राष्ट्रीय पर्व से ड्राई-डे का सफ़र…(भाग-२)

गाँधीजी का मक़सद स्पष्ट था- ब्रिटिश सत्ता से सबसे निचले स्तर पर संघर्ष करना। और गाँधी की सबसे बड़ी असफलता भी यहीं रही।

सत्य तो यह था कि कुटिल ब्रिटिश शासन ने भारतीय जनता का शोषण सीधे नहीं किया, बल्कि सामंतों-जमींदारों जैसे बिचौलियों के माध्यम से। फिर भी किसान की पैरवी करने के बावजूद गाँधीजी उसे जमींदार के ख़िलाफ़ खड़े होने से लगातार मना करते रहे। जब मिदनापुर और गुंटूर के किसानों ने अंग्रेजों के साथ-साथ जमींदारों को भी लगान देने से मना किया*, तो गाँधीजी गृहयुद्ध जैसी स्थिति की कल्पना से भयभीत हो उठे। कईयों की भाँति मेरा भी मानना है कि गाँधीजी ने वर्ग-संघर्ष को मूर्त होने से रोकने के लिये असहयोग आंदोलन को स्थगित किया, चौरीचौरा तो एक साइड रीजन था। यहीं बूर्ज्वा के अलंबरदार होने का ठप्पा गाँधीजी पर कुछ यूँ लगा कि बिरला भवन में मरने के बाद से आज तक धुल् नहीं पाया। और इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ, कि आजादी मिलते ही सारे रायबहादुर, रायसाहब, जमींदार, राजे-महराजे प्रिंस सूट को खद्दर से स्विच ओवर कर चरखे पे बैठ गये। अंग्रेजों के जाने के बाद पूर्ण स्वराज की क्रांति की धारा जिनके विरुद्ध मोड़नी थी, वही शासक बन बैठे। गोरे साहब गये तो ‘काले साहब’ गद्दीनशीन हुए। एक अभूतपूर्व क्रांति का ऐसा अभूतपूर्व बंटाधार इतिहास में और कहीं नहीं मिलता।

कुछ लोग मेरी इस बात से असहमत होंगे और सत्य भी है कि ग्राम स्वराज की बात करने वाले गाँधी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनका मुख्य प्रोटेगोनिस्ट किसान इतना मजबूर, इतना मजलूम हो जायेगा। लेकिन मेरा मानना है कि यह भारतीय बुर्जुआ वर्ग को काँग्रेस के साथ जोड़ने के प्रयासों का ही प्रतिफल है कि आज स्थिति पहले से ज्यादा बदतर है। संसाधनों का वितरण इतना असमान और असंतुलित हो गया है कि पचास-एक लोगों के पास इतनी दौलत है कि तीसरी दुनिया के आधे मुल्क़ खरीद लें, तो चालीस फीसदी जनता के पास एक ही रोटी है- तय करना पड़ता है कि सुबह खायेंगे या शाम को।

गाँधीजी को शायद इस भवितव्य का आभास हो गया था। संभवतः इसी कारण उन्होंने काँग्रेस को डिजॉल्व करने की बात की थी। लेकिन अन्य नेताओं में इतना साहस नहीं था। स्वयं नेहरू ने एडविना माउंटबेटन से यह बात कही थी**-

We had lost all our faith in the divine cause of struggle for independence. We were praying that all this may get over soon. We had forgotten the loving caresses, family and all. I don’t think that any of us were ready to be tried and tested again. ” (स्वतंत्रता के लिये संघर्ष में हमारी आस्था समाप्त हो चुकी थी और हम बस दुआ कर रहे थे कि यह सब जल्द खत्म हो। हम स्नेहिल स्पर्श, परिवार और प्रेम भूल चुके थे और शायद ही हममें से कोई पुनः ऐसी परीक्षा देने को तैयार रहा होगा।)

यही हुआ कि थके हुए नेताओं ने जब मिली, जैसे मिली, जिस कीमत पर मिली, आजादी को स्वीकार किया और इतिहास के दृष्टिकोण से नवजात, लेकिन मानसिक रूप से बूढ़ा, आत्मबल-हत भारतीय समाज जैसे-तैसे रेंगता आगे बढ़ने लगा।

