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पारिवारिक मूल्यों की संरक्षक एक आवारा मसीहा को अश्रुशेष श्रद्धांजलि..

गाँव आना हुआ। लोगबाग वही, धूर-धक्कड़ वही, पोखरे में काई भी उतनी ही, और उसमें नहा रहे महँगू के लौण्डों के बदन पर चीकट मैल भी उतनी ही.. लेकिन परिवार का एक अभिन्न सदस्य अनुपस्थित था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी घृतकौशिक गोत्र: त्रिप्रवर: बाभन परिवार की रसोई जुठारते मार्जार वंश की चश्मो-चिराग़, मेरी अग्रजा की लाडली "मोनू की बिलार" परिदृश्य से गायब थी.. आशंका सच निकली.. माँ की जानकारी ने अद्यतन किया कि बिलार जीवन रंगमंच पर अपनी भूमिका निभा कर प्रभु चरणों को प्राप्त हुई। दुखित हृद्य को एक ठेलनीय सामग्री की भूमिका बँधती दिखी। नया न लिखकर डायरी के पुराने पन्ने पलटे। एक संस्मरण चेंप देना सही समझा।

ये पोस्ट तब लिखी थी, जब शीतलहर अपने अगले पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ने को बेकरार थी, परम आदरणीय नारायण दत्त तिवारी की बूढ़ी ख्वाहिशें की चीनी खतम होने का नाम नहीं ले रही थी.. और भगवान अंशुमालि कुहासे से युद्ध में इज़्ज़त का फालूदा करवाने को जरा भी उत्सुक नहीं नजर आ रहे थे.. तारीख जनवरी माह के उत्तरार्ध का कोई भी दिन मान लें।

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"अईसन जाड़ त कब्बो नाहीं परल बाबू".. नरायन महतो खँखार कर बोले। "बुझात बाटे जइसे ई सीत बाता तूरि के करेजवा में धंसि जाई.."

सच है, बहुत ठंड पड़ी इस साल। साल के पहले दिन सूरज ने अमर सिंह की तरह जो इस्तीफा दिया, सो पूरा महीना बीतने को आया, लेकिन नहिंये माने। गनीमत थी कि खिचड़ी के दिन दिख गये, वरना कुंभ में नहाने पहुंचे लोगों की आस्था का भ्रम टूटते देर न लगती। बहुतों ने नववर्ष का प्रथम स्नान खिचड़ी के ही दिन किया, और दूसरे स्नान की नौबत आज तलक नहीं आई।

कमबखत कुहरा लील गया कि डॉक्टर ने बेडरेस्ट की सलाह दे डाली। भगवान भुवनभास्कर बिलायमान हुए और बकौल के०पी० सक्सेना- "ठंड है कि किसी बूढ़े नेता की जिस्मानी हवस की तरह जाती ही नहीं"। असंख्य ऑक्टोजेनेरियन लोगबाग महाप्रयाण कर गये और अब भी लग रहा है कि पसलियाँ तोड़कर यह जाड़ा कलेजे में धंस जायेगा।

गेंहू की फसल पानी माँग रही है, लेकिन मौसम ऐसा नहीं हो पा रहा कि पानी चलाया जाय। बदली-कुहेसे-ओस में पाला मार गया तो? जनाउरों की हालत तो और गई गुजरी है। किसी छप्पर पे, बगीचे में बन्दरों को कुछ भी नहीं हासिल हो पा रहा। पत्तियां तक नोच-नोचकर खा गये, अब दूर-दूर तक कुछ भी नहीं। ठंड में कुड़कुड़ाते, एक टुकड़ा बेल पर सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट की जंग लड़्ते पेड़ों पर लटकायमान हैं।

उम्र के आखिरी पड़ाव पर चल रही घर की बिल्ली अपने पेट में ठंड लग जाने से परेशान है। सारा दिन कौड़े और चूल्हे के पास बिता रही है। जबतक चचेरे भाई-बहन छोटे थे, तबतक रोज ही उनका गिराया हुआ / उच्छिष्ठ दूध पीने को मिल जाया करता था। आदत इतनी बिगड़ गई कि रोटी-चावल का जायका ही अच्छा न लगे। सुबह पाँच बजे घर का दरवाजा खुलते ही दौड़कर बाहर से सीधे रसोई में.. अपने काम की चीजें ढूंढने में रत। माँ कहती है- "पूर्वजन्म में या तो इस घर की मलिकाईन रही होगी या कोई मुँहलगी कहाईन।" बड़ी बहन के आगे पीछे मँडराया करती। वह भी अम्माँ-बाबूजी की नजरों से बचाकर आलमारी से दूध-दही निकालते वक्त थोड़ा सा जानबूझकर गिरा देती। ग़ज़ब की सेलेक्टिव कंज्यूमर बिलार अगर दो दिन पुराना दही हो तो सूंघकर छोड़ देती। माँ चिढ़कर कहती- "इनके त सजाSव दही चाहीं।" अम्मां को यह लगाव अच्छा नहीं लगता। वे बिल्लियों को धोखेबाज बतातीं। कहती हैं कि कुत्ते में स्वामिभक्ति होती है- "कुकुरा कहेला कि गोसैयां सलामत रहें कि कउरा पाईं, बिलरिया कहे कि गोसैयां आन्हर होखें कि एक्के में खाईं" 

