12:53 AM
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By कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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8:54 PM
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By कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
प्रेम एक ही व्यक्ति से क्यों हो? और एक बार शुरू हुई प्यार की तलाश किसी एक ही व्यक्ति पर जाकर क्यों थमे? क्या जरुरी है कि प्यार का कोई मकसद हो ही? बेमकसद प्यार क्या प्यार नहीं?
प्रेम की परिणति एक ही व्यक्ति क्यों हो? एक समय में एकाधिक व्यक्तियों से प्रेम क्यों नहीं किया जा सकता? ऐसा क्यों है कि एक शख्स पर जाकर ख़त्म हुई प्यार की तलाश वहीँ से एक नए क्वेस्ट की तरफ प्रयाण नहीं कर सकती?
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| चित्र गूगल से साभार |
कितना प्रेम जरुरी है? कितने से इंसान की प्यास बुझ सकती है? कैसे पता चले कि जितना प्रेम किया जा सकता था उतना हो चुका? कैसे पता चले कि अब प्रेम की जरुरत पूरी हो चुकी? प्रेम मे सैचुरेशन पॉइंट आया कि नहीं, कैसे पता चले? ये भी तो हो सकता है कि जिसे अपने जीवन में प्रेम ही प्रेम चहुँओर दिख रहा हो, उसे पता ही न हो कि प्रेम की सीमा यही नहीं? प्यास प्यास का फ़र्क है| किसी की प्यास दो घूंट में बुझ सकती है किसी के लिए समंदर भी कम पड़े! यह भी हो सकता है कि जिसकी प्यास अभी बुझ गई है, वह दुबारा पनप उठे! यह भी हो सकता है कि किसी को उठ रही प्यास का पता ही न चले! कोई ऐसा भी हो सकता है कि जो समझ रहा हो कि उसकी सारी तृष्णा शांत हो चुकी है और अन्दर से उठने वाली यह चीज़ प्यास तो हो ही नहीं सकती! कोई प्यासा ऐसा भी हो सकता है जो सिर्फ लोक-लाज से अपनी प्यास दबाये बैठा है! उसकी प्यास क्या प्यास नहीं?
नहीं ! प्रेम सीमाओं में नहीं बंध सकता| प्रेम जैसी उदात्त भावना शर्ते नहीं जानती, बंधनों से अनभिज्ञ होती है| उसे शर्तों और सीमाओं में बांधना प्रेम के साथ क्रूर अत्याचार है| सीमाबद्ध प्रेम भले ही कुछ और हो लेकिन प्रेम तो नहीं ही हो सकता| प्रेम के साथ किया जा सकने वाला सबसे बेहया मज़ाक यही है कि उसे सीमाओं में बांध दिया जाए|
मानव बंधा होता है, प्रेम की भावना उसे स्वतन्त्र करती है, उसे पंख देती है| उसके ह्रदय में नए सपने उगाती है, उसे ऐसे शख्स से मिलाती है जिसके दिल में भी ऐसी ही भावना हो| समाज दायरे तय कर देता है और फिर उसी दायरे में उन्हें प्रेम ढूँढना पड़ जाता है| कितना क्रूर मज़ाक है! ऐसा ही है, जैसा कि डाल पर सहमे बैठे कपोतशिशु को कोई हौसला दे कि उसके पंख मजबूत है और उसके जीवन की सार्थकता निर्बाध उड़ान में ही है, और एक बार जब वह कपोत साहस भर उड़ना सीख ले तो उसे सींखचों में बंद कर दिया जाय कि अब तुम्हारी उड़ान की सीमा इन दीवारों तक ही है| इससे भी बड़ा अपराध वह कपोत तब अपने साथ स्वयं ही करेगा जब उसे यह सत्य लगने लगे कि उड़ान इतनी ही सही जितनी इन दायरों के भीतर हो|
मनुष्य ससीम है, परम तत्व या प्रकृति असीम| जो भी शुभ है, सत्य-शिव-सुन्दर है, उसका उत्स भी असीम में है और उसकी चरम परिणति भी असीम मे| प्रेम से शुभ क्या होगा? तो प्रेम भी अपनी सत प्रकृति में असीम ही हो सकता है| अन्यथा जो भी सीमित है, वह असत है, प्रेम का आभास है| प्रेम नहीं, उसकी मिथ्या प्रतीति है!
