किस जन-गण-मन अधिनायक की स्तुति करें..? किस भाग्यविधाता के आगे झंडी लहरायें..?

एक और छ्ब्बीस जनवरी बीत गई। सेना के तीनों अंगों के जवान एक बार और कदमताल मिलाकर चल लिये, उँची इमारतों पर तिरंगा एक बार और फहर गया, मिठाइयां फिर बँट गईं, जन-गण-मन अधिनायक की स्तुति एक बार और हो गई, एक और छब्बीस जनवरी बीत गई।

लेकिन यह गणतंत्र है किसका..? क्या इसी गणतंत्र का सपना देखतीpic हमारे राष्ट्रनायकों की आँखें मुंदी थीं..? उनसठ साल पहले ही क्या हम ग़लत रास्ते पर चल पड़े थे या इन लम्बी, अँधेरी, कुहासे भरी राहों में कोई मोड़ जो लेना था, वह छूट गया..? कुछ तो ग़लत है वरना मेरे आगे ये दीवार कैसी..? कोई रास्ता क्यों नहीं सूझता..?

कालाहाँडी और पलामू के आदिवासी जो भूख मिटाने के लिये बच्चे बेच रहे हैं, बन्दर-साँप-चूहे और पेड़ की पत्तियाँ खा कर गुजारा कर रहे हैं वे किस जन-गण-मन अधिनायक की स्तुति करें..? खेलने-कूदने की उम्र में जो हाथ प्लेटें साफ कर रहे हैं, पटाखे बना रहे हैं, दुकानों में/कालीन उद्योग में ज़िन्दगी गर्क़ कर रहे हैं वे किस भाग्यविधाता के आगे झंडी लहरायें..? निजीकरण के नाम पर फ़ीसें बढ़ाकर, शिक्षण संस्थाओं को दौलतमंदों के नाम आरक्षित कर जिन छात्रों की प्रतिभा दौलत और सियासत के जूतों तले रौंदी जा रही है, वे तव शुभ आशिष माँगें या भविष्य को उज्जवल बनाने के लिये समय रहते हाथों में जस्ते का कटोरा थाम लें..? कहाँ है इनका गणतंत्र..?

मेरा कश्मीरी विस्थापित दोस्त कहता है हमारे बगीचे में जो सेब होते थे, काश तुझे खिला सकता। तब शायद तू समझ पाता ये मेस में मिलने वाले फल सेब नहीं कुछ और हैं.. उमर अब्दुल्ला कहते हैं वादी में ’हिन्दुस्तानी’ सीआरपीएफ़ के चलते कश्मीरी एलियनेशन(alienation) फील कर रहे हैं। शायद मेरे दोस्त को भी फील होता होगा..

तथाकथित ’फ़ेक’ जामिया एनकाउन्टर में मारे गये इंस्पेक्टर शर्मा को अशोक चक्र दिया जाता है। उनकी विधवा राहत की साँस लेती हैं। पतिदेव अब जाकर ’ऑफिशियली शहीद’ हुए हैं। शायद अब सवाल कम हों।

सिर्फ एक अनजाना डर दिखाकर, धर्मभीरुता का फायदा उठाकर एक पूरी क़ौम को रोटी-पानी-मकान-बिजली-सड़क से महरूम रखा गया, नतीजा उनकी रग-रग में कट्टरता लहू के साथ रवाँ है। और आज उनके मजहबी अंधेपन का आलम यह है कि किसी को ग़जा पर हुए हमले पड़ोसी की ब्लास्ट में मौत से ज्यादा तक़लीफदेह लगते हैं। इतना हौवा खड़ा कर दिया जाता है कि देश के सर्वाधिक विकसित प्रान्त को विकास के चरम तक ले जाने वाला करिश्माई, आज की तारीख में राष्ट्रीय नेतृत्व का सबसे ’प्रामिसिंग’ दावेदार उन्हें सिर्फ ’मौत के सौदागर’ के रूप में ही स्वीकार्य है..। 

अठारह घंटे प्रतिदिन काम करके पैसे कमाने वाला एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर जब इनकम टैक्स देता है तो उसे पता नहीं होता कि यह गाढ़ी कमाई राष्ट्रनिर्माण की बजाय चंद सब्सिडी, लॉलीपॉप देने में जाया हो रही है। ग़रीब किसान के नाम पर भू-माफियाओं को, सहकारिता के बड़े मगरमच्छों को 84000 करोड़ का चारा देने में खर्च हो रही है।

एक सरकारी विभाग में कर्मचारी ’भयमुक्त समाज की पहरुआ’ के जन्मदिन पर प्राणों का उपहार देता है। उस आपराधिक मुख्यमंत्री की राजधानी से चुनाव मैदान में विरोधी पार्टी उसे खड़ा करती है जो मुंबई धमाकों का सजायाफ़्ता मुजरिम है। लोहिया, जयप्रकाश, महामाया बाबू की पार्टी आज पूंजीवादियों और सीमा परिहार, मुख्तार अंसारी, और आज़म खाँ जैसों की जेब में है।

गणतंत्र सठिया रहा है। नहीं, अभी तो युवा है। राजनीति ने युवा की परिभाषा ही बदल दी है। मुल्क़ की आधी आबादी 40 वर्ष से नीचे है, उसका नेतृत्व करने के लिये अस्सी साल के युवा दम ठोंककर पाले में खड़े हैं, सभी कह रहे हैं-अभी तो मैं जवान हूँ।