विवाह के बाद बहन के ससुराल चले जाने के बाद बिल्ली का यह आखिरी मसीहा भी नहीं रहा। बेहतर भविष्य की तलाश में बिल्ली ने दूसरे घरों की तरफ पलायन किया। लगभग बीस-एक दिन बिल्ली नहीं दिखी। चिंतित होकर माँ ने दूसरे घरों में पता करवाया.. कोई सूचना न मिलने पर उदास मन से सबने यही माना कि उसकी इहलीला समाप्त हुई। लेकिन गाँव भर से मार-दुत्कार खाकर पुन: कंकालशेष बिल्ली वापस आई। और अब ये जाड़ा उसके प्राणों का ग्रहण बना हुआ है। चुल्हे और घर के अन्दर वाले कउड़े से शरीर तापकर किसी तरह जी रही है। हम लोगों के साथ तो बैठी रहती है, लेकिन बाबूजी के बैठने पर दूर हट जाती है। अब यह उनका लिहाज है या उनकी खड़ाऊं का भय, वही जाने।

तो भगवान भुवनभास्कर, बहुत हुई गुंडागर्दी.. अब चाहे पुरानी पार्टी में लौटिये या नई बनाइये। जो भी हो, एक विशाल जनसमूह प्रतीक्षारत है.. आइये, जनसभा को संबोधित कीजिये। किसी पीड़ित आत्मा की पुकार की एक बानगी पेश है-
वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहा है
मैं क्या कर रहा हूँ तू क्या कर रहा है
कड़ाके की सर्दी है और तू कमीने
जनाजे पे मेरे हवा कर रहा है।


पुनश्च: बिलार जाड़ा तो खेप गई, लेकिन घर में काम करने वाली मतवा ने एक दिन उद्घोषणा की कि बिलार को दरवाजे पर एक पुआल के ढेर पर ब्रह्मलीन पाया गया।  

नींद क्यों रात भर नहीं आती... कैम्पस में आखिरी रात, आखिरी पोस्ट

रात बीत रही है। ज़िन्दगी में पहली बार ऐसा हो रहा है कि बीतती हुई रात अच्छी नहीं लग रही। रात के ढाई बजे बालकनी में खड़े हुए जी में बस ये आ रहा है कि सॉफ्टपीडिया सर्च करूँ, शायद कोई ऐसा सॉफ्टवेयर मिल जाये जो इस बेरहम रात को बीतने से रोक ले, या कम से कम धीमा तो कर ही दे,,

बहुत से पल जेहन में आते हैं, लमहे भर की कौंध चमक जाती है आँखों में और फिर धीरे-धीरे सब कुछ खो जाने का अहसास तारी होने लगता है। कॉलेज इतना अच्छा कभी नहीं लगा। रैगिंग से फेयरवेल तक की यादें न्यूज़रील की तरह सामने से गुज़र रही हैं और कमबख्त दिल यह मानने को तैयार नहीं कि यह इस कॉलेज, इस कैम्पस में मेरी आखिरे-शब है।

कल ईशान की एक मेल मिली। एक बच्चे की कहानी थी, जिसकी माँ किसी फर्म में काम करती थी। शाम को जब लौटी, तो दरवाजे पर खड़े बच्चे ने पूछा- "माँ, तुम्हारी एक घण्टे की सेलरी कितनी होती है?" माँ ने हिसाब लगाकर बताया- 50 रुपये| बच्चे ने कहा- "क्या मुझे 25 रुपये मिल सकते हैं?" थोड़ा ना-नुकर करने के बाद माँ पैसे दे देती है। बच्चा दौड़कर जाता है और अपने कमरे में तकिये के नीचे से जमा किये हुए कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकालता है। माँ का चेहरा तमतमा जाता है। वह डाँटते हुए कहती है "मेरी दिनभर की मेहनत के बाद थके हुए घर आने पर तुम मुझसे पैसे माँगते हो.. शायद कुछ खिलौनों के लिये.. वो भी तब, जबकि तुम्हारे पास पहले से ही पैसे हैं.. शर्म नहीं आती तुम्हें?"

