रोटी-पानी-बिजली-सड़क चाहिये, या पेशाब के बाद सुखाने के लिये ढेलों पर सब्सिडी ? (वहाबी आंदोलन के बहाने)

कल के ‘द हिन्दू’ में एक लेख पढ़ा। प्रसिद्ध विधिवेत्ता राम जेठमलानी ने नई दिल्ली में आतंकवाद पर हुए कानूनवेत्ताओं के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में ‘वहाबी आन्दोलन’ और उग्रवाद में तार जोड़ने की कोशिश क्या की, सउदी राजदूत फैसल-अल-तराद ऐंठकर वॉकआउट कर गये। बाद में विधिमंत्री वीरप्पा मोइली को यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि यह भारत सरकार के आधिकारिक विचार न समझे जायें। पूरा लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

मैं ऐसे किसी विषय पर लिखना नहीं चाहता था, जिससे विवादों की बू आये। विगत कई दिनों से
ब्लॉगजगत में चल रहे काल-कलौटी (कीचड़-मिट्टी-गू उछालने) और ‘मैं’ की प्रवृत्ति को तुष्ट होते देख रहा था। हँसी आती थी कि इन्हें बचपन में मम्मी ने शायद ‘कॉम्प्लान’ नहीं पिलाया, तभी आज भी ‘बड़े’ (मानसिक रूप से) नहीं हो पाये। लेकिन अब तो हद ही हो गई। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी अब कुट्टी-कुट्टी होने लगी।

दु:ख इस बात का है कि मोइली साहब को यह वाहियात स्पष्टीकरण देने की जरूरत क्यों आन पड़ी? मरहूम मुहम्म्द इब्न अब्द-अल-वहाब से ही धर्मचक्र प्रवर्तन की शिक्षा लिये उनके शागिर्द आज जो ‘क़त्ताल’, ‘कुफ़्र’, और जिहाद-जिहाद खेल रहे हैं, वह क्या किसी से छुपा है??

सुधारवादी आंदोलनों की प्रवृत्ति अंतर्मुखी होती है- होनी चाहिये। सनातन धर्म में सतत सुधार के लिये जगह है। व्यक्तिगत अवधारणाएं हैं। कुरीतियां भी हैं, भले ही ज्यादातर सामाजिक हों। इतना कुछ है, इसलिये सुधार भी हैं। स्वामी दयानन्द ने कभी कहा था- “हमारे समाज की परंपरा थी कि कुप्रथाओं को, ग़लत कार्य करने वालों को, कुरीतियों को सड़ी उंगली की तरह काट कर फेंक दिया जाता था। यह वाजिब भी था। जबसे हमने गलितांग को अपना ही अंग मानकर काट फेंकने से इनकार किया है, तबसे यह विष समूचे शरीर में व्याप्त हो गया है।”

लेकिन कभी इन कुरीतियों का जिम्मेदार बाहरी कारकों को मानकर अपना पल्ला झाड़ लेने की कोशिशें नहीं हुईं। कभी अपने को घोंघे के कवच में क़ैद कर दुनिया को अपना दुश्मन मानने का प्रयास नहीं किया गया।

लेकिन वहाबियों ने अपने धर्म के पिछड़ेपन का जिम्मेदार ख़ुद को छोड़कर पूरी दुनिया को माना। भारत में इनके इतिहास का विवेचन करें तो पता चलता है कि सिख राज्य, जिसके अंतर्गत ये आते थे, के खिलाफ़ इन्होंने जिहाद छेड़ा था। जीर्ण-शीर्ण सिख राज्य वैसे ही पतन की कगार पर था। अंग्रेजों के दो धक्कों में भहरा गया। पंजाब के विलय के बाद जिहाद का मुँह अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ मोड़ दिया गया, जिसकी वजह से इन्हें तथाकथित रूप से देशभक्ति का तमगा मिल गया। लेकिन जब सिखों से कई गुना सशक्त और परिमार्जित सैन्य वाले अंग्रेजों ने इन्हें कुत्तों की तरह दौड़ा कर मारना शुरु किया, तो बड़ी मुश्किल से इन्हें मस्जिदों में पनाह मिली। वहाबियों ने स्वधर्मियों पर भी कोई कम जुल्म नहीं ढाये। यहाँ तक कि पैगंबर मुहम्मद की क़बर भी खोद डाली गई, ताकि उसपर भी मजार न खड़ी हो जाय।

और इसी गौरवशाली(?) विरासत का दंभ भर रहे सउदियों को आईना दिखाना बहुत बुरा लगता है, क्योंकि उसमें उनकी सच्ची और विद्रूप शक्ल प्रतिबिम्बित होती है। मुस्लिम जगत को यह बात आँख-कान खोलकर देख-समझ लेनी होगी कि पेट्रो-डॉलर में आकंठ डूबे ये शेख-सुल्तान इस्लाम की तरक्की के लिये क्या कर रहे हैं?

