दयालु सुकुल चाचा, दसविदानिया, 8086 की मैक्सिमम मोड में 8251 से इंटरफ़ेसिंग और बुश को जूते। याने हम हैं ज़िन्दा ये बताने का वक्त आया है..

नमस्कार, सत श्री अकाल, आदाब अर्ज और अंगरेजी वाला हैलो। यह पोस्ट बस ये बताने के वास्ते है कि बंदा अभी ज़िन्दा है और ’वेल इन शेप’ है।

असल में हुआ ये कि कल कई मन्वन्तरोपरांत जब बालक ने अपनी ऑरकुट प्रोफ़ाइल खोली और एक मित्र को कबाड़(Scrap) भेजा तो पलटकर जवाब आया- अरे, अभी तू ज़िन्दा है। आश्चर्य!

तो भईया हमने सोचा कि ग़लतफहमियों को फैलने से बचाने के लिये एकाध ठेलनीय चीज़ का जुगाड़ किया जाय, लेकिन ससुर दिमाग इतना भन्नाया हुआ है कि कौनो आईडिये नहीं आ रहा।

बात यों है कि अपनी खबीस ज़िन्दगानी में हर चार महीने पर मासूमों के शारीरिक और मानसिक शोषण का सरकार द्वारा प्रेरित एक कुत्सित प्रयत्न होता है जिसे हम एंड-सेमेस्टर परीक्षाओं के नाम से जानते हैं। एक बार पुनः उसी कुत्सित साजिश का शिकार होने का मौका आया था जिसने बिलागिंग का भूत तो क्या बड़े-बड़े बरम बाबाओं का भी पानी उतार दिया।

किन्हीं अच्छे दिनों में माँ-बाप का सपना होता था- एक बेटा डाक्टर तो दूजा इंजीनियर। डाक्टरी में तो आज भी गनीमत है, इंजीनियर तो अईसे बे-भाव के पैदा हो रहे हैं कि पूछिये ही मत। बैंगलोर-हैदराबाद में चले जाइये तो देखकर थूकना पड़ता है कि किसी बी.टेक पर न जा गिरे। और अगर गुलाबी पर्चियों का यही दौर जारी रहा तो लाख ढूंढने की कोशिश कर लीजिये, थूकने की जगहिये ना मिलेगी।

पिछ्ले दिनों एक सीनियर पास-आउट से बात हुई। विप्रो में बैठे हैं(अब काम नहीं मिल रहा तो बैठे ही कहे जायेंगे)। चार महीनों से एक सहकर्मिका को ताड़ रहे थे। एक दिन मोहतरमा ने सरप्राइज देने के वास्ते इलू-इलू वाला गुलाबी कार्ड उनकी टेबल पर चुपके से रख दिया। भाई साहब ने देखा तो पछाड़ खाकर गिर पड़े। समझे कि हो गई छुट्टी, आ गया समय झोरा-झंडा बांधकर ’चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है’ करने का। वो तो खोलकर देखा तो जान में जान आई।  अभी ई हाल है तो बाबा वैलेंटाइन की जयंती पर जाने कितने खेत रहेंगे!

तो खैर पँचवी बार इस नरक-चक्र से गुजरना पड़ा।सी आर ओ से खिलवाड़ जब नया-नया बी.टेक ज्वाइन किया था, तो पहली बार CRO देखकर  भी खुशी के मारे सीना गज भर चौड़ा हो गया था, और जब C++ में पहली बार "Hello World" वाला प्रोग्राम बनाया तो सपने में बिल गेट्स और स्टीव जाब्स की कुर्सी भी हिलती हुई दिखाई दी थी। खाली एक सेमेस्टर मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़नी थी(अपना ट्रेड तो इलेक्ट्रानिक्स था) लेकिन रैगिंग के दरमियान भी छुपते-छुपाते शहर गये और मय एप्रन-ड्राफ़्टर दुनिया भर का साजो-सामान खरीद लाये। तुर्रा यह कि दो-दो सेट खरीदे, ताकि एक के खराब होने की सूरत में वक्त न बर्बाद हो।

ड्राफ़्टर से बमुश्किल पन्द्रह-बीस लाइनें खींची होंगी और दो-तीन बार ही एप्रन पहनकर रन्दा-हथौड़ा चलाया होगा कि पहला सेमेस्टर वीरगति को प्राप्त हुआ।