मानव बंधा होता है, प्रेम की भावना उसे स्वतन्त्र करती है, उसे पंख देती है| उसके ह्रदय में नए सपने उगाती है, उसे ऐसे शख्स से मिलाती है जिसके दिल में भी ऐसी ही भावना हो| समाज दायरे तय कर देता है और फिर उसी दायरे में उन्हें प्रेम ढूँढना पड़ जाता है| कितना क्रूर मज़ाक है! ऐसा ही है, जैसा कि डाल पर सहमे बैठे कपोतशिशु को कोई हौसला दे कि उसके पंख मजबूत है और उसके जीवन की सार्थकता निर्बाध उड़ान में ही है, और एक बार जब वह कपोत साहस भर उड़ना सीख ले तो उसे सींखचों में बंद कर दिया जाय कि अब तुम्हारी उड़ान की सीमा इन दीवारों तक ही है| इससे भी बड़ा अपराध वह कपोत तब अपने साथ स्वयं ही करेगा जब उसे यह सत्य लगने लगे कि उड़ान इतनी ही सही जितनी इन दायरों के भीतर हो|
मनुष्य ससीम है, परम तत्व या प्रकृति असीम| जो भी शुभ है, सत्य-शिव-सुन्दर है, उसका उत्स भी असीम में है और उसकी चरम परिणति भी असीम मे| प्रेम से शुभ क्या होगा? तो प्रेम भी अपनी सत प्रकृति में असीम ही हो सकता है| अन्यथा जो भी सीमित है, वह असत है, प्रेम का आभास है| प्रेम नहीं, उसकी मिथ्या प्रतीति है!
मनुष्य स्वभावत: ससीम है, लेकिन है परम तत्व का अंश (या पूर्ण!) अतः असीम के प्रति आकर्षण महसूस करता है| यदि यह भाव सीमित हो जाए तो असहज होने लगता है| प्रेम के प्रति आकर्षण भी ऐसी ही वृत्ति है| जबतक निर्बाध हो, तभी तक सहज है| जब सीमित हुआ तो कचोटने लगता है|
कैसी भी सीमा हो- कितनों से हो सकने की/कितनी बार हो सकने की/एक बार में कितनों से हो सकने की/वासना की हद तक शारीरिक हो जाने की, या आराधना की हद तक प्लेटोनिक हो जाने की/एक बार हो जाने के बाद दूसरे से हो सकने की.. सभी सीमाएं प्रेम को भ्रष्ट करती हैं, उसे दैवीय धरातल से पाशविक तक ले जाती हैं| मनुष्य को असहज करती हैं|
कैसी भी सीमा हो- कितनों से हो सकने की/कितनी बार हो सकने की/एक बार में कितनों से हो सकने की/वासना की हद तक शारीरिक हो जाने की, या आराधना की हद तक प्लेटोनिक हो जाने की/एक बार हो जाने के बाद दूसरे से हो सकने की.. सभी सीमाएं प्रेम को भ्रष्ट करती हैं, उसे दैवीय धरातल से पाशविक तक ले जाती हैं| मनुष्य को असहज करती हैं|
असहज मनुष्य दुखी होता है| वह प्रेम में नई शुरुआत से डरता है, शुरू हो जाने पर जारी रखने से डरता है, जारी प्रेम के भवितव्य से डरता है, प्रेम की परिणति विरह में होने पर पर अवसाद में चला जाता है, जीवन निरुद्देश्य पाने लगता है, शनैः शनैः उससे हार मान लेता है, असफल होता है| प्रेम का झूठा आभास उसे जीवन की निकृष्टता की ओर उन्मुख कर देता है|
और ऐसे असहज मनुष्य के प्रेम की परिणति यदि संयोग में होती है तो उसका भय अनंतकाल तक जारी रहने को अभिशप्त हो जाता है| प्रेम के भवितव्य का डर समाप्त हो जाने पर नये नए डर घर करने लगते हैं| बच्चों का डर, उनके भविष्य का डर, समाज का डर, आकांक्षाएं पूरी न हो पाने का डर..
