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पारिवारिक मूल्यों की संरक्षक एक आवारा मसीहा को अश्रुशेष श्रद्धांजलि..

गाँव आना हुआ। लोगबाग वही, धूर-धक्कड़ वही, पोखरे में काई भी उतनी ही, और उसमें नहा रहे महँगू के लौण्डों के बदन पर चीकट मैल भी उतनी ही.. लेकिन परिवार का एक अभिन्न सदस्य अनुपस्थित था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी घृतकौशिक गोत्र: त्रिप्रवर: बाभन परिवार की रसोई जुठारते मार्जार वंश की चश्मो-चिराग़, मेरी अग्रजा की लाडली "मोनू की बिलार" परिदृश्य से गायब थी.. आशंका सच निकली.. माँ की जानकारी ने अद्यतन किया कि बिलार जीवन रंगमंच पर अपनी भूमिका निभा कर प्रभु चरणों को प्राप्त हुई। दुखित हृद्य को एक ठेलनीय सामग्री की भूमिका बँधती दिखी। नया न लिखकर डायरी के पुराने पन्ने पलटे। एक संस्मरण चेंप देना सही समझा।

ये पोस्ट तब लिखी थी, जब शीतलहर अपने अगले पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ने को बेकरार थी, परम आदरणीय नारायण दत्त तिवारी की बूढ़ी ख्वाहिशें की चीनी खतम होने का नाम नहीं ले रही थी.. और भगवान अंशुमालि कुहासे से युद्ध में इज़्ज़त का फालूदा करवाने को जरा भी उत्सुक नहीं नजर आ रहे थे.. तारीख जनवरी माह के उत्तरार्ध का कोई भी दिन मान लें।

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"अईसन जाड़ त कब्बो नाहीं परल बाबू".. नरायन महतो खँखार कर बोले। "बुझात बाटे जइसे ई सीत बाता तूरि के करेजवा में धंसि जाई.."

सच है, बहुत ठंड पड़ी इस साल। साल के पहले दिन सूरज ने अमर सिंह की तरह जो इस्तीफा दिया, सो पूरा महीना बीतने को आया, लेकिन नहिंये माने। गनीमत थी कि खिचड़ी के दिन दिख गये, वरना कुंभ में नहाने पहुंचे लोगों की आस्था का भ्रम टूटते देर न लगती। बहुतों ने नववर्ष का प्रथम स्नान खिचड़ी के ही दिन किया, और दूसरे स्नान की नौबत आज तलक नहीं आई।

कमबखत कुहरा लील गया कि डॉक्टर ने बेडरेस्ट की सलाह दे डाली। भगवान भुवनभास्कर बिलायमान हुए और बकौल के०पी० सक्सेना- "ठंड है कि किसी बूढ़े नेता की जिस्मानी हवस की तरह जाती ही नहीं"। असंख्य ऑक्टोजेनेरियन लोगबाग महाप्रयाण कर गये और अब भी लग रहा है कि पसलियाँ तोड़कर यह जाड़ा कलेजे में धंस जायेगा।

गेंहू की फसल पानी माँग रही है, लेकिन मौसम ऐसा नहीं हो पा रहा कि पानी चलाया जाय। बदली-कुहेसे-ओस में पाला मार गया तो? जनाउरों की हालत तो और गई गुजरी है। किसी छप्पर पे, बगीचे में बन्दरों को कुछ भी नहीं हासिल हो पा रहा। पत्तियां तक नोच-नोचकर खा गये, अब दूर-दूर तक कुछ भी नहीं। ठंड में कुड़कुड़ाते, एक टुकड़ा बेल पर सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट की जंग लड़्ते पेड़ों पर लटकायमान हैं।