ड्राफ़्टर का क्या किया जाय, यह दो साल बाद भी यक्षप्रश्न बना हुआ है। अलबत्ता एप्रन पर गणेशवाहन की कृपा देखकर समय रहते पैतृक भृत्य बुन्नीलाल को विंटर-आफर के तौर पर सप्रेम गिफ्ट किया गया। हुए नामवर बेनिशाँ कैसे-कैसे।

इस दुर्घटना के बाद दिल को वह ठेस पहुँची कि फ़िर आज तलक साजो-सामान तो क्या, किताबें खरीदने क विचार भी नहीं आया।

गुरुर्देवो भवःसच तो यह है कि बी.टेक सेमेस्टर-दर-सेमेस्टर व्यक्ति को निस्पृह-निरपेक्ष-निस्पंद रहने का संदेश देता रहता है। तीसरे सेमेस्टर में NS में वो धाक थी कि बड़े-बड़े सूरमा भी अपने आगे चित्त थे। सोचा था राजेन्द्र बाबू के बाद अगला ’इक्जामिनी इज बेटर दैन इक्जामिनर’ पैदा हो चुका है। रिजल्ट आया तो पता चला कि केवल तीन नंबर से बत्ती लगने से बच गये याने तैंतीस नंबर। उसी दिन से सब्जेक्ट विशेष से मोह समाप्त हुआ। पाँचो पेपरों को बराबर टाइम देने लगे, मतलब पढ़ाई ही बंद कर दी। घोर निराशा में चौथा सेमेस्टर दिया तो भी परसेंटेज पर कोई खास फ़रक नहीं पड़ा। फ़िर तो समझो गुरुमंत्र मिल गया।

इस सेमेस्टर में भी खास पढ़ाई नहीं हुई। पढ़ने में सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जितनी मेहनत रटने में लगती है, उससे कहीं ज्यादा छः महीने बाद उसे भुलाकर नई चीज़ रटने में। सो भइये हम अपनी हार्ड-डिस्क हमेशा फ़ारमैट रखने लगे।

चलिये भी, क्या रामकहानी शुरू कर दी। खैर, इस बीच तीन ऐसी घटनाएं हुईं कि जी खुश हो गया।

पहली थी- माइक्रोप्रोसेसर के इम्तहान के ठीक पहले देखी गई ’दसविदानिया’। हमारे भूतपूर्व बी.टेक बंधुओं को माइक्रोप्रोसेसर के दुःस्वप्न आज भी याद होंगे। इन्हीं बुरे सपनों के बीच एक खुशनुमा झोंके की तरह आई ’दसविदनिया’. सच्ची मानिये, जी खुश हो गया इतनी खूबसूरत फ़िल्म देखकर। आगे की चर्चा के लिये निकहत क़ाजमी से संपर्क करें।

दूसरी घटना थी- बुश चच्चा के विरुद्ध पादुका-षड्यंत्र। यह बात भी इतनी पुरानी हो चुकी है कि एक पैराग्राफ भी लिख नहीं पा रहा हूँ क्योंकि जानता हूँ आप लोगों के माउस में एक स्क्राल-व्हील भी होगी।

तीसरी युगप्रवर्तक घटना थी अपने अनूप सुकुल जी द्वारा इस नाचीज की(और उसके चेहरे-मोहरे की) तारीफ। आपके सौंदर्यबोध और उपमा अलंकार के घनघोर ज्ञान की क्या बात करें, हम तो आज भी सोचकर लजा जाते हैं। यह दीगर बात है कि हमारे जुल्फ़ें कटवाने के बाद राजेश खन्ना और देवानन्द दोनों ने समर्थन वापस ले लिया और आज की डेट में हम शिबू सोरेन बने घूम रहे हैं। जो भी हो, इस उपमा के लिये धन्यवाद। कामना है कि चौखम्भा सुरभारती का अगला प्रकाशन कालिदास ग्रंथावली न होकर शुक्ल ग्रंथावली हो।

एक-दो-तीन...... कुल ८३ लाइनें हो गईं। चलिये एक पोस्ट का जुगाड़ और हुआ। अब ठेले देता हूँ, किसी को चोट लगे तो आनी मानी दोस।

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    पूर्वांचल के एक छोटे से ज़िले महराजगंज के एक गाँव मे खालिस किसान परिवार में जन्मा..., बरेली --> दिल्ली, India

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