राष्ट्रीय पर्व से ड्राई-डे का सफ़र..(भाग-१)


आज उस शख्स पर कुछ लिखने का मन कर रहा है, जो व्यक्तित्व की सीमाओं से परे उठकर एक विचारधारा, एक ‘वाद’ बन चुका है। जिसे दो महाद्वीपों की जनता ने एक काल में पूजा, दो देशों की संसदों ने जिसे धर्म प्रचारकों ईसा, हजरत, बुद्ध के बाद गुजरी सहस्राब्दि तक का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व घोषित किया; फिर भी जिसका फंतासी चरित्र इतना विवादास्पद और विरोधाभासी रहा कि उसकी मृत्यु के ६० साल बाद भी हम आज तक तय नहीं कर पाये कि कि क्या गाँधी सचमुच ‘महात्मा’ थे..?

मैं तो उस पीढ़ी की पैदाइश हूँ, जिसमें गाँधी को गाली देना एक आम फैशन है। वह पीढ़ी जो अस्तित्व के अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। जो अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि गियर कैसे बदला जाय कि मूल्य, भावनाएं और विरासत पीछे न छूट जायें.. और सबसे बढ़्कर, इस सफ़र में उन्हें साथ ले चलना भी है या नहीं!

व्यक्तिपूजा मुझे बिलकुल बर्दाश्त नहीं. इसलिये मैं गाँधीजी को अतिमानवीय नहीं मान सकता। आम आदमी की तरह गाँधीजी के चरित्र में भी खामियाँ थीं, कुछ तो बेहद बड़ी। इसके बावजूद गाँधी का समग्र मूल्याँकन एक ऐसे चरित्र को सामने लाता है, जिसमें अच्छाइयों ने चरित्रगत दोषों को ढकने में सफलता प्राप्त की है।

गाँधी की सबसे बड़ी सफलता इसीमें थी कि उन्होंने ३० करोड़ दबे-कुचले, शोषित, भीरू और स्वभावतः कायर लोगों के मुल्क को आत्मबल, अहिंसा और सत्याग्रह जैसे अमोघ अस्त्र दिये। वरना यही मुल्क है जिसे १८५७ की सशस्त्र क्रांति को प्रथम स्वातंत्र्य संघर्ष का नाम देने को लेकर अब भी मतभेद है। मुझे नहीं लगता कि सदियों से कुचली, आत्मगौरव विस्मृत जनता का 0.001 फ़ीसदी तबका भी सशस्त्र क्रांति के तरीकों को सलीके से सब्स्क्राइब कर सकता था। क्रांति सिर्फ हथियार उठाने से ही संभव नहीं हो जाती, अपितु उस हथियार की विचारधारा को भी आत्मसात करना होता है। वरना क्या कारण है कि भगत सिंह को ‘बम की फिलासफी’ नामक पर्चा लिखना पड़ा। क्या कारण है कि एक समय राष्ट्र की सर्वोत्कृष्ट मेधा द्वारा पोषित नक्सली विचारधारा राह भटककर आंतरिक शांति के लिये सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। कानू सान्याल से छत्रधर महतो के सफ़र में हथियारों की सॉफीस्टिकेशन तो बढ़ी है, लेकिन विचारधारा का अभूतपूर्व ह्रास हुआ है। सशस्त्र क्रांति और आतंकवाद के बीच एक बड़ा महीन फ़र्क होता है- विचारधारा का।

मुझे नहीं लगता कि तत्कालीन जनता इस फ़र्क को तमीज से समझ पाती। इसीलिये इस मुल्क़ को गाँधीवाद की सख्त जरूरत थी।

और यही वजह थी कि देश ने गाँधीजी को हाथोंहाथ लिया, सर-आँखों पर चढ़ाया, और यही गाँधी की कमजोरी भी बना। गाँधीजी ने कभी बहुजन की बात नहीं की, सर्वजन की बात की। इसीलिये उन्होंने ख़िलाफ़त जैसे सांप्रदायिक आन्दोलन का समर्थन किया। जिन्ना, रहमत अली, शौक़त अली और सुहरावर्दी जैसे वैमनस्य के बीजों को पनपने का मौका दिया और उस छोटे से तबके के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाकर नासूर को कैंसर बन जाने दिया। किया तो उन्होंने यह सब येन-केन-प्रकारेण राष्ट्रीय एकता को बरकरार रखने के लिये। दोनों समुदायों को किसी भी प्रकार संयुक्त परिवार की तरह रखने के लिये। लेकिन बात बेहद बढ़ जाने तक शायद वे यह नहीं समझ पाये कि कैंसर का इलाज़ वैद्य या हक़ीम के पास नहीं, शल्य-चिकित्सक(Surgeon) के पास होता है। काश उस समय गाँधीजी ने बहुजन की कीमत पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को बढ़ावा नहीं दिया होता तो मुल्क़ की तस्वीर आज कुछ और होती।

(जारी….)

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