युवा पीढ़ी यौवन में मदमस्त है। भगत सिंह के साथ ब्रिटिश शासन की चूलें हिला देने वाला, जयप्रकाश के साथ भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ बिगुल बजाने वाला युवा आज रोलिंग स्टोन के साथ कूल्हे मटकाने के लिये पुलिस के डंडे खाने को भी तैयार है। जातिवाद, आरक्षण की राजनीति के खिलाफ एक राजीव गोस्वामी संसद के सामने आत्मदाह कर लेता है, तो उसी का समवयस्क शराब न पेश करने पर जेसिका लाल को गोली से उड़ा देता है, प्रपोजल न स्वीकार करने पर प्रेमिका को एसिड से जलाकर मार देता है। वहीं एक लड़की नये प्रेमी के साथ मिलकर पुराने प्रेमी के शरीर के 300 टुकड़े कर देती है।

प्रश्न वहीं है- कहाँ रास्ता भूले हम..? कहाँ से ये दीवार आई सामने..? कहीं सुना है.. हर डेड-एंड से भी एक रास्ता निकलता है। वह है यू-टर्न का। 

क्या वक़्त आ गया है यू-टर्न लेने का..? इज इट टाइम टू कलेक्ट एंड बर्न एवरीथिंग, एंड टू स्टार्ट अगेन फ्रॉम द एशेज टू ग्लोरी..?

शायद कोई और रास्ता है भी नहीं। किसी प्रसिद्ध कवि की पंक्तियां याद आ रही हैं--

भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिये आज भी सजा मिलेगी फाँसी की.
जनता की यदि बात करोगे, तो गद्दार कहाओगे,
बम्म-सम्म की छोड़ो, भाषण दिये कि पकड़े जाओगे..

14 Responses
  1. PD Says:

    अभी कहां भाई, यह यू टर्न लेने के लिये भी छोटे-छोटे टर्न लेने होते हैं.. पहले तो वह छोटे-छोटे टर्न लें हम, रास्ता उसी में दिख जायेगा..


  2. gunja paraste Says:

    sach kaha hai aapne


  3. बहुत दमदार लिखा है आपने. हमारी कौम सिर्फ अपने प्रिजुडिस की वजह से तरक्की की दौड़ में पीछे रही है. लेकिन दक्षिणपंथी राजनीति ने भी तो इस डर को भुनाने में कोई क़सर नहीं छोडी.
    शायद वक्त आ गया है कांग्रेस और भाजपा दोनों की राजनीति का बायकाट करने का.


  4. लिखा बहुत अच्छा है, कोई दो मत नहीं..किन्तु सिर्फ और सिर्फ हताशा ही क्यूँ..बहुत सा जल गुजरा है गंगा में इतने सालों मे..कुछ तो साफ सुथरा भी था. कुछ अच्छे कार्य जो भविष्य में कुछ बेहतर देखने की उम्मीद जगाये हैं, उन्हें भी देखिये. निश्चित ही इन्हें न नजर अंदाज करें.


  5. कार्तिकेय भाई, हम ने आजादी पाई ही कहा है,जब आजादी मिली उस दिन से देश की नींव गलत ओर अवसर खोरो के हाथो मे आ गई, ओर जब मकान की नींव ही गलत हो तो वो मकान कितने दिन चलेगा, एक दिन तो गिरेगा ही, अब यही हाल अपने देश का है, आप ने बहुत सटीक ढंग से लिखा है.
    धन्यवाद


  6. बिल्कुल सच कहा ...आज हम किसका अनुसरण करें ऐसा कोई आदर्श भी नही है !


  7. common man Says:

    कार्तिकेय, गुलामी से भी बदतर हालात हैं, उस समय गुलाम बनाने वाले विदेशी थे, आज अपनों ने ही गुलाम बना दिया.


  8. बेहद सटीक एवं सामयिक आलेख के लिये बधाई स्वीकारें....


  9. अरे! अभी तो ये अंगड़ाई है। गणतंत्र किस्तों में आयेगा भाई! जी न हलकान करो!


  10. बेहद गम्भीर मसलों पर आपने बिलकुल आग उगलने वाले तेवर में कलम चलाई है। मैं आपकी बातों से पूरी तरह से सहमत हूं। अब यू टर्न होना ही चाहिए।


  11. मर्ज का पता चल जाना अच्छी बात है। सवाल उपचार ढूँढ्ने का है। जब तक सही दवा का पता न चले तब तक उलझन बनी रहेगी और नौजवान हाथों की कलम इसी प्रकार तड़प-तड़प कर रोष प्रकट करती रहेगी।

    विध्वंस की तुलना में सृजन हमेशा कठिन रहा है। अंग्रेजी राज का विध्वंस हमने कर दिया। भारतवर्ष का निर्माण उससे कठिन काम है। यह किसी क्रान्ति से नहीं बल्कि एक-एक ईंट करीने से सही जगह फिट करने से होगा। सबको अपनी ओर से छोटा ही सही सकारात्मक योगदान करना होगा।

    हमें दूसरों की आलोचना से अधिक अपने हिस्से की जिम्मेदारी अटल निष्ठा और सजगता से पूरी करने की आदत डालनी चाहिए।

    जब तक हम अपने लिए और दूसरों के लिए अलग-अलग आचार संहिता बनाते रहेंगे तब तक ऐसे ही बात बिगड़ती रहेगी।



  12. अरे किधर निकल लिये भाई! लिखना पढ़ना बंद! क्या पढ़ाई कायदे से हो रही है?


  13. कार्तिकेय जी आप सुन रहे हैं ?! ब्‍लॉगजगत आपको आवाज दे रहा है।


मेरे विचारों पर आपकी वैचारिक प्रतिक्रिया सुखद होगी.........

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    पेशे से पुलिसवाला.. दिल से प्रेमी.. दिमाग से पैदल.. हाईस्कूल की सनद में नाम है कार्तिकेय| , Delhi, India

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