मालूम थी) और पूछा कि हमलोग इस मामले में आगे किस तरह बढ़ना चाहते हैं?

यह एक जटिल प्रश्न था। चाइल्डलाइन को फोन करने और आगे के आपाधापी वाले दो-तीन घंटों में हमें ठंडे दिमाग से विचार करने का मौका नहीं मिला था। पुलिस प्रणाली का एक हिस्सा होने के बावजूद मेरे मन में स्वाभाविक भय था कि औपचारिक शिकायत का बच्चे का भविष्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि हम एफ.आई.आर दर्ज कराते तो निश्चित रूप से वह बच्चा अवैध हाथों में जाने से बच जाता। फिर उसकी पृष्ठभूमि की पूरी जाँच होती, यदि वह किसी रैकेट या सिंडिकेट का हिस्सा होता तो उसका पर्दाफाश होने की संभावना थी, वह ट्रायल होने तक किसी शेल्टर में रहता न कि थाने में।

दूसरी तरफ औपचारिक शिकायत करने का भय यह था कि दोषसिद्धि पर उसे बाल/किशोर सुधार गृह में भेजा जाता। जहाँ से 99% संभावना थी कि वह एक शातिर अपराधी बनकर निकलता। (इन सुधार गृहों का ट्रैक रिकॉर्ड हताशाजनक स्तर तक खराब है) पुन: एन.जी.ओ. के कार्यकरण पर भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता था। रैकेट का पर्दाफाश इस बात पर निर्भर करता कि विवेचक ने तफ्तीश कितनी गहराई में जाकर की है और चार्जशीट कितनी मजबूत है?

इन सबको देखते हुए सामने मौजूद बच्चे का भविष्य बचाना एक चिंता की बात थी। यदि हम अपनी शिकायत वापस लेते तो बच्चा अपने विधिक अभिभावक/माँ-बाप को सौंप दिया जाता। ऐसी स्थिति में आगे कोई औपचारिक तफ्तीश नहीं होती, लेकिन वह सुधार गृह जाने से बच जाता। यह एक अच्छी स्थिति थी, लेकिन इसमें डर यह था कि माँ-बाप के आने तक बच्चा पुलिस अभिरक्षा में रखा जात्ता, जहाँ उसके साथ जाने कैसा सुलूक होता? और सबसे बढ़कर यदि उसके अभिभावक ही उसके हैंडलर हुए तो क्या? कहीं पुलिस अपना पल्ला झाड़ते हुए उसे किसी ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे को सौंपकर ही निश्चिंत न हो ले।

लेकिन विवेचना अधिकारी मुकेश का व्यवहार आश्चर्यजनक रूप से ग़ैर-पुलिसिया लगा। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि वे अपने स्तर से अनौपचारिक तफ्तीश किसी औपचारिक तफ्तीश से ज्यादा गंभीरता से करेंगे तथा बच्चे को उसके स्थानीय अभिभावक को नहीं बल्कि उसके असली माँ-बाप को ही सौंपा जायेगा। तथा इस दरम्यान बच्चा किसी सज्जन के घर पर रहेगा।

मुझे पता था कि इन दावों/वादों के गलत साबित होने की संभावना बहुत ज्यादा है लेकिन दूसरे विकल्प में उसके भविष्य के बर्बाद होने की संभावना कहीं ज्यादा लग रही थी। यह एक एथिकल डाइलेमा था, जिसमें कानून/नैतिकता का झुकाव पहले विकल्प की तरफ स्पष्टत: था, लेकिन हम लोगों ने अंतरात्मा की आवाज पर ज्यादा भरोसा करते हुए मुकेश जी की सद्भावना पर दाँव लगाने का निश्चय किया। फोन नंबरों तथा जानकारी के आदान-प्रदान हुए और मैनें लिखित तौर पर अपनी शिकायत वापस ली। मुकेश ने हमें धन्यवाद दिया और हम रात के 11:30 बजे घर वापस लौटे।

सोचा था कि मामले से जुड़ी कुछ तस्वीरें भी पोस्ट करूँगा, लेकिन मन नहीं कर रहा। शायद फिर कभी..