बच्चा कहता है- "मेरे पास 25 पहले से थे, 25 तुमने दिये.. यह लो माँ, तुम्हारे एक घंटे की कीमत.. क्या तुम कल एक घंटा पहले घर आ सकती हो, तुम्हारे साथ कुछ वक़्त चाहिये।"

ब्लॉगिंग मेरी हॉबी है, लेकिन मेरे दोस्त मेरा पैशन। कोर्स के आखिरी कुछ दिन अपने दोस्तों को पूरा वक़्त दे सकूँ, इसलिये पिछली पोस्ट के बाद ब्लॉगिंग को अल्पविराम देने का निर्णय ले लिया। कल की यह मेल मिलने के बाद लगा, कि मेरा निर्णय ग़लत नहीं था।

और ये रात.. कई दिनों के बाद आज मौसम बहुत खुशगवार है। तेज पुरवाई चल रही है। गर्मियों में इससे अच्छे मौसम की उम्मीद नहीं की जा सकती। काश यह रात एक उम्र भर चलती। काश अगली सुबह कभी न होती। आखिर क्यों बदलता वक़्त ऐसे मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ सारी कोशिशों के बाद भी यह हक़ीकत झुठलाई नहीं जा सकती, कि बस एक क़दम और.. और फिर लौटकर आना न होगा। और यह जानने के बाद भी यह क़दम उठाना मजबूरी क्यों बन जाता है?

आखिरी वाइवा के दौरान राहुल कहता है- "यार ज़िन्दगी तो डीजे(आमिर खान, रंग दे बसंती) की तरह होनी चाहिये। डिग्री पूरी होने के दो साल बाद भी कॉलेज में पड़े हुए हैं। क्यों? क्योंकि यहाँ अपनी "औक़ात" है.." मेरे चेहरे पे मुस्कान तैर जाती है। काश यह सच हो सकता।

क्या तो नहीं किया इन चार सालों में, अपार्ट फ्रॉम स्मोकिंग एंड ड्रिंकिंग। गानों की उल्टी-सीधी पैरोडी बनाना, चीफ वार्डेन के सामने सिर झुका के खड़े रहना। विवेक के साथ बतियाते हुए सुबह हो जाना (वेन्यू- बाथरूम)। अली-मिश्रा-मुर्गा-माथुर-शेट्टी के साथ विवादास्पद मुद्दों पर रात भर चलने वाली असंसदीय बहस। Life In SRMS बनाना। सुबह तीन लेक्चर बंक करके चौथी लेक्चर अटेंड करने पहुँचना। पता चलने पर कि फ़ैकल्टी ऐब्सेंट है, उल्टे पाँव लौट आना। नतीजतन शॉर्ट अटेंडेंस का फाइन देना, पिता की डाँट सुनकर रेगुलर हो जाना, पैसे वापस मिलना। अगले सेमेस्टर में फिर शॉर्ट। तोड़-फोड़ करने के जुर्म में एक महीना हॉस्टल से बाहर रहना। वॉर्डन के फर्जी सिगनेचर मारने पर पूरे सेमेस्टर गेटेड रहना। फ्रस्टेशन में प्रोजेक्ट लैब में बैठकर पूरे डिपार्टमेन्ट को गालियाँ देना। पूरे मुस्लिम बाहुल्य इलाके में एकमात्र हिन्दू कौशल के ढाबे पर खाना। एक सेमेस्टर के बाद पता चलना कि उसका नाम कौशल नही क़ौसर है- क़ौसर मुहम्मद। लेकिन उसके हाथ के बने खाने के जायके के आगे भाड़ में गई पंडिताई..।

दोस्ती का पहला उसूल तोड़ने का मन करता है। जी में आता है हर दोस्त से गले मिलकर उसे "थैंक-यू" बोलूँ। यह जानते हुए भी कि दोस्ती में "थैंक-यू" नहीं बोलते। लेकिन जिन दोस्तों के साथ यह खूबसूरत चार साल बीते हैं, उनका क़र्ज़ कैसे चुकेगा?

"थैंक-यू" दोस्तों, इस कॉलेज को चार साल साथ में झेलेबल बनाने के लिये..

"थैंक-यू" पंकज, इस कॉलेज को घर जैसा अहसास देने के लिये। "थैंक-यू" विवेक, मेरी अंतहीन बकवासें सुनने के लिये।

"थैंक-यू" नंदी, हर शाम मेरे साथ कौशल भाई को तकलीफ देने चलने के लिये..।

"थैंक-यू" अली भाई उन सारी गरमा-गरम बहसों के लिये, जो किसी भी वक़्त हाथापाई में तब्दील हो सकती थीं..।

"थैंक-यू" साबू, गौरव, अन्ना, देवांश, सिद्धार्थ, प्रज्ञा, सौम्यता, श्रुति और असंख्य जूनियर्स, मुझे अपने बड़े भाई सा स्नेह देने के लिये।

"थैंक-यू" तन्वी, सौम्या, वन्दना, कीर्ति, मेरी सारी बर्थडे पर कार्ड बनाने के लिये, ट्रीट में गाने गाने के लिये।

"थैंक-यू" जागृति, इस पूरे 4 सालx365 दिनx24 घंटे मेरा साथ देने मौजूद रहने के लिये।

कितनी उम्मीदें, कितने अरमान लिये हम ज़िन्दगी से दो-दो हाथ करने का हौसला पाले रखते हैं। अब सामने मुँह फाड़े असल ज़िन्दगी दिखती है तो डर लगता है कि तुम्हारे बिना कैसे जूझ सकूँगा इससे??