इन सबमें वह प्रेम कहाँ है? कहाँ है उसकी पवित्र अनुभूति? कहाँ है वह पहली बार उठने वाला रोमांच? कहाँ है वह कुछ वर्जित करने का संतोष? कहाँ है वह सभी बंधन तोड़ देने का साहस देने वाली 'हाँ'..?
ऐसे अपूर्ण प्रेम में पहली परिणति को प्राप्त हुए लोग जितने अभागे हैं, उससे कहीं ज्यादा वे जो दूसरी परिणति को प्राप्त हुए| अपूर्ण, मिथ्या प्रेम का भ्रम जितना जल्द टूट जाए बेहतर है| जीवनपर्यंत चलने वाला यह मिथ्याभास मनुष्य को खोखला कर देता है|
अपनी सत प्रकृति में प्रेम अनंत है| एक बार में कईयों से हो सकता है, एक के बाद कईयों से हो सकता है| प्रेम की अपनी यह माँग हमेशा कसक पैदा करती है| एक ही प्रेम को जीवन का आलंबन बना बैठे लोग हमेशा दुखी रहेंगे| एक सुन्दर उदाहरण "मैसेज इन अ बोटेल" है..
प्रेम में ये शर्तें नहीं चलेंगी| प्रेम तो सीमाएं जानता ही नहीं| एक सच्चा प्रेमी जितनी गहनता से अपनी प्रेमिका को चूम सकता है, वह उतनी ही शिद्दत से अपने खेत की मिट्टी भी जोत सकेगा| उसके चुम्बन में जितनी गरमाहट होगी, उतनी ही मुल्क की सरहद पर बह रहे उसके लहू में भी| सच्चे प्यार में दीवानगी जरुर होगी| लातिनी कहावत है- "आमोर कुएर्दो नो एस आमोर" माने "बाहोश मुहब्बत, मुहब्बत नहीं"
और ऐसे असहज मनुष्य के प्रेम की परिणति यदि संयोग में होती है तो उसका भय अनंतकाल तक जारी रहने को अभिशप्त हो जाता है| प्रेम के भवितव्य का डर समाप्त हो जाने पर नये नए डर घर करने लगते हैं| बच्चों का डर, उनके भविष्य का डर, समाज का डर, आकांक्षाएं पूरी न हो पाने का डर..
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| चित्र विकिपीडिया से साभार |
ऐसे अपूर्ण प्रेम में पहली परिणति को प्राप्त हुए लोग जितने अभागे हैं, उससे कहीं ज्यादा वे जो दूसरी परिणति को प्राप्त हुए| अपूर्ण, मिथ्या प्रेम का भ्रम जितना जल्द टूट जाए बेहतर है| जीवनपर्यंत चलने वाला यह मिथ्याभास मनुष्य को खोखला कर देता है|
अपनी सत प्रकृति में प्रेम अनंत है| एक बार में कईयों से हो सकता है, एक के बाद कईयों से हो सकता है| प्रेम की अपनी यह माँग हमेशा कसक पैदा करती है| एक ही प्रेम को जीवन का आलंबन बना बैठे लोग हमेशा दुखी रहेंगे| एक सुन्दर उदाहरण "मैसेज इन अ बोटेल" है..
प्रेम में ये शर्तें नहीं चलेंगी| प्रेम तो सीमाएं जानता ही नहीं| एक सच्चा प्रेमी जितनी गहनता से अपनी प्रेमिका को चूम सकता है, वह उतनी ही शिद्दत से अपने खेत की मिट्टी भी जोत सकेगा| उसके चुम्बन में जितनी गरमाहट होगी, उतनी ही मुल्क की सरहद पर बह रहे उसके लहू में भी| सच्चे प्यार में दीवानगी जरुर होगी| लातिनी कहावत है- "आमोर कुएर्दो नो एस आमोर" माने "बाहोश मुहब्बत, मुहब्बत नहीं"
(जाड़ों की किसी दुपहर इन्द्रियातीत तन्द्रा के दौरान आये इनकोहेरेंट विचार)
11:46 PM
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By कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
कई दिनों से सोच रहा था, कि कुछ लिखूँ
कितना तो घट रहा है चारों ओर,
कितना तो सर की सरहदों में घुमड़ रहा है,
असंख्य अनुभूतियाँ, गंध, आवाजें, इमेजेस..