अपडेट: रात के 3:30 बजे मेरा फोन बजा। मुकेश का फोन था। वे 4 बजे मेरे कमरे पर आये, नींद से जगाने के लिये माफी माँगी। मुझे जो बात बताई, उसका शक तो था लेकिन सुनकर पाँव तले जमीन खिसक गई। जिनका दावा बच्चा कर रहा है, वे उसके माँ-बाप नहीं हैं। उन सबके फोन अब बंद हो चुके हैं। वह शायद अनाथ है या बहुत पहले अपहृत। फिलहाल उसके बांगलादेशी होने की संभवानाएं टटोली जा रही हैं। मुकेश मुझे अपडेट देकर, दुबारा माफी माँगकर, एक गिलास पानी पीकर सीढ़ियों से नीचे उतर चुके हैं। मैं नीचे देखता हूँ, बच्चा अँधेरे में उनका हाथ पकड़कर चल रहा है। दिल्ली पुलिस का यह दुर्लभ मानवीय चेहरा ड्यूटी खतम होने के बाद भी पसीने से लथपथ दौड़धूप कर रहा है और मुझे महसूस हो रहा है कि शायद मेरी अंतरात्मा ने सही सलाह दी थी। जानता हूँ कि अभी उम्मीद करना Hopelessly Early होगा, लेकिन एक चुटकी उम्मीद अभी कायम है।
     

घर बैठे थ्री-डी सिनेमा का आनंद उठायें, बिना थ्री-डी टीवी के, 30 रुपयों से भी कम में..

एक लंबे अंतराल के बाद ब्लॉग पर कुछ लिखना हो रहा है, तो मैनें सोचा कि कुछ ऐसा लिखा जाय जिससे पाठकों को कुछ लाभ हो। आजकल त्रिविमीय (थ्री-डी) फिल्में बहुत चर्चित हो रही हैं। ’ऐवेटॉर (अवतार)’ की भारत में बेहद सफलता के बाद यह विधा लोकप्रिय हुई थी, और ऑस्कर विजेता ’लाइफ ऑफ पाई’ के बाद इस विधा का क्रेज और अधिक बढ़ गया है।   

आप में से जिन लोगों ने थियेटर में त्रिविमीय सिनेमा का आनन्द लिया होगा, वे उस शानदार अनुभूति के बारे में सोचकर आज भी आनन्दित हो उठते होंगे, जब पहली बार कोई तीर मानों स्वयं उन्हीं को आकर लगा होगा, या जेक सली के अवतार के साथ जब उन्होंने इकरान की पीठ पर पांडोरा के पहाड़ों की यात्रा की होगी। थ्रीडी सिनेमा के टिकट सामान्य से ड्योढ़े-दुगुने महँगे अवश्य होते हैं, लेकिन उस रोमांच के लिये इतना खर्च करना ग़ैरवाज़िब नहीं लगता।

समस्या उनके साथ है, जिनके शहरों में थ्रीडी सिनेमा न हों। वे थ्रीडी टीवी खरीद सकते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश अभी बाजार में जो सस्ते से सस्ते थ्रीडी टीवी के मॉडल उपलब्ध हैं, वे भी पचास हजार रुपयों के नीचे नहीं हैं।

लेकिन इन समस्याओं का मतलब यह नहीं कि आपको थ्रीडी सिनेमा (या तस्वीरों) का आनन्द उठाने का अधिकार नहीं है। सिर्फ़ थोड़ी सी आँखों की कसरत से आप आसानी से घर बैठे शून्य या न्यूनतम खर्च में थ्रीडी का आनन्द ले सकते हैं.. न तो किसी थ्रीडी सिनेमाहाल में जाने की जरूरत है, न ही महँगी टीवी खरीदने की। कैसे..? आइये देखते हैं..

सबसे पहले यह जानने की कोशिश करते हैं कि हमारी आँखें कैसे काम करती हैं..