ये माइल-हाई टॉवर बना रहे हैं, पॉम आइलैंड बना रहे हैं, शारजाह-अबूधाबी में बैठकर मैच फिक्सिंग के रैकेट चला रहे हैं, घुड़दौड़ में पैसे लगा रहे हैं, आदि आदि…

और मजहब की तरक्की के लिये सिमी और हूजी जैसे संगठनों को आर्थिक मदद से महराजगंज, सिद्धार्थनगर, आजमगढ़, लखीमपुर, बहराइच जैसे भारत-नेपाल सीमा से सटे इलाकों में धड़ाधड़ मदरसे खुलवा रहे हैं। ये मदरसे क्या सिखा-पढ़ा रहे हैं, यह ‘जगजाहिर रहस्य’ है। एक पूरी की पूरी पीढ़ी ख़म की जा रही है शाने-ख़ुदा में।

भले ही नाइजीरिया, अंगोला, सोमालिया में लाखों मुसलमान भूख से मर जायें, कोई शेख अल्लम इब्न सल्लम एक धेला वहाँ उनकी रोटी के नाम नहीं दे सकता वर्ल्ड फूड प्रोग्राम में। कहाँ चली जाती है ‘मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा’ की इक़बालिया बाँग??

मुस्लिमों के पास विकल्प है- मुख्यधारा में आने का। लेकिन पहले उन्हें इन उलेमाओं को आईना दिखाना होगा। उन्हें तय करना होगा कि रोटी-पानी-बिजली-सड़क चाहिये, या पेशाब के बाद सुखाने के लिये ढेलों पर सब्सिडी छुई-मुई न बनें, सीना तान कर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हों। किसी अब्दुल कलाम को, अल्ला रक्खा रहमान को, ज़हीर खान, आसिफ इक़बाल को राष्ट्रभक्ति का प्रमाण देने की जरूरत नहीं है; किसी आम मुसलमान को भी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण देने की जरूरत नहीं है। मुस्लिमों को यह प्रमाण अपने बात-बेबात फतवे देने वाले उलेमाओं और मुफ़्तियों से माँगना चाहिये।

एक ईमानदार कोशिश जारी है इंट्रोस्पेक्शन की। एक मर्द मोमिन है। खुद को उम्मी कहता है। खुलकर सामने आ जाये तो नेट पर मौजूद मौलाना लोग उसके सर पर भी ईनाम रख देंगे। लोग उसे काफ़िर तक कह गये, लेकिन डटा हुआ है। उस शख्स के हौसले को सलाम कीजिये…… हर्फ़-ए-ग़लत।

ठेलनोपरांत: एक पारिवारिक आयोजन में व्यस्तता के कारण अभी कुछ दिन अनियमित रहूँगा। यह पोस्ट भी स्वयं टाइप नहीं कर पा रहा, ।आपकी पोस्टों पर टिप्पणी तो दूर की बात है। क्षमाप्रार्थी हूँ।

एक बात और... गिरिजेश जी को धन्यवाद! हर्फ़-ए-ग़लत तक ले जाने के लिये

17 Responses
  1. अरे वाह श्रीश जी आप तो राजनीतिक /धार्मिक /अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के भी एक श्रेष्ठ विवेचक हैं -यू आर डिफ़रेंट !


