ये पोस्ट तब लिखी थी, जब शीतलहर अपने अगले पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ने को बेकरार थी, परम आदरणीय नारायण दत्त तिवारी की बूढ़ी ख्वाहिशें की चीनी खतम होने का नाम नहीं ले रही थी.. और भगवान अंशुमालि कुहासे से युद्ध में इज़्ज़त का फालूदा करवाने को जरा भी उत्सुक नहीं नजर आ रहे थे.. तारीख जनवरी माह के उत्तरार्ध का कोई भी दिन मान लें।
सच है, बहुत ठंड पड़ी इस साल। साल के पहले दिन सूरज ने अमर सिंह की तरह जो इस्तीफा दिया, सो पूरा महीना बीतने को आया, लेकिन नहिंये माने। गनीमत थी कि खिचड़ी के दिन दिख गये, वरना कुंभ में नहाने पहुंचे लोगों की आस्था का भ्रम टूटते देर न लगती। बहुतों ने नववर्ष का प्रथम स्नान खिचड़ी के ही दिन किया, और दूसरे स्नान की नौबत आज तलक नहीं आई।
कमबखत कुहरा लील गया कि डॉक्टर ने बेडरेस्ट की सलाह दे डाली। भगवान भुवनभास्कर बिलायमान हुए और बकौल के०पी० सक्सेना- "ठंड है कि किसी बूढ़े नेता की जिस्मानी हवस की तरह जाती ही नहीं"। असंख्य ऑक्टोजेनेरियन लोगबाग महाप्रयाण कर गये और अब भी लग रहा है कि पसलियाँ तोड़कर यह जाड़ा कलेजे में धंस जायेगा।
गेंहू की फसल पानी माँग रही है, लेकिन मौसम ऐसा नहीं हो पा रहा कि पानी चलाया जाय। बदली-कुहेसे-ओस में पाला मार गया तो? जनाउरों की हालत तो और गई गुजरी है। किसी छप्पर पे, बगीचे में बन्दरों को कुछ भी नहीं हासिल हो पा रहा। पत्तियां तक नोच-नोचकर खा गये, अब दूर-दूर तक कुछ भी नहीं। ठंड में कुड़कुड़ाते, एक टुकड़ा बेल पर सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट की जंग लड़्ते पेड़ों पर लटकायमान हैं।
विवाह के बाद बहन के ससुराल चले जाने के बाद बिल्ली का यह आखिरी मसीहा भी नहीं रहा। बेहतर भविष्य की तलाश में बिल्ली ने दूसरे घरों की तरफ पलायन किया। लगभग बीस-एक दिन बिल्ली नहीं दिखी। चिंतित होकर माँ ने दूसरे घरों में पता करवाया.. कोई सूचना न मिलने पर उदास मन से सबने यही माना कि उसकी इहलीला समाप्त हुई। लेकिन गाँव भर से मार-दुत्कार खाकर पुन: कंकालशेष बिल्ली वापस आई। और अब ये जाड़ा उसके प्राणों का ग्रहण बना हुआ है। चुल्हे और घर के अन्दर वाले कउड़े से शरीर तापकर किसी तरह जी रही है। हम लोगों के साथ तो बैठी रहती है, लेकिन बाबूजी के बैठने पर दूर हट जाती है। अब यह उनका लिहाज है या उनकी खड़ाऊं का भय, वही जाने।
तो भगवान भुवनभास्कर, बहुत हुई गुंडागर्दी.. अब चाहे पुरानी पार्टी में लौटिये या नई बनाइये। जो भी हो, एक विशाल जनसमूह प्रतीक्षारत है.. आइये, जनसभा को संबोधित कीजिये। किसी पीड़ित आत्मा की पुकार की एक बानगी पेश है-
मैं क्या कर रहा हूँ तू क्या कर रहा है
कड़ाके की सर्दी है और तू कमीने
जनाजे पे मेरे हवा कर रहा है।