उम्र के आखिरी पड़ाव पर चल रही घर की बिल्ली अपने पेट में ठंड लग जाने से परेशान है। सारा दिन कौड़े और चूल्हे के पास बिता रही है। जबतक चचेरे भाई-बहन छोटे थे, तबतक रोज ही उनका गिराया हुआ / उच्छिष्ठ दूध पीने को मिल जाया करता था। आदत इतनी बिगड़ गई कि रोटी-चावल का जायका ही अच्छा न लगे। सुबह पाँच बजे घर का दरवाजा खुलते ही दौड़कर बाहर से सीधे रसोई में.. अपने काम की चीजें ढूंढने में रत। माँ कहती है- "पूर्वजन्म में या तो इस घर की मलिकाईन रही होगी या कोई मुँहलगी कहाईन।" बड़ी बहन के आगे पीछे मँडराया करती। वह भी अम्माँ-बाबूजी की नजरों से बचाकर आलमारी से दूध-दही निकालते वक्त थोड़ा सा जानबूझकर गिरा देती। ग़ज़ब की सेलेक्टिव कंज्यूमर बिलार अगर दो दिन पुराना दही हो तो सूंघकर छोड़ देती। माँ चिढ़कर कहती- "इनके त सजाSव दही चाहीं।" अम्मां को यह लगाव अच्छा नहीं लगता। वे बिल्लियों को धोखेबाज बतातीं। कहती हैं कि कुत्ते में स्वामिभक्ति होती है- "कुकुरा कहेला कि गोसैयां सलामत रहें कि कउरा पाईं, बिलरिया कहे कि गोसैयां आन्हर होखें कि एक्के में खाईं" 

विवाह के बाद बहन के ससुराल चले जाने के बाद बिल्ली का यह आखिरी मसीहा भी नहीं रहा। बेहतर भविष्य की तलाश में बिल्ली ने दूसरे घरों की तरफ पलायन किया। लगभग बीस-एक दिन बिल्ली नहीं दिखी। चिंतित होकर माँ ने दूसरे घरों में पता करवाया.. कोई सूचना न मिलने पर उदास मन से सबने यही माना कि उसकी इहलीला समाप्त हुई। लेकिन गाँव भर से मार-दुत्कार खाकर पुन: कंकालशेष बिल्ली वापस आई। और अब ये जाड़ा उसके प्राणों का ग्रहण बना हुआ है। चुल्हे और घर के अन्दर वाले कउड़े से शरीर तापकर किसी तरह जी रही है। हम लोगों के साथ तो बैठी रहती है, लेकिन बाबूजी के बैठने पर दूर हट जाती है। अब यह उनका लिहाज है या उनकी खड़ाऊं का भय, वही जाने।

तो भगवान भुवनभास्कर, बहुत हुई गुंडागर्दी.. अब चाहे पुरानी पार्टी में लौटिये या नई बनाइये। जो भी हो, एक विशाल जनसमूह प्रतीक्षारत है.. आइये, जनसभा को संबोधित कीजिये। किसी पीड़ित आत्मा की पुकार की एक बानगी पेश है-
वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहा है
मैं क्या कर रहा हूँ तू क्या कर रहा है
कड़ाके की सर्दी है और तू कमीने
जनाजे पे मेरे हवा कर रहा है।


पुनश्च: बिलार जाड़ा तो खेप गई, लेकिन घर में काम करने वाली मतवा ने एक दिन उद्घोषणा की कि बिलार को दरवाजे पर एक पुआल के ढेर पर ब्रह्मलीन पाया गया।  

सिद्धार्थ का दूसरा महाभिनिष्क्रमण..

गत 20 जनवरी को मेरे बड़े भाई डॉ० सिद्धार्थ Ischemic Heart and Brain Disorders पर शोध करने के लिये 3 साल के लिये दक्षिण कोरिया के लिये रवाना हुए.. परिवार में किसी की पहली विदेश यात्रा है यह.. सबका विचलित होना स्वाभाविक है.. मेरे विचलन का परिणाम है ये कुछ पंक्तियाँ..




भैया,
जा रहे हो तुम ना,
इस वतन से, इस आबो-हवा से दूर
नये लोगों के बीच
नई परिस्थितियों के बीच..




देखो-
तुम्हें विदा करने कौन आया है....!

गाँव के बाहर कच्चे आम के बागीचे/टपकते महुए के बाग
उसके पार धान के खेत/पम्पिंग-सेट के हौदे
कर्बला पर के साँप-बिच्छुओं की अनगिन दंतकथायें
पेड़ की कोटरों में छिपे चिड़ियों के अंडे
वे सारे तोते, जो तुमने पोसे
तुम्हारे खींचे कबड्डी-चीके के पाले/गाड़ी गईं विकेट
तुम्हारी लखनी/दुबरछिया के डंडे/सतगाँवा की गोटियाँ
तुम्हारा पहला बल्ला/सॉरी, मैनें तोड़ दिया था उसे
और तुम्हारी पहली ट्रॉफियाँ- जीते गये अनगिनत कंचे
जो मैनें हारे, सीखने की प्रक्रिया में.....