विचार गड्ड्मड्ड हो रहे हैं। शब्द संयोजन बिगड़ रहा है। अब बंद करता हूँ। पैकिंग करनी है। कैम्पस से आखिरी पोस्ट है। देखते हैं असल ज़िन्दगी रूमानियत का कितना हिस्सा सोख लेती है..! कुछ लाइनें याद आ रही हैं..







वक़्त की क़ैद में ज़िन्दगी है मगर / चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं
इनको खोकर मेरी जानेजाँ / उम्र भर न तरसते रहो
आज जाने की ज़िद न करो.. यूँ ही पहलू में बैठे रहो..

बाद में: यह पोस्ट आलोक के लिये.. इस उम्मीद में कि अगली पोस्ट भी जल्द कर सकूँगा। 

तनहाई के राज़दार..4


पहली ख़ता- स्वप्न
(..आगे)



सुगंध



याद है मुझे अब भी-वो रुत,
वो फिज़ा, जब हम
पहली बार मिले थे;
नरम जाड़ों के दिन थे वे,
और अचानक चलने लगी वो पुरवाई
समेट लाती थी अपने आँचल में तरह तरह की खुश-बूएं


याद है मुझे अब भी-
जब पहली बार मेरे कानों में गूँजी थी
तुम्हारी वो मिठास घोलती आवाज़.
और याद हैं तुम्हारी वो शरारतें-
आधी रात को चिढ़ाने वाली ‘मिस्ड काल्स’
लड़ते-लड़ते बीत जाने वाली रातें,
और सूरज के उगते ही मुँह छुपाकर सो जाना!


याद है मुझे अब भी-
छोटी-छोटी बातों पर तुम्हारा रूठ जाना,मेरा तुम्हें परेशान करना
और आखिरकार सुलह हो जाना।
और-
कि जब बातें किये बीत जाये एक अरसा
तो नामालूम सी बेचैनी का तारी हो जाना।






सफ़र



नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
जब पहली बार तुम्हारी आँखों से टपके उन क़तरों ने
तय किया था सफ़र
मेरी रूह तक का,
और भिगोते चले गये थे मुझे-
अन्दर, बेहद अन्दर तक!


नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
जब हँसने-खिलखिलाने के दौरान
छा जाती थी खामोशी,
और उसे तोड़ता एक आँसू-
छलक उठता था कभी मेरी आँख में
कभी तुम्हारी


नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
तुमसे ज़ुदा होने के
माँ की नम आँखों के
पिता के बेचैन हो टहलने के।
नहीं पता था क्या शक़्ल अख्तियार करेगी
ये ज़ुदाई..


29 अक्टूबर 2005
रात्रि 1:45 बजे, लखनऊ


ठेलनोपरांत- पोस्ट को तारीख़ के सन्दर्भ में देखा जाय..


(जारी..)

हजार रुपये का चालान, 45 रुपये की ब्रांडी और बर्फ़ का नामोनिशान नहीं…. लब्बोलुआब- मनाली मत जइयो गोरी राजा के राज में।

बहुत देर से सोच रहा था कि क्या शीर्षक रखूँ। फाइनली ये ग़दर शीर्षक दिमाग में भक्क से चमक उठा और हमने उसे यहाँ ला धरा।

सबको दुआ-सलाम। इतने दिन से गायब रहने के कारण दो थे- एक गोबरपट्टी में बसे अपने गाँव की यात्रा, दूसरी लौटते ही बर्फ़पट्टी© में बसे मनाली की यात्रा।

DSC00721असल में बारहवीं में गणित पढ़ने के जुर्म में बी.टेक. करने की जो सजा मिली, वो माशाअल्लाह ख़त्म होने के कगार पर है। तो हमने भी सोचा कि पारी के सेकेंड लास्ट ओवर में यार-दोस्तों के साथ कहीं घूम आयें। लेकिन पता नहीं किस बीरबावन घड़ी में प्रोग्राम बनाया था! सब कुछ फ़रिया जाने के बाद निकलने के एक दिन पहले किसी ब्लूस्टार कंपनी का नोटिस आया कि आपके कॉलेज के बी.टेक. बेरोजगारों की गिनती में कुछ कमी करने के इच्छुक हैं…. चिरंतन ग्रीष्म के पश्चात सावन की पहली फुहार की तरह आई प्लेसमेंट की आकांक्षा ने आर्थिक मंदी की मार में झुलसे दारुण, दुःख विगलित हृदयों पर अपनी कृपादृष्टि फेरी तो सालों के भूखे-नंगे अनप्लेस्ड बन्धु फेशियल कराके क्लीन शेव हो अपनी-अपनी सीवी में लिखाने लगे…To Carve a Niche In Your Prestigious Organization …..

