7 महीने 16 दिन बाद…

27 जनवरी-12 सितम्बर.. 7 महीने से उपर हो चुके कुछ लिखे; और आज न लिखने का व्रत तोड़ बैठा।

ऐसा नहीं है कि कुल जमा 17 पोस्टों में अपनी समस्त सोच उड़ेलकर खाली हो गया था इसलिये किनारा कर लिया। ऐसा भी नहीं है कि आज्ञाकारी बालक की तरह ‘काकचेष्टा बकोध्यानम’ में तल्लीन हो गया होऊँ।

कहीं सुना था कि सबसे बड़ी तकलीफ़ आस्था टूटने की होती है। और जब किसी और में नहीं, स्वयं में आस्था भंग होने लगे तो क्या किया जाय, इस प्रश्न पर क्या कभी किसी ने विचार किया?

स्वयं में आस्था का भंग होना कोई ऐसी (दु:)घटना नहीं, जो रोज घटती हो। शायद इसीलिये इसका आभास मिलते ही लगने लगता है कि कुछ बहुत ग़लत हो रहा है।

ऐसा नहीं कि मेरे साथ कुछ ऐसा घटित हुआ हो। हाँ, इतना जरूर है कि परिवार, समाज, और अन्य की तो दूर, जब स्वयं की स्वयं से की गयी उम्मीदें भी सार्थक होती न दिखाई दें, ऐसा समय आने-सा लगा था। और उन्हीं क्षणों में निर्णय ले बैठा-‘टू कलेक्ट एंड बर्न एवरीथिंग, एंड अगेन स्टार्ट फ्रॉम एशेज..’। और यही वजह थी इस प्रकार ‘हाइबरनेट’ मोड में चले जाने की।

ख़ैर छोडि़ये, कहाँ से ये फालतू की बातें ले बैठा। असल में बड़े ‘ग्रे’ मूड में ये पोस्ट लिखने बैठा था। अब डर रहा हूँ कि इस आयतुल फारसी को पढ़ने की फ़ुरसत किसके पास होगी! सो अपने स्व में वापस लौटने का प्रयास करता हूँ।

कहाँ तो ब्लॉगजगत को ‘ले लो अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो’ कहकर बंदा पढ़ने-लिखने में मशग़ूल होने का भ्रम पाले बैठा था, कहाँ इतने दिनों बाद क़तई भावुक कर देने वाली पोस्ट और टिप्पणी पढ़कर फिर लकुटि कमरिया उठाने दौड़ पड़ा हूँ। ब्लॉगिंग की शुरुआत में सारथी जी की एक पोस्ट पढ़्ने को मिली थी, जिसमें उन्होंने ब्लॉगरों का वर्गीकरण किया था। पाँचवी श्रेणी के ब्लॉगर वे थे जिनके बारे में कहा गया था कि ये चार दिन की चाँदनी की तरह हैं। मैं भी उसी श्रेणी में गिना जाने लगा होऊँगा, ऐसी उम्मीद है।

ब्लॉगजगत में मेरे पथप्रदर्शक ‘सिद्धार्थ जी’ ने अपनी पहली टिप्पणी में ही कहा था- जितना लिखो, उससे कई गुना ज्यादा पढ़ना। और ऐसा मैनें किया भी। अगर किसी की पोस्ट पूरी ईमानदारी से पढ़कर उसपे कोई सार्थक टिप्पणी न करो, तो अपनी पोस्ट पर किसी की टिप्पणी अगोरने में अपराधबोध महसूस होता था। अस्तु, तीन-चार घंटे दैनिक की ब्लॉगरी के बाद जो बचे-खुचे पलछिन नसीब हुए, उसमें क्या पढ़ें और कितना पढ़ें? ये तो वही बात हुई कि ‘एकै लंगोटी, का धोयें का सुखायें’। हुआ बस इतना कि पाँचवे सेमेस्टर में इकसठ अशारिया छ: फ़ीसद नम्बर पाकर टापते रह गये। अब्बा हुजूर की नश्तर-ए-नजर ने कुछ यूँ भेदा कि ब्लॉगजगत को..‘तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर’

लेकिन नहीं साहब, अब बी.टेक. के चौथे(और आखरी) साल में आकर ब्लॉगरी का चूहा फ़िर से पेट में दौड़ने लगा। और तीन घटनाएं ऐसी हुईं, जिन्होंने कलम में फिर से जान फूँक दी।

पहले दो तो फैमिली मैटर हैं- एक- सत्यार्थमित्र की क़िताब छपकर आना, दूसरी- सिद्धार्थ जी की सारी सफलता का(और सर के लगातार कम होते बालों का भी) राज़ उनकी श्रीमती जी, और हमारी अग्रजा ‘रचना जी’ का उनसे पृथक एक ब्लॉग- ‘टूटी-फूटी’ का निर्माण। ऐसा करके उन्होंने निश्चित ही स्वयं को बेटर-हॉफ़ सिद्ध किया है, लेकिन गर्व इस बात का है कि उनके इस क़दम से ‘सत्यार्थमित्र’ का रंग भी फीका हुआ है। सर्वहारा ने भी शासन में घुसपैठ की है, अब मॉस्को दूर नहीं…

तीसरा तो निहायत ही संजीदा मसला है। हमारे गिरिजेश जी को जाने कहां से हमारे ब्लॉग का पता मिला, और अपने चिठ्ठे पर उन्होंने मेरी तारीफ में जाने क्या-क्या लिख मारा कि मियाँ लोग हमारे ताबूत से भी कीलें उखाड़कर हमें निकाल लाये।

देखिये, मैं गिरिजेश जी को जानता भी नहीं हूँ। यह सिर्फ मुझे एक संजीदा ब्लॉगर सिद्ध करने का कुत्सित प्रयास है, और कुछ नहीं। लंठ जी को कोई ग़लतफ़हमी हुई है। ये दीग़र है कि उनकी इस ग़लतफ़हमी का हमने काफ़ी फायदा उठाया। उस पोस्ट की लिंक सबको सीना फुलाकर ई-मेल की। इस तुर्रे के साथ… हजारों साल नरग़िस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा..

और हाँ पाबला साहब, आशंकित होने की कोई बात नहीं। हम सर्वथा स्वस्थ-सानंद हैं, ब्लॉग पर तो हलचल होती रहेगी।

जो भी हो, एक पोस्ट तो हुई। भले ही 26 जनवरी से 15 अगस्त हो गये। शेष फिर कभी..

  • ठेलोपरांत- और हाँ, हम केवल शनिवार और रविवार को ब्लॉगिंग करेंगे। बहुत हुआ तो किसी-किसी सोमवार को। देखते हैं ये प्रतिज्ञा कितने महीने/दिन/घंटे चलती है।

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