महिया में डूबा भूजा/अलाव में भुना आलू
नेपाली रबर की गुलेल- बहुत शिकार किये थे तुमने
पाठशाला के मौलवी साहब के डंडे
पोखरे का शिव मंदिर/घाट की सीढ़ियाँ/शिवरात्रि का मेला
नागपंचमी के दिन पुतरी पीटने के ताल-तलैये
दशहरे की रामलीला/ठाकुर जी का झूलन


बाबूजी का अखबार-ऐनक-खड़ाऊँ/अम्माँ का मीसा हुआ भात/चटनी
सोते हुए माँ के हाथों की खिलाईं रोटी/दी गई थपकियाँ
पापा के हाथ/बिना जिनके पकड़े दूध तुम्हारे गले से नीचे नहीं उतरता था
छोटे चाचा/जो रामलीला में तुम्हारे पीछे खड़े होकर तुम्हें
चतुर्भुज विष्णु का रूप देते/जबकि तुम स्टेज पर उँघ रहे होते
बड़े चाचा की लेग-स्पिन होती गेंदे
हर छुट्टी में तुम्हारे-मेरे पीछे पेट की दवा और पानी का गिलास लेकर दौड़ती बहन
जिसका पाणिग्रहण कराके विदा किया है तुमने अभी
टिल्लू, आदित्य, छुटकी, छोटा बाबू/तुम जिनके लिये बाबाभैया हो
और मैं..!


और भी हैं....
लखनऊ यूनिवर्सिटी के लेक्चर हॉल/सिमैप की लैब
क्लासिक की चटनी/बादशाहनगर का प्लेटफॉर्म/गोरखनाथ एक्सप्रेस
रविवार को मौसी के घर का खाना/गंजिंग
रीगल सिनेमा/पालिका बाजार/नाथू के समोसे
कोटला फीरोजशाह के बंद दरीचों के बाशिंदे
बुआ की बनाई घुघनी/दिल्ली की ठंड
और...और...और...


और भी असंख्य चीजे हैं, जो विदा करती हैं तुम्हें
ये और कुछ नहीं, तुम्हारे अस्तित्व के कण हैं/तुम्हारे फंडामेंटल पार्टिकल्स
ये सारे रंग/खुशबुयें/स्वाद/इमेजेस/महसूसियात/श्रुतियां/स्मृतियां
सहेज कर ले जाना अपने साथ
खुद को कभी अकेला नहीं पाओगे/अजनबियों के बीच भी
निस्वार्थ प्रेम रहा है इनका/किसी प्रतिदान की आकांक्षा नहीं




लेकिन मेरी एक आस है.....


सदियों पहले तुम्हारे ही एक  नेमसेक ने घर छोड़ा था
तो दुनिया को मिली थी ज्ञान, सत्य की अद्भुत विरासत
शांति के अनंतिम शिखर..
मैं चाहूँगा-
इस गाँव-गिराँव-समाज-राज्य-राष्ट्र को कुछ मिले तुमसे
सुना तुमने!


मैं चाहूँगा,
यह सिद्धार्थ का दूसरा महाभिनिष्क्रमण सिद्ध हो..!

ऐवेटॉर(अवतार)...भव्य तकनीक के नीचे सांस लेता हुआ सा कुछ बचा रह गया है..


कुछ दिन पहले एक फिल्म देखी.. ऐवेटॉर/या अवतार कह लीजिए शुद्ध हिंदी में। आज मन में आया तो कुछ ठेले देते हैं इसी फिल्म पर।

फिल्म समीक्षा मेरे प्याले की चाय नहीं(Not My Cup Of Tea), न ही मेरा ऐसा कोई उद्देश्य है। लेकिन उस फिल्म के भव्य एनिमेशन और भारी-भरकम तकनीक के पीछे कुछ साँस लेता हुआ सा दिखा मुझे, जिसे यहाँ सबके साथ बाँटना मैनें अपना फर्ज़ समझा.. सामयिक भी है।

