जिउतिया..

सुबह सुबह माँ का फोन आया। पिछले कई वर्षों का क्रम है कि जिउतिया के दिन प्रातःकाल में फोन आता है, मैं अधनींदा फोन उठाता हूँ, वो फोन पर ही जिउतिया पहनाने का यत्न करती है, मैं वर्चुअल जिउतिया के गले में डाले जाने की कन्फर्मेशन देता हूँ, फिर आशीर्वादों की अंतहीन श्रृंखला.. यह क्रम तब भी कायम रहा जब ग्रेजुएशन के दौरान हॉस्टल में मोबाइल पर प्रतिबन्ध रहा। एक दिन के लिये छुप-छुपाकर फोन लाया करता था। अब सोचता हूँ जब टेलिकॉम क्रांति नहीं हुई थी तब परदेस में बैठे बेटों की माँए कैसे जिउतिया मनाती होंगी..? फिर गाँव में बीता बचपन याद आ जाता है, और आज के दिन पोखरे में मचने वाली धमाचौकड़ी.. मुस्कराते हुए सोच रहा हूँ कि कभी अपने ग्राम्य-बचपन के संस्मरण लिखूंगा। क्या पता एक और लपूझन्ने का पोटेंशियल छुपा हो.. सनातन कालयात्री (आपको टैग नहीं कर पा रहा हूँ) आज सुनने के लिये कोई गीत बतायेंगे क्या..?
2 Responses
  1. :) लपूझन्ना-पछाड़ संस्मरणों का इंतज़ार रहेगा.


  2. माँ की भावनाओं को भावनाओं से ही समझा जा सकता है...


मेरे विचारों पर आपकी वैचारिक प्रतिक्रिया सुखद होगी.........

शेयर करें

    अपनी खबर..

    My photo
    पेशे से पुलिसवाला.. दिल से प्रेमी.. दिमाग से पैदल.. हाईस्कूल की सनद में नाम है कार्तिकेय| , Delhi, India

    अनुसरणकर्ता

    विजेट आपके ब्लॉग पर

    त्वम उवाच..

    कौन कहाँ से..