किस पर लिखूँ?
बंद चैनल के पार टकटकी बाँधे त्रिपोली की उस छ: साल की लड़की पर
टकटकी एक लहूलुहान लाश पर/जो शायद उसका पिता था,
और माहौल में नुमायां फ़ौजी बूटों की क़दमताल, एक-दो-एक
या फिर लिखूँ पेट्रोल की आग में धुआँ होते मुहम्मद बौज़िजी पर,
या फिर लिखूं उम्मीद पर-
एक आदिवासन की उम्मीद पर, कि एक दिन उसका बेटा स्कूल में होगा
न कि दण्डकारण्य/लालगढ़ के जंगलों में,
और उसके गाँव से गुज़रने वाली चौड़ी सड़क वहाँ से कोयला/अभ्रक ले जाने के लिये ही बस नहीं होगी
बल्कि लेकर भी आयेगी- डिस्पेंसरी, डॉक्टर, और मलेरिया की दवायें
या फिर लिखूँ नैनीताल की उस शाम पर-
जब गहराती शाम में बादल हमें छूकर गुज़र रहे थे
और उस ठंडी बेंच पर भीगते हुए तुमने फुसफुसाकर मेरे कानों में कहा था-
ये पहाड़ कितने अपने लगते हैं..? है ना..!
लेकिन नहीं, मैं प्रेम पर नहीं लिख सकता..!
तब, जबकि फूकूशिमा कभी भी पिघल सकता है,
और बेनगाज़ी में सत्ता समर्थक मिलीशिया कभी भी घुस सकती है...
तब, जबकि उन चौड़ी सड़कों से पलामू में अभी तक केवल पहुँच पाये हैं पेप्सी और रिचार्ज कूपन,
और विदर्भ में लाखों भूमिहीनों के पास सल्फास खरीदने के भी पैसे नहीं बचे हैं...
तब , जबकि इस वसंत रात्रि में प्रतिपल पास आता चाँद तुम्हारी याद दिला रहा है,
पर मैं डर रहा हूँ पूर्णिमा को संभावित ज्वार की ऊँचाई से...
मैं प्रेम पर कैसे लिख सकता हूँ..?
जब छ: सौ भूकम्प के झटकों और सुनामी के बाद धरती अपनी धुरी से खिसक गई है,
और तब, जबकि हमारे हमारे समय की सच्चाई के नेज़े हमारे ही सीनों में पैवस्त हुए जा रहे हैं..
बेहतर होगा मैं न लिखूँ..