DSC01113परम दलिद्दरई की घनघोर कालिमा में साक्षात भगवान अंशुमालि की तरह उदित इस दैदीप्यमान कंपनी के शुभागमन की सूचना ने 39 यायावरों की लिस्ट से 17 के पत्ते काट दिये। टूर तो कैंसिल होना नहीं था, बस पर-हेड बजट ड्यौढ़ा हो गया।

लेकिन इन सत्रह नसुड्ढों की हाय ऐसी लगी कि कस्सम से पूरा टूर सत्यानाश हो गया।

चरण १: बरेली से चंडीगढ़

बहुत आलीशान यात्रा रही। शहर से बाहर निकलते ही ग़दर ट्रैफिक जामDSC00777 मिला। तीन घंटे इस जाम में ही निकल गये। उसके बाद किसी तरह भोर होते होते बिजनौर पहुँचे, तो वहाँ से चंडीगढ़ की 200 किमी की यात्रा में ‘पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि’ ड्राइवर ने 10 घंटे लगाये। कुल मिलाकर शाम के पांच बजे पंचकुला के ‘गुरुद्वारा नाढा साहिब’ पहुँचे। अब इसे हमारी Austerity Drive समझिये या बजट बचाने की कवायद, 39 से 17 होते ही सारे पड़ाव होटल से गुरुद्वारों में, और सारे रेस्त्रां-भोज लंगर में तब्दील हो चुके थे।

खैर, दर्शन करने और प्रसाद पाने के बाद चंडीगढ़ घूमने निकले तो पता चला कि सारे गार्डन बंद हो चुके हैं। बचा एक सेक्टर घूमने का कार्यक्रम तो हमें बताया गया था कि सेक्टर सेवेनटीन घूमना, और यहाँ ड्राइवर अड़ गया कि उसे सिर्फ़ सतारा घुमाने को कहा गया था। बड़ी जद्दोजेहद के बाद पता चला कि पंजाबी में सत्रह को सतारा कहते हैं।

चंडीगढ़ में प्रसिद्ध है कि शाम को राशन से पहले ठेके की दुकान खुलती है, वो भी शेष भारत से लगभग आधे दाम पर। DSC00746फिर क्या था, सतारा में बस रुकते ही दिन भर के प्यासे चकोरों का झुंड लक्ष्य की तरफ भागा। स्वाति की पहली बूँद हलक के नीचे उतरी भी नहीं थी कि एक ठुल्ले (पुलिसवाले) ने सारे तृषार्त बन्धुओं को धर दबोचा। पता चला कि बेटा ये यूपी नहीं है जहाँ सड़क को शौचालय बनाओ या मधुशाला, कोई फ़िक्र नहीं। चंडीगढ़ में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्र-मदिरा-पान पर सख्ती से रोक है। इस सच्चाई से रू-ब-रू होने में बच्चों के हजार-हजार रुपये लगे। फिर तो उन्होंने कितनी भी पी, नशा हुआ ही नहीं।

जिन्हें खाना था वे खाकर, और शेष लोग पीकर आगे की यात्रा के लिये सवार हुए। यह तय हुआ, कि लौटानी में समय रहा तो चंडीगढ़ फ़िर घूमेंगे।

चरण २: चंडीगढ़ से मनाली

लगभग 350 किमी की यात्रा ड्राईवर साब ने १० घंटे में पूरा करने का वचन दिया। सड़क बहुत बेहतरीन थी। रात में अहसास ही नहीं हुआ कि बस चल भी रही है। सुबह उठने पर पता चला कि वाकई चल नहीं रही थी। सबको सोता देखकर पेचिश-आंत्रशोथ आदि बहु-बीमारी पीड़ित ड्राईवर साब ने भी चार घंटे की नींद मार ली।DSC00799

हिमाचल के पहले जिले मंडी में एक ढाबे पर सुबह का नाश्ता इत्यादि करते हुए सभी शाम ५ बजे मनाली पहुँचे। भूख से आंते सिकुड़ गईं थी। होटल में नहा धोकर सब खाने-पीने निकले। लेकिन उन 17 नसुड्ढों की हाय ने यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा। पता चला कि एक प्रागैतिहासिक मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ है, जिसके उपलक्ष्य में समूचा शहर बंद है और सभी लोग विशाल भंडारे में भोजन करेंगे। जिसे जल्दी है, या भंडारे में सड़क पर पालथी DSC00879मारकर सुबह से बिखरे हुए चावल-सब्जियों के ढेर में बैठकर नहीं खा सकता, वो भूखा मरे। वा ह रे गुंडागर्दी…….