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सामान्य धारणा के विपरीत हमारी आँखें थ्रीडी नहीं देख सकतीं.. हमारी आँखें कैमरे की तरह काम करती हैं- पुतलियाँ लेंस की तरह और रेटिना (जिसपर प्रतिबिंब बनता है) कैमरे की फिल्म या पर्दे की तरह। रेटिना पर बना यह प्रतिबिंब द्विआयामी (2डी) होता है। लेकिन जब हम दोनों आँखों से देखते हैं, तो हमें एक ही वस्तु के दो अलग दृष्टिकोण से (चूँकि दोनों आँखें थोड़ी दूरी पर स्थित हैं) चित्र मिलते हैं। दोनों चित्रों में वस्तु की लम्बाई-चौड़ाई का समान, लेकिन तीसरी विमा (गहराई) का अलग-अलग ज्ञान प्राप्त होता है। मस्तिष्क के विजुअल कॉर्टेक्स दोनों चित्रों को मिलाकर एक संयुक्त चित्र बनाते हैं जिसमें हमें तीसरी विमा का भी आभास होता है।


एक ही वस्तु के दोनो आँखों से अलग-अलग प्रतिबिंब

यही सिद्धांत अपनाकर थ्रीडी सिनेमा को एक द्विआयामी पर्दे पर दिखाया जाता है। थ्रीडी सिनेमा की सभी प्रचलित तकनीकों में दोनों आँखों को एक ही वस्तु/घटना के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से अलग-अलग चित्र दिखाये जाते हैं और बाकी का काम दिमाग पर छोड़ दिया जाता है कि वह दोनों चित्रों को मिलाकर एक संयुक्त चित्र का निर्माण करे जिससे दर्शक को यह आभास हो कि वह एक निष्क्रिय व्यक्ति की तरह सिनेमाहाल में बैठा कैमरे द्वारा खींचे गये द्विआयामी चित्र नहीं देख रहा है, बल्कि सिनेमैटोग्राफर की जगह स्वयं फ्रेम में खड़ा अपनी आँखों से त्रिआयामी चित्र देख रहा है। अलग-अलग तकनीक में अलग-अलग विधि से यह कार्य किया जाता है।

 
पैनासॉनिक स्टीरियोस्कोपिक कैमरा
सभी तकनीकों में एक ही फिल्म को दो अलग-अलग (स्टीरियोस्कोपिक) कैमरों से शूट किया जाता है, जो थोड़ी दूरी पर (ताकि दोनों चित्रों में एक कलान्तर Phase Difference हो) एक ही क्षैतिज तल में स्थित होते हैं। एक कैमरे का चित्र बाईं आँख को दिखाया जाता है, और दूसरे कैमरे का दाईं आँख को.. इस प्रकार मस्तिष्क को मूर्ख बनाकर यह वहम स्थापित किया जाता है कि दो कैमरों की जगह दर्शक की दो आँखें लगी हुई हैं। अब ये दो अलग-अलग चित्र अलग-अलग आँखों तक कैसे पहुँचाये जायें, इसी में थ्रीडी सिनेमा की सारी तकनीक छुपी है.. (और सारा खर्च भी). दो मुख्य तकनीकों की चर्चा करना चाहूंगा-

दोनों शीशे अलग-अलग पोलराइजेशन
वाली प्रकाश किरणों को पास करते हैं
पहली तकनीक है पैसिव पोलराइजेशन (निष्क्रिय ध्रुवीकरण), जिसमें दोनों चित्रों की प्रकाश किरणों को दो अलग-अलग प्रकार से ध्रुवीकृत करते हैं और आँखों पर पहना जाने वाला पोलराइज्ड चश्मा केवल एक प्रकार की किरणों को एक आँख तक पहुँचने देता है, और दूसरे प्रकार की किरणों को दूसरी आँख तक.. इस प्रकार एक आँख केवल पहले कैमरे के चित्र देखती है, दूसरी आँख केवल दूसरे कैमरे के...

