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तनहाई के राज़दार..4


पहली ख़ता- स्वप्न
(..आगे)



सुगंध



याद है मुझे अब भी-वो रुत,
वो फिज़ा, जब हम
पहली बार मिले थे;
नरम जाड़ों के दिन थे वे,
और अचानक चलने लगी वो पुरवाई
समेट लाती थी अपने आँचल में तरह तरह की खुश-बूएं


याद है मुझे अब भी-
जब पहली बार मेरे कानों में गूँजी थी
तुम्हारी वो मिठास घोलती आवाज़.
और याद हैं तुम्हारी वो शरारतें-
आधी रात को चिढ़ाने वाली ‘मिस्ड काल्स’
लड़ते-लड़ते बीत जाने वाली रातें,
और सूरज के उगते ही मुँह छुपाकर सो जाना!


याद है मुझे अब भी-
छोटी-छोटी बातों पर तुम्हारा रूठ जाना,मेरा तुम्हें परेशान करना
और आखिरकार सुलह हो जाना।
और-
कि जब बातें किये बीत जाये एक अरसा
तो नामालूम सी बेचैनी का तारी हो जाना।






सफ़र



नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
जब पहली बार तुम्हारी आँखों से टपके उन क़तरों ने
तय किया था सफ़र
मेरी रूह तक का,
और भिगोते चले गये थे मुझे-
अन्दर, बेहद अन्दर तक!


नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
जब हँसने-खिलखिलाने के दौरान
छा जाती थी खामोशी,
और उसे तोड़ता एक आँसू-
छलक उठता था कभी मेरी आँख में
कभी तुम्हारी


नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
तुमसे ज़ुदा होने के
माँ की नम आँखों के
पिता के बेचैन हो टहलने के।
नहीं पता था क्या शक़्ल अख्तियार करेगी
ये ज़ुदाई..


29 अक्टूबर 2005
रात्रि 1:45 बजे, लखनऊ


ठेलनोपरांत- पोस्ट को तारीख़ के सन्दर्भ में देखा जाय..


(जारी..)
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