सॉफीस्टिकेटेड लड़्कियों ने अखबार दिये- बैठने को भी, बिछाने को भी। तब जाकर कहीं युगों की क्षुधा शांत हुई। पर सच्ची में, खाना कतई चीता बना था। मजा आ गया। रात्रि विश्राम हुआ। तय हुआ कि अलस्सुबह रोहतांग के लिये निकल चलेंगे।

चरण ३: मनाली से रोहतांग

मनाली से रोहतांग करीबन DSC0089755 किमी दूर है। भारत और चीन के बीच प्राचीन रेशम मार्ग (Silk Route) का एक महत्वपूर्ण पड़ाव। भारत को तिब्बत से जोड़ने वाला दरवाजा- रोहतांग दर्रा। मनाली के आगे केवल विशेष टूरिस्ट बसें, ट्रैवेलर या स्कॉर्पिओ जैसी गाड़ियाँ जाती हैं। लगभग दो घंटे का रास्ता, लगातार चलते रहे तो।

रास्ते में एक जगह भू-स्खलन की वजह से रुकना पड़ गया। जेसीबी अपना काम कर रही थी। मेरी नजर आसपास के पत्थरों पर पड़ी। स्थानीय लोग इन्हें चाँदी के पत्थर कहते हैं। बेहद चमकदार सोने-चाँदी जैसे पत्थर, और DSC00999रेत भी उतनी ही महीन चमकदार। एस्बेस्टस और मैंगनीज से भरपूर। इतना ज्यादा मिनरल-कंटेंट कि पत्थर तो लगे ही नहीं। लोगों ने बताया कि अभी यहाँ कहाँ, असली खजाने तो लद्दाख में हैं। समझ में आया कि इस इलाके पर चीन की लार क्यों टपक रही है! सोचा कि एकाध पत्थर उठाकर घर ले चलूँ, लेकिन हिमाचल प्रदेश पर्यटन निगम इस मामले में बहुत सख्त है। यह सोचकर रख दिया कि कहीं लेने के देने न पड़ जायें।

मुख्य रोहतांग पर तो बर्फ़ के नामोनिशान नहीं थे। इससे ज्यादा बर्फ़ तो रास्ते में थी। जमे हुए झरने, नदियाँ। पता चला DSC00992कि चार दिन पहले उपर के पहाड़ों पर बर्फ़ गिरी है। फिर क्या था! नि कल लिये उपर की तरफ। वहाँ बर्फ के दर्शन हुए। पर्याप्त बर्फ़ थी। दो-एक घंटे बर्फ़ के गोलों से लड़ाई भी हुई। मन अघा गया लेकिन असलहे ख़त्म नहीं हुए।

जबर्दस्त ठंड थी वहाँ। चटख धूप में भी हाथ-पैर गल रहे थे। दो-चार भाई लोगों ने मनाली से ली हुई ब्रांडी के घूँट लिये, तो बर्फ़ हाथों में आकर पिघलने लगी। अपने साथ तो यह सुविधा भी नहीं थी..

DSC01082कहते हैं बी.टेक. 3 B के बिना अधूरा है। (B)ike, (B)eer, और (B)abe. वतन से इतनी दूर बाइक का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। एक मोपेड थी तो वह घर पे जंग खा रही है। दूसरी B या उसके वैरिएंट आजमाने की हिम्मत आज तक नहीं हुई। रही बात तीसरी B की तो वो अभी अंडर-कंसिडरेशन है। तो मसला ये हुआ कि हम कोई रासायनिक क्रिया तो करते नहीं इसलिये भाई लोग हर दस मिनट पर मुझे हिला-हिलाकर चेक करते रहे कि भइया हो ना…….

सारी स्नो-फाइटिंग के पश्चात वापस मनाली लौटे। रात्रि विश्राम के पश्चात सुबह वापस चंडीगढ़ लौटने का कार्यक्रम था।

चरण ४: मनाली से बरेली

यात्रा के इस चरण में सुबह छः बजे निकलकर शाम 3 बजे तक चंडीगढ़ पहुँचने का कार्यक्रम तय था। फ़िर चंडीगढ़ घूमकर रात-बिरात बैक टू पैवेलियन लौटने का कार्यक्रम था। लेकिन बुजुर्गवार ड्राईवर की कृपा सेDSC01116 यह सब संभव नहीं हो सका। चंडीगढ़ पहुँचते पहुँचते फिर 5 बज गये। सौभाग्यवश एक पिंजौर गार्ड्न घूमने को मिल गया। और उन 1 7 नसुड्ढों की हाय फिर लगी। गुरुवार की वजह से सारे अच्छे सेक्टर बंद मिले। सो मन मसोसकर वापसी की यात्रा प्रारंभ हुई। चूँकि अगले दिन एक और बुकिंग थी, इसलिये जो रास्ता जाते समय 17 घंटे में तय हुआ था, वापसी में वही चंडीगढ़-बरेली मार्ग 9 घंटे में तय हुआ। लौट के फिर वही कॉलेज, फिर वही कुंजो-क़फ़स, फिर वही सैयाद का घर…