फिल्म के निर्देशक हैं जेम्स कैमेरॉन.. यह उनकी तीसरी फिल्म थी, जो मैनें देखी। टाइटेनिक और टर्मिनेटर-द जजमेंट डे के बाद। कैमेरॉन को भव्य फिल्में बनाने का शौक है.. इन फिल्मों का कैनवस इतना बड़ा होता है कि दर्शक आत्मविस्मित सा, चौंधियाया सा रह जाता है..! शायद यही इन फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत(और कमजोरी भी) है। पूरी फिल्म के दौरान आप कहीं भी इतने खाली नहीं हो पाते कि कहानी किस दिशा में जा रही है, इस बारे में सोच सकें या फिर अभिनेताओं के चेहरे पर आ रहे भावों की सूक्ष्मता/फ्लैट चेहेरों का विवेचन कर सकें..! अंतत: ढाई घंटे बाद जब आप सिनेमाहाल से बाहर निकलते हैं, तब क्षणजीवी अभिनय क्षमता और कथानक की जगह जो चीज आपके दिलो-दिमाग पर हावी होती है, वह है आतंकित कर देने वाली तकनीक!

टाइटेनिक में भी भीमकाय सेट्स, हिमखंड और ग्राफिक्स के अतुलनीय बोझ तले साँस लेती एक मासूम सी कहानी थी.. बंधनों को तोड़ने को आतुर एक लड़की ‘रोज’, जो दुनिया को नये ढंग से देखना चाहती है.. जो दुनिया को हमेशा अपनी पारिवारिक दौलत के चश्मे से देखती-देखती ऊब चुकी है.. समाज का अभिजात्य बंधन उसे खुलकर साँस लेने का स्पेस जब मुहैया नहीं करा पाता, तो अपनी आज़ादी का रास्ता उसे आत्महत्या में ही नजर आता है!


इसी मोड़ पर आता है ‘जैक’.. दुनिया देखा हुआ, समझता हुआ..! उसके साथ रोज साँस लेना सीखती है, खुलकर हँसना सीखती है.. वर्जनाओं को तोड़ने की मुहिम उसे समंदर में दूर तक थूकने से लेकर स्वच्छंदता के नये आयाम स्पर्श करने की ललक पैदा करती है..!

और फिल्म यहीं राह भटक जाती है.. भव्य जहाज का डूबना इतना आतंकित कर जाता है कि जीवित बची रोज जब लकड़ी के तख्ते पर जम चुके जैक के हाथों को छुड़ाती है, तो जमी बर्फ के टूटने के साथ आने वाली खट की आवाज के साथ उसके चेहरे पे आने वाले भाव किसी शून्य में विलीन होते से लगते हैं..

ऐवेटॉर का कथानक सीधा सा है..सन 2050, साढ़े चार प्रकाश वर्ष दूर एक ग्रह के सैटेलाइट ‘पंडोरा’ पर जीवन की खोज हो चुकी है.. धरती पर ऊर्जा के तमाम परंपरागत स्रोत शुष्क हो चुके हैं..! गैरपरंपरागत स्रोत भी अब मानव की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम हो चुके हैं..! ऐसे में वरदानस्वरूप एक तत्व ‘अनऑब्टेनियम’ का पता चलता है, जिसका विशाल भंडार पंडोरा वासी (जिन्हें ना’वी कहते हैं) लोगों के गाँव के नीचे दबा पड़ा है। विश्व के बड़े-बड़े उद्योगपतियों के अनुदान से एक प्रोजेक्ट चलाया जाता है, जिसमें कुछ मानवों के डीएनए में पंडोरावासियों का डीएनए मिलाकर उन मानवों के ना’वी प्रतिरूप(अवतार) तैयार किये जाते हैं.. ये प्रतिरूप देखने में बिलकुल ना’वियों जैसे हैं, और कंट्रोल सेगमेंट में लेटे हुए अपने आधे डीएनए के मालिक मानवों द्वारा मानसिक लिंक की सहायता से संचालित किये जा सकते हैं..

इनमें से एक है जैक सली(Jack Scully).. उसके वैज्ञानिक भाई का डीएनए भी अवतार प्रोजेक्ट के लिये चयनित होता है.. जिसके असमय मृत्यु हो जाने के बाद जैक को इस प्रोजेक्ट के लिये ले लिया जाता है..!