यशपाल अपने उपन्यास ‘झूठा सच’ में लिखते हैं कि 1948 में नेहरू जी की पुकार- अब नये सिरे से शुरु करना है/अपनी तक़दीर के मालिक हम ख़ुद हैं/ आदि राष्ट्र को उनके समान ही स्वप्न देखने पर मजबूर कर देती थी। लेकिन जब 15 साल बाद भी बूढ़े हो रहे नेहरू जी के शब्द नहीं बदले, तो समझ में नहीं आया कि धोखा कहाँ हुआ ! और तबसे आजतक ६० साल में भी कुछ भी तो नहीं बदला। नये सिरे से शुरुआत कभी नहीं हो पाई, और देश की जनता की तक़दीर आज भी उच्चवर्ग और नेता की दुरभिसंधि में कहीं बंधक है।

कहीं सुना था कि एक सच्चे महात्मा के पीछे हजारों पाखंडियों की भीड़ होती है। गाँधीजी के चेलों ने उनसे नैतिकता, चरित्र, पारदर्शिता, संयम और आत्मबल भले ही न सीखा हो, लेकिन लड़्कियों के कंधे पर हाथ रखना और गाल थपथपाना जरूर सीख लिया है। एक दार्शनिक विचारधारा की ऐसी ही परिणति होगी, अगर उसे सच्चे उत्तराधिकारी न मिल सके।

आज गाँधी नहीं हैं लेकिन विचार ज़िन्दा है। गाँधीवाद न सही, गाँधीगिरी ही सही। दिलों में न सही टी-शर्ट पे ही सही, उनकी तस्वीर अँकी तो है। लेकिन गाँधीजी जो प्रश्न हमारे लिये छोड़ गये थे, हम आज तक उनके समीकरण ही नहीं बना पाये हैं। गाँधी को राष्ट्र्पिता का दर्जा देकर हमने उन्हें पूजनीय तो बना दिया है लेकिन हमारे पापों के लिये अपना खून बहाने वाले उस शख़्स के चरित्र से, यहाँ तक कि उनकी गलतियों से जबतक यह देश सबक नहीं लेगा, इंडिया और भारत के बीच की खाई चौड़ी होती ही जायेगी। (..समाप्त)

सन्दर्भ: * इंडिया टुडे (आर.पी. दत्त)

** एडविना एंड नेहरू (कैथरीन क्लैमां)

ठेलनोपरांत- राजीव गाँधी अगर दो साल और जी लिये होते तो हमारे गाँव में भी इंटरनेट कनेक्शन होता। लिट्टे (अल्लाह मियाँ उन्हें जन्नत नसीब करे) की साजिश के चलते अगले दस दिनों के लिये सम्पर्क टूट रहा है। पटाखे फोड़ने हर साल की तरह इस साल भी गाँव जा रहा हूँ। देखते हैं इस साल महँगाई का गेहूँ की बालियों की खुशबू पर क्या असर पड़ा है।

राष्ट्रीय पर्व से ड्राई-डे का सफ़र..(भाग-१)


आज उस शख्स पर कुछ लिखने का मन कर रहा है, जो व्यक्तित्व की सीमाओं से परे उठकर एक विचारधारा, एक ‘वाद’ बन चुका है। जिसे दो महाद्वीपों की जनता ने एक काल में पूजा, दो देशों की संसदों ने जिसे धर्म प्रचारकों ईसा, हजरत, बुद्ध के बाद गुजरी सहस्राब्दि तक का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व घोषित किया; फिर भी जिसका फंतासी चरित्र इतना विवादास्पद और विरोधाभासी रहा कि उसकी मृत्यु के ६० साल बाद भी हम आज तक तय नहीं कर पाये कि कि क्या गाँधी सचमुच ‘महात्मा’ थे..?