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ठेलनोपरांत: कल पता चला कि ब्लूस्टार ने जिन बच्चों को सेलेक्ट किया था, अब उनसे 25000 माँग रही है ट्रेनिंग के वास्ते। फिर उन्हे तीन महीने 10000 के भत्ते पर रखकर उनके टैलेंट को परखा जायेगा। फिर जो चीते बचेंगे, उन्हें नौकरी दी जायेगी। लब्बोलुआब ये कि वे सारे नसुड्ढ अब प छता रहे हैं कि घूम क्यों नहीं आये। हमें तो बस अटल जी की एक कविता की पहली लाइन याद आ रही है-

मनाली मत जइयो गोरी राजा के राज में..

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ना त्वम शोचितुमर्हसि





पिछ्ले तीन दिन बहुत गहमा-गहमी में बीते हैं, और इतना कुछ देख लिया है कि जीवन के सारे समीकरण बदले-बदले से नज़र आने लगे हैं।



दृश्य-१



सोमवार (यहाँ साप्ताहिक अवकाश इसी दिन होता है) की शाम कैंटीन से लौटते वक़्त विपिन दिखाई देता है। चेहरे पर चिंता, हाथों में लीव कार्ड और क़दमों में तेज़ी. पूछने पर टाल देता है-नहीं!कुछ नहीं. पीछे से आते हुए रजत ने बताया 'पापा की तबीयत खराब है, घर जा रहा है'.



विपिन चला जाता है.



मेरा और विपिन का रिश्ता अज़ीब है. दूसरे सेमेस्टर में हम तीन(तीसरा विवेक) से पूरी क्लास, यहाँ तक की फैकल्टी भी त्रस्त रहती थी. क्या-क्या नाम मिले थे हमें- BBA ( बैक बेंचर्स एसोसिएशन), D.TEC (डिस्ट्रक्टिव थिंकर्स ऑफ EC ) और ना जाने क्या-क्या. हमारे काम ही ऐसे थे. केवल तीन चार कतारें भरी होने पर भी दसवीं(और आखरी!) कतार में बैठना, दूसरी-तीसरी क्लास के बच्चों की तरह रबर-शूटिंग, फैकल्टी के बोर्ड की तरफ मुड़ते ही क्लास का आसमान हीथ्रो एयरपोर्ट के आसमान से भी व्यस्त नज़र आता था. पढ़ाते समय फैकल्टी की नज़रें हम पर गड़ी रहती थीं. कहीं भी उजबकपने, इनकार, या नींद के लक्षण दिखे,तुरंत क्लास ओवर. आफ़त कौन मोल ले? तुर्रा ये कि बमुश्किल 15 लोग HOD की लेक्चर कर रहे हैं, और अटेंडेन्स 100%. उन्हें भी बोलना पड़ता था- इट सीम्स टू बी गुड स्ट्रेन्थ टुडे! किसी की भी अटेंडेन्स शॉर्ट हो रही हो, प्लीज़ कॉन्टेक्ट attendence@proxy.com



वहीं कुछ ग़लतफ़हमियाँ आईं, और सब ख़तम। एक दूसरे की शकल तक देखना गवारा नहीं। बात इतनी बिगड़ी कि पूरे दूसरे साल बातचीत तो दूर, हेलो तक नहीं हुई। अब तीसरे साल में जाकर कुछ सुधार था कि-



दृश्य-2



उसी रात मेस में मुझसे एक दोस्त ने पूछा-



विपिन के फादर का पता चला?



हां यार, बीमार हैं। विपिन घर तो गया है।



याने तुम्हें नही पता, ही इज नो मोर।



वॉट? कैसे?