मानव सेना का कमांडर शक्ति बल के जरिये अनऑब्टेनियम पाने में यक़ीन रखता है..(टिपिकल अमेरिकन आर्मी).. जैक को अतिरिक्त कार्य सौंप दिया जाता है, अपने अवतार रूप द्वारा परंपरागत निवासियों की गुप्तचरी करने का.. उनकी कमजोरियों का पता लगाने का, जो उनके खिलाफ़ युद्ध में काम लाई जा सकें..

लेकिन जैसे-जैसे जैक ना’वियों को नजदीक से जानने लगता है, उसके विचारों में परिवर्तन आने लगता है। उन लोगों की प्रकृति के साथ सहजीविता.. पेड़ों के साथ बातें करना.. चिड़ियों की भाषा समझना, उन्हें अपनी भाषा समझाना... घोड़ों के साथ मानसिक-हार्दिक बन्धन जोड़ना.. उन्हें मन:शक्ति से निर्देश देना.. सब कुछ इतना निर्दोष है, इतना निश्छल, कि जैक को प्यार हो जाता है.. उनकी संस्कृति से, उसी संस्कृति में पली बढ़ी एक ना’वी युवती से..! शेष स्पष्ट हो गया होगा.. फिर वही तीर धनुषों के सहारे उन्नत तकनीक वाली मानव सेना का मुकाबला और उन्हें परास्त करना.. एवरग्रीन सत्य की विजय टाइप।

लेकिन बात "सत्यं वद, धर्मं चर" की ही नहीं है.. बात है, मानव की अनथक लिप्सा में चरमरा रहे पारिस्थितिकीय संतुलन(Ecological Balance) की.. तेजी से बिगड़ती खाद्य श्रृंखला की.. विलुप्त होती प्राकृतिक संपदा की... समाप्त होते ऊर्जा स्रोतों की.. और सबसे बढ़कर कभी न सुधरने वाली मानव प्रजाति की नित नई अक्षम्य भूलों की..

ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति ने उसकी अन्य कृतियों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है.. यह वह प्रजाति है, जो अपनी ही थाली में छेद करती जा रही है। अपनी ही जीवन-सप्लाई बंद कर रही है। अपने ही हृदय तक रक्त ले जाने वाली नसों को काट रही है..

प्राचीन भारतीय संस्कृति में प्रकृति के साथ समन्वय के असंख्य उदाहरण हैं..ये उदाहरण तेजी से ‘तरक्की(?)’ कर रही मानव जाति में भी लोक-श्रुतियों के रूप में, ग्राम्य परंपराओं के रूप में आज भी रचे बसे हैं.. कृषि के लिये हँसिये, थ्रेशर से होते हुए आज हम कम्बाइन हार्वेस्टर तक पहुँच तो गये हैं.. लेकिन बैसाख की जुताई से पहले खेत की मिट्टी की पूजा आज भी हलषष्ठी (हरवत मूठ) के दिन होती है.. "त्वदीयं वस्तु गोविन्दम" की तर्ज पर अपने खेत में उगे गन्ने, गंजी, सुथनी का उपभोग किसान चौथ से पहले नहीं करता.. पति - पुत्र का स्वास्थ्य ‘बर-बरियार’ पेड़ से शाश्वत ढंग से जुड़ गया है..


तेजी से विलुप्त होती परंपराओं के बीच, और ज़बर्दस्त कॉमर्शियलाइजेशन के साथ ये परंपरायें भले ही लोक जीवन से विलुप्त होती जा रही हों, लेकिन उनका संदेश नहीं विलुप्त हो सकता.. प्रकृति से उतना ही लो, जितना आवश्यक हो- "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा"... लेकिन मानव ने इस संदेश का पालन कब किया!!

चाहे ओजोन परत का क्षरण हो, चाहे ध्रुवीय बर्फ़ का पिघलना... कॉलोनाइजेशन के लिये किये जा रहे वनोन्मूलन के फलस्वरूप बढ़ रहे मनुष्य-वन्यजीव संघर्ष, जिनमें अंतत: नुकसान अ-मानवीय पक्ष को ही उठाना पड़ता है.. ये सब असंख्य उदाहरण हैं मानव की चिर अभीप्सा के, जो अभी तक शान्त नहीं हो पाई है, और शायद इस ग्रह की आहुति लिये बिना शान्त होगी भी नहीं..!