दूसरी तकनीक है एक्टिव शटर तकनीक.. इसमें पहना जाने वाला चश्मा विशेष एलसीडी काँच का बना होता है जो क्रमागत रूप से एक सेकेन्ड में प्राय: 30 बार ऑन-ऑफ होता है। जब बाँई आँख का शीशा ऑन होता है तब दाईं आँख का ऑफ, और ऐसे ही दूसरी आँख का भी.. पर्दे पर चल रहे फ्रेम भी इसी प्रकार समयबद्ध होते हैं कि जब 1,3,5,7.. फ्रेम चल रहे हों तब बायां शीशा ऑन हो और 2,4,6,8.. फ्रेम के समय दायाँ शीशा। विषम फ्रेम पहले कैमरे से शूट किये होते हैं और सम फ्रेम दूसरे कैमरे से..
एक्टिव शटर में शीशे की जगह
एलसीडी काँच का प्रयोग होता है

उपरोक्त दोनों तकनीकों में विशेष प्रोजेक्टर/पर्दे/चश्मों की जरूरत होती है, अत: इन्हें घर पर आसानी से नहीं देखा जा सकता। हालाँकि दूसरी तकनीक पर आधारित स्मार्ट 3D टीवी बाजार में उपलब्ध हैं, लेकिन वे बहुत महँगे हैं.. तो तीसरी तकनीक अपनानी पड़ेगी.. उसी तकनीक का जिक्र मैं करने वाला हूँ..

एक जगह और रुकते हैं.. पहले थोड़ा स्टीरियोस्कोपिक तकनीक के बारे में जान लिया जाय.. इसमें एक ही ऑब्जेक्ट के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से चित्र लिये जाते हैं। जैसे मैनें अपने बालकनी से सामने वाली गली की दो तस्वीरें लीं-


पहली तस्वीर
दूसरी तस्वीर- हल्का सा दाहिने हटकर























दोनों तस्वीरों का स्टिरियोस्कोपिक एडजस्टमेंट करने के बाद

अब इस चित्र को सस्ते तरीके से त्रिआयामी रूप में देखने के दो तरीके हैं। पहला तरीका है आँखों पर जोर डालकर देखने का, जिसे क्रॉस-आई तकनीक कहते हैं (Cross-Eyed 3D)..



क्रॉस-आई तकनीक में आँखों को चित्र की सामान्य दूरी से नजदीक फोकस किया जाता है ताकि दाईं आँख से बायाँ चित्र, और बाईं आँख से दाँया चित्र देखा जाय। थोड़ी देर ऐसा प्रयास करने पर दोनों चित्र एक दूसरे से दूर विस्थापित होंगे, और बीच में दो अन्य चित्र दिखने लगेंगे.. फोकस थोड़ा और करीब लाने पर बीच के दोनों चित्र एक दूसरे में विलीन हो जायेंगे.. अब फोकस बनाये रखते हुए आँखों को थोड़ा शिथिल(Relax) करने पर बीच वाला चित्र अचानक से चमक उठेगा, और आपको उस चित्र में तीनों विमाओं के दर्शन होंगे। बचपन में हममें से ज्यादातर ने कभी-न-कभी आँखों से ऐसे खेलने की कोशिश जरूर की होगी। अगर आप अब भी ऐसा कर पाने में काबिल हैं, तो नीचे दिये गये चित्रों का आनन्द उठायें। अगर आप पहले ऐसा कर पाते थे, लेकिन अभी आप आँखों को फोकस कर पाने में थोड़ी दिक्कत का अनुभव कर रहे हैं, तो उनके नीचे दिये गये वीडियो ट्यूटोरियल पर जायें (साभार- यू-ट्यूब)। अगर आपको पता ही न हो कि क्रॉस-आई किस बला का नाम है, तो इस विकी-हाऊ पेज पर जाकर थोड़ा होमवर्क करें, और फिर यहाँ वापस आयें। और अगर आप तमाम कोशिशों के बाद भी ऐसा कर पाने में असफल हैं तो अगली तकनीक सुनने तक धैर्य रखें..।