एक्सीडेंट..... विपिन से ये बात छुपाई गयी है, ताकि घर सही से जा सके।



दृश्य-3



कानपुर का भैरोंघाट काफ़ी व्यस्त श्मशान है। एक ज़िम्मेदार प्रबंधक जीन्स-टी-शर्ट धारी, आँखों पर सेलेब्रिटी वाले चश्मे और कानों में सेलफोन का हैंडस्फ्री लगाए हुए नमूदार होते हैं। आनन फानन में आखरी रस्में निबटा कर मुखाग्नि दी गयी।



इसी बीच मैं कभी सबसे अलग, कभी सबके साथ रहकर भी एकांत में था। क्रूर मन भावुकता से उठकर दार्शनिकता की ओर चल पड़ा था। जिधर देखो उधर जलती चिताएँ, अंतिम संस्कार हेतु प्रतीक्षारत चार-पाँच शव, और तमाशबीनो की भीड़।



पास में एक चिता की ओर दृष्टि गयी। लकड़ियों से बाहर एक पैर निकला हुआ है। अचानक पंजा शरीर से अलग होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। निर्विकार चांडाल के हाथों ने उसे इतमीनान से सहेजकर पुनः अग्निसेज पर रख दिया।



एक दूसरी चिता आधी जल चुकी है। संबंधी घर जा चुके हैं। सहसा चांडाल आधी जली लाश को बाँस से गंगा में प्रवाहित कर देता है। लो एक वेटिंग तो क्लियर हुई। एक चिता और सजती है।



थोड़ी दूर पर अंतिम स्नान के लिए एक सात-आठ वर्ष के बालक का शव है। पंडित टोकते हैं- ऐसे नहीं, वैसे!



लेकिन आश्चर्यजनक! कहीं क्रंदन या विलाप की ध्वनि नहीं सुनाई पड़ती। शायद मैं चेतनाशून्य हो रहा हूँ।



नहीं मैं पूर्णतया चेतनावस्था में हूँ। पंडित कम हैं, लाशें ज्यादा।



लकड़ी का स्टॉक ख़तम हो रहा है। चार मन से ज़्यादा नहीं मिल पाएगी।



सूर्यास्त में मात्र आधे घंटे शेष हैं, कैसे हो पाएगा? रिश्तेदारों को भी जल्दी है।



लो लकड़ियाँ गीली हैं। आग नही पकड़ रहीं। फ़ुरसत ही कहाँ है किसी के पास रोने के लिए!



सोचता हूँ, क्या यही है जीवन का सौंदर्य? क्यों कहा गोस्वामी जी ने-'बड़े भाग मानुस तन पावा'। जब चार मन लकड़ी और साढ़े तीन सेर घी ही अंतिम नियति है तो क्या अचीवेमेंट्स और क्या यश-पद-धन?



इतने मशीनी ढंग से सब कुछ घट रहा है, तो मानवीय संवेदनाएँ कहाँ मृत हो गयी हैं?और अगर नहीं मृत हुई हैं तो भी उनका मूल्य ही क्या है?



पास में गीता बाँच रहे एक पंडित की आवाज़ कानों में पड़ती है-



" ना त्वम शोचितुमर्हसि "

तनहाई के राजदार...3

मैं आज एक मुक्त-कविता सूत्र प्रारम्भ कर रहा हूँ। यह सात-आठ बेतरतीब अतुकबंदियों-गद्य काव्यों की एक श्रृंखला है...जिसकी एक-एक लड़ी मैं वक़्त-बेवक्त पोस्ट करता रहूँगा। और हाँ जाहिर है, ये भी मेरी डायरी के पन्ने हुआ करते थे। इसलिए इसे डायरी की ही भांति पढ़ें, ये खाली दिमाग का शब्दों के साथ खिलवाड़ है, अतः कोई माने ढूँढने की कोशिश बेमानी साबित हो सकती है.... एक बात और है, मैं कमबख्त विराम-अल्पविराम का कानून आज तक नही समझ पाया, विद्वतजन कृपया इस बारे में मेरा मार्गदर्शन करें, शायद यह (अ)कविता थोडी सुंदर बन पड़े......



स्वप्न




सपनों जैसे लगते हैं वे दिन,
अभी कल की ही तो बात है, जब तुमने-
सकुचाते हुए बढ़ा दिया था अपना हाथ
मेरी तरफ़
और बिना सोचे समझे थाम लिया था मैंने उसे



वाकई सपनों जैसे ही थे वे दिन !
जब अवसाद की अँधेरी
संत्रास की तल्ख़ चुभन, और
तन्हाई की उस मनहूसियत भरी कब्र में सोया-
एक बे-परवाज़ परिंदा चौंक उठा था.
क्यूंकि एक अनजान राह की जानिब से सदा आई थी
और
दूर उफक पर कोई शमअ झिलमिला उठा थी।



शायद सपनों जैसे ही थे वे दिन
जब रोज-ऐ-अव्वल से कब्र में सोया वह परिंदा
निकल आया था अपनी ताबूत से,
और देखा था उसने-
बाहर लरजाँ बहार का मौसम,
अमरित में नहाया चाँद,
और उससे भी खूबसूरत एक मंजर-
एक ख्वाब सी खूबसूरत महजबीं को.
और उसे लगा-
उसके परों में अभी जान बाकी है.......



१२ नवंबर २००५
रात्रि १२:१५ बजे
लखनऊ
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