वर्ष 2009 बीत रहा है.. कुछ क्षणों का मेहमान यह वर्ष और किसी बात के लिये जाना जाय या नहीं.. यह ‘कोपेनहेगन’ के रूप में समूची मानव जाति की हार के रूप में इतिहास के पन्नों में स्थायी रूप से अंकित हो गया है..! संभवत: इस शताब्दी की सबसे बड़ी हारों में से एक.. मानव जाति ने सर्वसम्मति से इस ग्रह को ऐसे विनाशपथ पर ठेल दिया है जिसकी परिणति केवल अपने जीवन के कुछ अंतिम वर्ष गिनने में होने वाली है.. हमारी आने वाली पीढ़ियाँ (अगर कोई आईं तो) अपने पुरखों का नाम जुगुप्सा से लेंगी कि उनके पास मौका था इस मरते ग्रह का इलाज कर पाने का.. अब तो बीमारी टर्मिनल स्टेज में है..!

कोपेनहेगन वार्ता में कई द्वीपीय देश थे- मालदीव, सूरीनाम, सेशेल्स जैसे..! उनकी पुकार कैसे अनसुनी कर सकता है भला कोई? 2 डिग्री सेंटिग्रेड की सीमा भी जिनके देशों को ज्यादा समय तक नहीं बचा सकती थी, जिन्होंने 1.5 की सीमा तय करने की माँग उठाई थी, उन्हें 2 डिग्री की सीमा भी मयस्सर नहीं हुई.. विकसित देशों की भूख सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है.. उन्होंने इस ग्रह को जितना नुकसान पहले डेढ़ सदियों (1800-1950) में पहुँचाया, उतना पिछले पचास सालों में सारे विकासशील देश मिलकर नहीं पहुँचा पाये। विकासशील देशों को अपनी पहले से ही भूखी-नंगी जनता के लिये रोटी-पानी की व्यवस्था करनी है, सोलर कुकर तो बाद में बाँटेंगे..! विनष्ट होने के लिये सर्वसम्मत तो होना ही था।

ऐसा नहीं कि अब कुछ हो ही नहीं सकता..आवश्यकता दृढ़ निश्चय की है.. पिछले 62 सालों में जिनका ‘असली’विकास हुआ है, ऐसे अम्बानियों, बिड़लाओं, मित्तलों, सहाराओं को अपनी जेब ढीली करनी ही होगी.. पर्यावरण-मित्र तकनीकें अपनानी होंगी। ज्वलन्त उदाहरण हैं- रतन टाटा, और उनकी फाउंडेशन द्वारा चलाई जा रही ‘टाटा मार्गदीप’ परियोजना.. जो हर गाँव को पिचहत्तर फीसदी सब्सिडी पर सोलर पॉवर प्लांट मुहैया कराने के लिये कटिबद्ध है.. ऐसे प्रयास और भी होने चाहिये।

मुझे फिल्म के एक किरदार का बार-बार कहा जाने वाला कथन नहीं भूलता- यह सारी जीवन ऊर्जा प्रकृति की दी हुई है, जो उसे एक दिन लौटानी होगी। अब हमें तय करना है कि उस दिन प्रकृति के सम्मुख हम कैसे खड़े होंगे.. सर झुकाये हुए, या गर्व से कहते हुए- "जस की तस धर दीन्हि चदरिया"

अब से मनुष्य की इस ब्रह्माण्ड में जीवन की खोज करने के प्रयत्नों का धुर विरोध होना चाहिये.. इस ग्रह को विनाश के कगार तक हम लाये, अब इसे कायरों की भाँति नहीं छोड़ सकते.. दूसरे किसी ग्रह को ढूँढकर अपनी लालसा में विनष्ट करने से बेहतर है कि यह अहसानफरामोश मानव जाति इसी ग्रह पर आखिरी सांसे गिने..

किसी का कथन याद आ रहा है- ये प्रकृति हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में तो सक्षम है, लेकिन हमारी वासनाओं की पूर्ति में नहीं..!

पुनश्च: परीक्षाओं में व्यस्तता के कारण आपकी पोस्टों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहा.. क्षमाप्रार्थी हूँ..

और इसी पोस्ट के बहाने हमारी तरफ से नव-वर्ष की अग्रिम बधाई स्वीकार की जाये.. नये साल में मिलते हैं।

जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......