जूनियर प्रशांत पोज देते हुए

गली का एक और दृश्य- गहराई के कई स्तर देखिये

चिड़ियों के पंखों पर गौर फरमाइये

पीछे की इमारत पर पड़ती धूप देखिये

एक सुंदर मक्खी




आप में से कुछ लोग बामुश्किल 20 सेकेण्ड में क्रॉस-आई देख पाने में सफल हो जायेंगे, कुछ को थोड़ी मेहनत और 4-5 मिनट लगेंगे, कुछ अगले दिन ऐसा कर पाने में सक्षम होंगे, कुछ कभी नहीं कर पायेंगे.. ऐसे Wall-Eyed लोगों के साथ मेरी सहानुभूति.. J लेकिन यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि लंबे समय तक ऐसा कर पाना संभव नहीं है, और न ही आप लोगों को मैं क्रॉस-आई रूप से थ्रीडी फिल्म देखने की सलाह दूँगा। इस प्रकार आप लोगों की आँखे फुड़वाकर मुझे बद्दुआयें नहीं लेनीं..

अब इस पोस्ट का मुख्य विषय शुरु होता है। बिना आँखें फोड़े न्यूनतम खर्च (10 रुपये से लगायत अपनी-अपनी श्रद्धानुसार) में जिस तरीके से थ्रीडी फिल्मों का अपने कम्प्यूटर/सामान्य टीवी पर आनन्द उठाया जा सकता है, उस विधा का नाम है- एनाग्लिफ तकनीक (Anaglyph Technique).. इसमें उन्हीं दो स्टिरियोस्कोपिक तस्वीरों को विशेष ऑप्टिकल फिल्टर द्वारा प्रॉसेस किया जाता है, जिससे दोनों तस्वीरें अलग-अलग रंगों में कोडीकृत की जाती हैं और इन्हें एक-दूसरे पर अध्यारोपित(Superimpose) कर दिया जाता है। इसे एक विशेष चश्मे से देखा जाता है, जिसके दोनों शीशे अलग-अलग रंगों के बने होते हैं (सबसे प्रचलित रंग हैं लाल-सयान Red-Cyan, क्रमश: बाईं और दाईं आँख के लिये)। इस विधि से थ्रीडी का आनन्द उठाने के लिये आपको इन चीजों की जरूरत पड़ेगी-

  1. के-एम प्लेयर प्लस या स्टिरियोस्कोपिक प्लेयर। मैं पहले वाले की सिफारिश करूँगा। केएम प्लेयर एक बेहतरीन फ्रीवेयर मीडिया प्लेयर है,जिसे नि:शुल्कयहाँ से डाउनलोड किया जा सकता है।
  2. एक थ्रीडी सिनेमा। बहुत सारी पी2पी (टॉरेंट) वेबसाइट हैं, जहाँ से आप ये फिल्में डाउनलोड कर सकते हैं, जैसे पाईरेट-बे या किक-एस टॉरेंट | यहाँ जाकर आप फिल्म के नाम के साथ Anaglyph या HSBS लगाकर सर्च कर सकते हैं और सही टॉरेंट डाउनलोड कर सकते हैं। जैसे कि Avatar HSBS या Toy Story Anaglyph। यह अवश्य ध्यान दीजिये कि Anaglyph डाउनलोड करते समय Red-Cyan प्रिंट ही डाउनलोड कीजिये, अन्यथा सारा मजा किरकिरा हो जायेगा। वैसे सबसे बढ़िया होगा कि आप HSBS प्रिंट ही डाउनलोड करें और उसे केएम प्लेयर में देखें। परंतु यदि आप अपने टीवी पर डीवीडी प्लेयर द्वारा देखना चाहते हैं, तब आपकी मजबूरी है कि Anaglyph प्रिंट डाउनलोड कर उसे डीवीडी पर बर्न कर देखें। आप पहले सैंपल अवश्य डाउनलोड कर लें। ये सैंपल ऐसे दिखने चाहिये- 