10:10 PM
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By कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
अपने गिरिजेश जी तो फगुनाहट में सराबोर हैं, उन्हें बखूबी साथ मिल रहा है अमरेन्द्र भाई का, तथा हिमांशु भाई का। कौन आचारज है, कौन चेला, कुछ भी क्लियराय नहीं रहा। जो भी हो, यह मंडली लगभग हर दूसरे ब्लॉग पर जोगीरा सरररर करते दिख जा रही है। ब्लॉग जगत का आपसी मनमुटाव और वैमनस्य भी मिट जाय इसी फागुन में, मेरी यह कामना है। जो भी हो, भाई लोग पूरे जोर शोर से श्रृंगार (सही वर्तनी नहीं) रस भांग की ठंडई में घोलकर सबको पिलाने में आमादा हैं।
सही है, पिछले वर्ष का फागुन माह तो वीर रस से ओतप्रोत था। मंगलौर में पबगामिनी बालाओं पर संस्कृति के रक्षकों के शौर्य प्रदर्शन से लगायत बाबा वेलेंटाईन की जयंती पर प्रेमाबद्ध जोड़ों को फोकट में परिणयसूत्र आबद्ध करने जैसे लोकमंगल के कार्यक्रमों ने इस माह को सात-आठ चाँद लगा दिये थे। प्रत्युत्तर में संस्कृति की भक्षक कुछ महिलाओं ने संस्कृति के रक्षकों को पिंकवर्णी परिधान भेंट किये.. अब ये तो श्रीराम जानें कि उनके सेनानियों ने उन वस्त्रों का क्या किया, लेकिन छौ-सात दिन न्यूज चैनल वालों ने जमकर चाँदी काटी।
उसी श्रीराम सेना के प्रमोद मुथालिक आजकल एक नया कैम्पेन चला रहे हैं.. वेलेंटाइन डे के दिन शौर्य की बजाय बौद्धिकता के द्वारा प्रेमी जोड़ों का मोहभंग करने की कोशिश की जा रही है। उन्हें समझाया जा रहा है कि ये ससुरे डे वे सब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मार्केटिंग का हिस्सा हैं, और कुछ नहीं। गुरुजी बौद्धिक रस का पान करा ही रहे थे, कि कुछ शरारती तत्व जोगीरा सरररर कहते हुए स्टेज पर चढ़ गये और गुरुजी के मुखारविन्द पर होली है के अंदाज में धई के करिक्खा पोत कर त्वरित गति से बिलायमान हो गये। कसमसा के रह गये गुरुजी।
मेरी व्यक्तिगत अवधारणा यह है, कि इस मामले में लगभग सभी पक्ष बराबर के दोषी हैं.. लड़कियाँ शराब पीकर अपनी सेहत खराब करें या जो भी करें, इससे प्रमोद भईया को काहे चुल्ल मच रही है भाई? अपने बच्चन जी की पंक्तियाँ सुना देनी थीं-
सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला|
वेदविहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला||
मेरा लक्ष्य दारूबाजी का समर्थन नहीं है, बल्कि इस बात का है कि कुछ लोग यह तय नहीं कर सकते कि अन्य लोगों की जीवनशैली क्या हो..!
पिंक चड्ढी कैंपेन हो या मुथालिक जी की फेस-पेंटिंग.. दोनों ग़लत चीज का ग़लत तरीके से विरोध था.. एक आज़ाद मुल्क़ भी विरोध प्रदर्शन के सभ्य तरीके अपना सकता है/अपनाना चाहिये/अपनाने को बाध्य किया जाना चाहिये। लेकिन इस बारे में मुथालिक फाउल खेलने का रोना नहीं रो सकते.. उनके खुद के तरीके बेहद ग़लत थे। मुँह पर कालिख पोतना या चड्ढियाँ भेजना अकेली लड़कियों पर हाथ उठाने से तो कम शर्मनाक है..