प्रिय मित्रों,
आज अपनी एक ऐसी कृति पोस्ट कर रहा हूँ, जो मेरे दिल के बेहद करीब है। बचपन गाँव में गुजारने के बाद मैं शहर में रहा तो ज़रूर, लेकिन दिल से गाँव की कसक आज भी नहीं छूट पाई है। कभी दुनिया भर के स्वार्थ और दोस्ती के लिबास में छुपी मक्कारी से दिल दुखा, तो टीस के उन्ही पलों में यह कविता कागज़ पर उतर आई.....










शाम
के अंधेरे कमरे में याद की किरणें आती हैं,
साथ ये अपने लाखों किस्से कई 'फ़साने लाती हैं.

सारी दुनिया सोई पड़ी थी जब अपने अपने टपरे में

तब गाँव के उस पुश्तैनी घर के कोने वाले कमरे में-

दी मेरे रोने की आवाजें पहली बार सुनाईं थीं,
बूढे घर के कोने कोने में खुशियाँ ही छाईं थीं.
मेरी किलकारी
के स्वर उस घर में फ़िर-फ़िर गूंजे थे
और
पुरनियों के कंठों से सोहर के स्वर फूटे थे.
यह सब केवल स्वप्न था मैनें यह रहस्य पहचाना है
जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......




है याद मुझे स्नेहिल माँ की गोदी की वह गरमाई भी,
और पिता के उन्ही प्रतिष्ठित कन्धों की ऊंचाई भी.
भइया ने नापा तो पाया मैं डेढ़ हाथ का बौना था,
और दीदी के लिए मैं आया नया नया खिलौना था.
थाम पिता की उंगलियाँ जब मैंने पहले कदम रखे,
तबसे सारी राह चला हूँ बिना रुके और बिना थके.
है याद मुझे मौलवी साब को चिढा स्कूल से भाग जाना,
नमक जेब में हाथ में डंडा, अमिया तोड़-तोड़ खाना।



सावन के उफने खेतों में मछली पकड़ने का वो कांटा,

और पकड़े जाने पर भईया के हाथों का वह चांटा.
यह सब केवल स्वप्न था मैनें यह रहस्य पहचाना है,
जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......



यूँ पंख लगाकर गया बचपना केवल यादें छोड़ गया,
छठें साल का पहला दिन ही सारे सपने तोड़ गया.
लाख खुशी होने पर भी कुछ टूट गया सा लगता था,
शहर के शोर-ओ-गुल में गाँव छूट गया सा लगता था.
कूलर
की ठंडक में भी अमराई की लू याद आती
थी,
और गर्मी की सूनी दुपहरें सदा रुलाकर जातीं थीं.
वे दोस्त नहीं, वे बाग़ नहीं, वह
गन्ने की मिठास नहीं,
दो-चार टिकोरे खाने के बाद
उठने वाली प्यास नहीं.
सभ्य शहरियों के खेलों में ओल्हा-पाती का अहसास नहीं,
इन सभी बनावटी चेहरों में कहीं छुपा उल्लास नहीं.
मानव-मन की गहराई में मिटटी की बू-बास नहीं,
बागी मन विद्रोह कर उठा शहर की दुनिया रास नहीं.
यह सब केवल स्वप्न था मैनें यह रहस्य पहचाना है,
जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......


यह जीवन मात्र मधुर स्मृतियों का प्यारा कोलाज कहाँ !
इस क्षणभंगुर जीवन में जो कुछ कल था अब वह आज कहाँ !
हैं शब्द वहीं और अर्थ वहीं, हैं सुर भी वहीं पर साज कहाँ !
हैं अकबर और ज़फर के वंशज पर वह तख्त-ओ-ताज कहाँ !
है वही बचपना दिल में जवाँ लेकिन अब वह अंदाज कहाँ !
कुछ छुपा नहीं परदों में अब वे कल के पोशीदा राज कहाँ !
वादे थे जिनसे वफाओं के वे आज मेरे हमराज कहाँ !
अब शाहिद-सैफ-करीना हैं, संयोगिता-पृथ्वीराज कहाँ !
यह सब केवल स्वप्न था मैंने ये रहस्य पहचाना है,
जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है.......



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