मैं तो उस पीढ़ी की पैदाइश हूँ, जिसमें गाँधी को गाली देना एक आम फैशन है। वह पीढ़ी जो अस्तित्व के अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। जो अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि गियर कैसे बदला जाय कि मूल्य, भावनाएं और विरासत पीछे न छूट जायें.. और सबसे बढ़्कर, इस सफ़र में उन्हें साथ ले चलना भी है या नहीं!

व्यक्तिपूजा मुझे बिलकुल बर्दाश्त नहीं. इसलिये मैं गाँधीजी को अतिमानवीय नहीं मान सकता। आम आदमी की तरह गाँधीजी के चरित्र में भी खामियाँ थीं, कुछ तो बेहद बड़ी। इसके बावजूद गाँधी का समग्र मूल्याँकन एक ऐसे चरित्र को सामने लाता है, जिसमें अच्छाइयों ने चरित्रगत दोषों को ढकने में सफलता प्राप्त की है।

गाँधी की सबसे बड़ी सफलता इसीमें थी कि उन्होंने ३० करोड़ दबे-कुचले, शोषित, भीरू और स्वभावतः कायर लोगों के मुल्क को आत्मबल, अहिंसा और सत्याग्रह जैसे अमोघ अस्त्र दिये। वरना यही मुल्क है जिसे १८५७ की सशस्त्र क्रांति को प्रथम स्वातंत्र्य संघर्ष का नाम देने को लेकर अब भी मतभेद है। मुझे नहीं लगता कि सदियों से कुचली, आत्मगौरव विस्मृत जनता का 0.001 फ़ीसदी तबका भी सशस्त्र क्रांति के तरीकों को सलीके से सब्स्क्राइब कर सकता था। क्रांति सिर्फ हथियार उठाने से ही संभव नहीं हो जाती, अपितु उस हथियार की विचारधारा को भी आत्मसात करना होता है। वरना क्या कारण है कि भगत सिंह को ‘बम की फिलासफी’ नामक पर्चा लिखना पड़ा। क्या कारण है कि एक समय राष्ट्र की सर्वोत्कृष्ट मेधा द्वारा पोषित नक्सली विचारधारा राह भटककर आंतरिक शांति के लिये सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। कानू सान्याल से छत्रधर महतो के सफ़र में हथियारों की सॉफीस्टिकेशन तो बढ़ी है, लेकिन विचारधारा का अभूतपूर्व ह्रास हुआ है। सशस्त्र क्रांति और आतंकवाद के बीच एक बड़ा महीन फ़र्क होता है- विचारधारा का।

मुझे नहीं लगता कि तत्कालीन जनता इस फ़र्क को तमीज से समझ पाती। इसीलिये इस मुल्क़ को गाँधीवाद की सख्त जरूरत थी।

और यही वजह थी कि देश ने गाँधीजी को हाथोंहाथ लिया, सर-आँखों पर चढ़ाया, और यही गाँधी की कमजोरी भी बना। गाँधीजी ने कभी बहुजन की बात नहीं की, सर्वजन की बात की। इसीलिये उन्होंने ख़िलाफ़त जैसे सांप्रदायिक आन्दोलन का समर्थन किया। जिन्ना, रहमत अली, शौक़त अली और सुहरावर्दी जैसे वैमनस्य के बीजों को पनपने का मौका दिया और उस छोटे से तबके के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाकर नासूर को कैंसर बन जाने दिया। किया तो उन्होंने यह सब येन-केन-प्रकारेण राष्ट्रीय एकता को बरकरार रखने के लिये। दोनों समुदायों को किसी भी प्रकार संयुक्त परिवार की तरह रखने के लिये। लेकिन बात बेहद बढ़ जाने तक शायद वे यह नहीं समझ पाये कि कैंसर का इलाज़ वैद्य या हक़ीम के पास नहीं, शल्य-चिकित्सक(Surgeon) के पास होता है। काश उस समय गाँधीजी ने बहुजन की कीमत पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को बढ़ावा नहीं दिया होता तो मुल्क़ की तस्वीर आज कुछ और होती।

(जारी….)

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