  2. इस विषय पर आज तक हिंदी में पढ़ा हुआ सबसे अधिक प्रभावशाली लेख |


  3. कलम की धार और तेवर ..दोनों गजब हैं ....बहुत बहुत शुक्रिया ्यूं लिखने के लिये ..
    अजय कुमार झा


  4. बहुत सुंदर बात! आत्मालोचना के बिना तो सब बेकार है। कुदरत ने पानी को इसीलिए आईना बनाया है।


  5. वरुण से सहमत, धारदार लेख… बधाईयाँ…। हर्फ़-ए-गलत भी शानदार है…


  6. शानदार और प्रभावशाली। इसे कहते हैं खरी-खरी बत करना। आज कल लोग या तो पोलिटिकली करेक्ट होने के चक्कर में लिजलिजी बातें करने लगते हैं या एक पन्थ के प्रति अन्धभक्तिं में अपनी कट्टरता देखाने के लिए कुतर्क और अनर्गल प्रलाप में डूब जाते हैं।

    यह आलेख इन दोनो बीमारियों से मुक्त है। बहुत बहुत बधाई।

    पारिवारिक आयोजन में मुलाकात होने की पूरी सम्भावना है।:)


  7. वरुण जी की बात से पुर्ण सहमत जी.
    धन्यवाद


  8. बिल्कुल सटीक, वरुण की बात से सहमत हूं । परन्तु भाई, आप भी कम्युनल करार दिये जायेंगे ।


  9. भई हमरा नाम काहें डाल दिए? लोगबाग कहेंगे कि इसकी आदत हो गई है नए छोरों को बिगाड़ने की ! :)
    ____________________________

    लेख तो बस ऐसा है कि जैसे ठोठ्ठा पकड़ कर कबुलाया जा रहा हो !
    अब 'क़ुबूलने' की परिभाषा बदलने की कोशिश में लगे हो तो निन्दा तो होगी ही !
    तमगा मिलेगा, तमगा ! भई वाह् ग़जब लिख दिए।


  10. इस मर्द मोमिन की तरह ही कुछ अजीज दोस्त हैं, उनसे लगता है वो कुछ बिगड़ने नहीं देंगे. 'कुछ' ही सही हैं तो. वर्ना तो...


  11. कार्तिकेय जी, जन्‍मदिन पर टिप्‍पणी के माध्‍यम से आपके ब्‍लाग पर आना हुआ, यहाँ आकर पा रहा हूँ कि आना व्‍यर्थ नही हुआ है।

    आपके सार्थक विचारों और प्रभावशाली लेखनी को प्रणाम करता हूँ, मै भी इस प्रकार की मजहब़ी प्रपंचो में पड़ने से दूर रहता हूँ किन्‍तु कुछ लोग चुप्‍पी को कमजोरी मानलेते है और इसका परिणाम होता है इन लोगो का कोई विरोध नही कर पाता है।

    मित्र सच कहूँ तो मेरे पिछले कुछ लेखो से कुछ अच्‍छे ब्‍लागर भी अपनी बात खुल कर रख रहे है, और उनके व्‍यक्तिगत मेल भी मिल रहे है। मैने सर्वाजनिक मंच पर कहा है कि किसी भी प्रकार की धर्मिक प्रपंचो की शुरूवात नही करूँगा किन्‍तु जब कोई शुरूवात करेगा तो मै भी पीछे नही हटूँगा।

    पुन:श्च आप बहुत अच्‍छा लिखते है :)


  12. बवाल Says:

    आप इतना बेहतरीन क्यूँ लिखते हैं जी, ज़रा बतलाइए तो ? हा हा । बहुत वाजिब और बहुत दिलचस्प अंदाज़ है भाई क्या कहना !


  13. रामजेठलानी का प्रशंसक नहीं हूं, पर वहाबियों के बारे में उनके कथन से सहमत हूं।


  14. ज्ञानदत जी की टिप्पणी को मेरी समझा जाये


  15. सन्जय Says:

    बहुत बेहतरीन लेख लिखा है आपने, अन्दाज खूबसूरत और बेबाक बयानी, आनन्द आ गया !


  16. धांसू! वैसे शीर्षक कुछ कम सनसनाहट वाला भी रखा जा सकता था।


  17. कहो भैया कार्तिकेय, कहो यार, इंजीनियरिंग पढ़ थए~ कि और कुछ? अच्छा एक बात बताव~ इंजीनियरिंग के पढ़ाई में मन लाग~ थ? मुझे तो लगता है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई में मन कम लगता है भैया. बहुत ज़रुरत बा भाई कार्तिकेय जैसे लोगन का. सच में.


मेरे विचारों पर आपकी वैचारिक प्रतिक्रिया सुखद होगी.........

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    पेशे से पुलिसवाला.. दिल से प्रेमी.. दिमाग से पैदल.. हाईस्कूल की सनद में नाम है कार्तिकेय| , Delhi, India

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