लाइफ ऑफ पाई का HSBS प्रिंट

लाइफ ऑफ पाई का Anaglyph प्रिंट
  3. आखिरी, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण- एक Red-Cyan थ्रीडी चश्मा। यह आप स्वयं बना   
     सकते हैं, या अपने बच्चे को बनाने के लिये कह सकते हैं, बशर्ते-
      a.   आप शादीशुदा, एक बच्चे के पिता/माता हों,
b.   वह बच्चा पर्याप्त रूप से छोटा हो और उसे क्राफ्ट में रुचि हो,
c.   वह आपकी बात मानता हो।

मेरा प्लास्टिक का चश्मा
यह चश्मा कैसे बनाया जाय, यह जानने के लिये नासा के इस लिंक पर जायें। और अगर आप ऊपर की शर्तों पर खरे न उतरते हों तो eBay पर उपलब्ध इन चश्मों में से कोई भी मँगा सकते हैं, कैश ऑन डिलिवरी भी उपलब्ध है। यह अवश्य बता दूँ, कि 20-30 रुपये के कागज वाले चश्मे 100-200 रुपयों वाले से काफी बेहतर हैं, और अविश्वसनीय रूप से अच्छा प्रदर्शन करते हैं। आप यदि एक बार इनसे संतुष्ट हो जायें तो nVidia वाले चश्मे भी मँगा सकते हैं।



सस्ता वाला  चश्मा, थोड़ा इंप्रोवाइजेशन, पहले से बेहतर
एक बार सारी चीजें उपलब्ध हो जायें तो आप थ्रीडी का आनन्द लेने को तैयार हैं। यदि आपने एनाग्लिफ प्रिंट डाउनलोड किया है तो उसे वीएलसी या केएमप्लेयर में चलायें, और चश्मा लगाकर देखें। और यदि आपने HSBS प्रिंट डाउनलोड किया है तो स्टीरियोस्कोपिक प्लेयर में व्यूà व्यूइंग मेथडà एनाग्लिफà हाफ कलर एनाग्लिफ (रेड-सयान) सेलेक्ट करें, या केएमप्लेयर प्लस में केवल नीचे बाँई तरफ मौजूद 3D बटन पर क्लिक करें।

केएम प्लेयर प्लस में 3डी बटन

स्टीरियोस्कोपिक प्लेयर हेतु निर्देश



आप पायेंगे कि दोरंगे चश्मे से देखने के कारण आपको प्राकृतिक रंग नहीं दिख रहे होंगे। यह इस तकनीक की कमी है, जिसे कुछ हद तक रंग संयोजन के द्वारा ठीक किया जा सकता है। यदि आप के कम्प्यूटर में इंटेल का ग्राफिक कार्ड लगा है तो आप ग्राफिक प्रॉपर्टीजà कलर एनहैंसमेंट में जायें, तथा-
  1.   All Colors के लिये सैचुरेशन 18, तथा कंट्रास्ट को 55 पर सेट करें।
  2. Blue के लिये सैचुरेशन को 0 कर दें। यदि पिक्चर में अब भी नीलापन आ रहा हो तो सैचुरेशन को और निगेटिव ले जायें।
  3. एक बार अंदाजा मिल जाने पर आप अपने हिसाब से रंगों को स्वयं संयोजित कर सकते हैं।
 
पहले All Colors के लिये सेट करें, फिर Blue के लिये
अब आप थ्रीडी का आनन्द उठा सकते हैं। प्रश्नों/समस्याओं/टिप्पणियों का स्वागत है। इसे एक बार ट्राई अवश्य करें। मेरा वादा है, आप निराश नहीं होंगे। यदि आपने ट्राई किया है तो अपना अनुभव अवश्य साझा करें..         
       

शेयर करें

    अपनी खबर..

    My photo
    पेशे से पुलिसवाला.. दिल से प्रेमी.. दिमाग से पैदल.. हाईस्कूल की सनद में नाम है कार्तिकेय| , Delhi, India

    अनुसरणकर्ता

    विजेट आपके ब्लॉग पर

    त्वम उवाच..

    कौन कहाँ से..