जहाँ तक वेलेंटाइन डे का सवाल है, निश्चित रूप से यह दिन बाजारवादी सभ्यता की देन है, जो रिश्तों को भी करेंसी में भुनाना चाहती है। पश्चिमी परिदृश्य में निरंतर खोखले हो रहे रिश्तों, किशोरों में बढ़ रहे माँ-बाप और घर से अलग रहने का ट्रेंड, बिना कमिटमेंट के रिश्ते, और दीर्घकालीन संबंधों से अरुचि जैसे अगणित कारक हैं, जो मदर्स-डॆ, फादर्स-डे, और वेलेंटाइन-डे जैसे दिनों को मनाने का मूल बनते हैं। उनके परिप्रेक्ष्य में यह ग़लत नहीं ठहराया जा सकता।
भारतीय सभ्यता तो हर दिन कोई न कोई त्यौहार मनाती है, न मानें तो पंचांग उठाकर देख लीजिये। ऐसे में माँ-पिता के सम्मान के लिये कोई विशेष दिन अलाट करने जैसी कोई बात नहीं हो सकती। लेकिन वेलेंटाईन-डे के साथ भी क्या ऐसा ही है, खुद से पूछिये।
लगभग पूरे देश, खासतौर पर उत्तर भारत में ऑनर किलिंग जैसी घृणित मध्ययुगीन परिपाटियाँ न सिर्फ़ जीवित हैं, बल्कि फल-फूल रही हैं.. तथाकथित ओपेन-माइंडेड वर्ग में भी। ब्लॉग लिखने-पढ़ने वाले लोग ज्यादातर बुद्धिजीवी होते हैं (कोई व्यंग नहीं, यह सामान्य मनोवृत्ति है), लेकिन आप में से कितनी बड़ी बेटियों के बाप अपने लड़कियों के विपरीत लिंगी मित्रों से सहज महसूस करते हैं..? कितने घरों में स्कूल/कॉलेज खत्म होने के एक या अधिक घंटे बाद घर लौटने वाली लड़की को संदेह की नजरों से नहीं देखा जाता..? फोन पर जरा सा भी मुस्कुराकर बात करती लड़की को देखकर किसके दिमाग में शक का कीड़ा नहीं कुलबुलाता..? अजी छोड़िये, अगर रात के 11 बजे या उसके बाद लड़की के फोन पर मिस्ड कॉल आ जाये, तो कितने पैरेंट्स हाइपरटेंशन का शिकार हो जाते हैं..! गिरिजेश जी भी यह बात स्वीकार कर चुके हैं, कि स्कॉलर बिटिया समय निकालकर ‘फाइव प्वाइंट समवन’ पढ़ लेती है, जबकि वे यह नहीं तय कर पाते हैं कि उसे ‘मुझे चाँद चाहिये’ पढ़नी चाहिये या नहीं..!
मैं नारी-मुक्ति आंदोलन की वक़ालत नहीं कर रहा/मेरे अंदर इतना बूता भी नहीं.. लेकिन हिन्दीभाषी, और खासकर गोबरपट्टी के माँ-बाप अपनी लड़कियों को आज भी आज़ादी देने के पक्षधर नहीं, बल्कि उनकी कंडीशनिंग ऐसी कर दी जाती है, कि वे राह चलते हो रही फिकराकशीं को सर झुकाये चुप-चाप सिर्फ बर्दाश्त करती जाती हैं, किसी सीधे-सादे लड़के के प्रपोज करने पर टसुए बहाते भाग निकलती हैं, और किसी मनबढ़ को खुलकर मना करने का साहस नहीं जुटा पातीं। मैं जिस कॉलेज में पढ़ता हूँ, वह उ०प्र० प्राविधिक विश्वविद्यालय (यू.पी.टेक्निकल यूनिवर्सिटी) के तीसरे नंबर का कॉलेज है- मेरिट और परीक्षा परिणामों की दृष्टि से। हालिया स्टार परफार्मर का भी पुरस्कार मिला है इसे.. लेकिन शाम साढ़े सात बजे लड़कियों को गार्ड सीटियों से ऐसे हाँक कर हॉस्टल भेजते हैं, जैसे बाल गोपाल माता से कह रहे हों- “मैया मैं तो धौरी चरावन जैहों”.. महीने में सिर्फ दो बार शॉर्ट लीव(साप्ताहिक अवकाश के दिन सुबह 8 बजे से शाम के 8 बजे तक, और वर्किंग डे में शाम 4:30 से 8 बजे तक) मिल सकती है उन्हें..! और कल परसों नया शगूफा छेड़ा गया, कि अब होली-दीवाली की छुट्टियों में घर जाने को तभी अनुमति मिलेगी, जब माँ-बाप में से कोई एक उन्हें लेने आता है..! कारण सिर्फ इतना है, कि अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक कोई छात्र-छात्रा कॉलेज ड्रेस में शहर में सिनेमा देखते पाये गये। कोई लड़की कॉलेज में किसी लड़के के साथ खुलेआम घूमती पाई जाये, तो उसकी मार्क्सशीट की सूरत बदल जाती है। कमाल की मुर्दा लड़कियाँ हैं, रोती हैं, कोसती हैं, लेकिन खुलकर विरोध नहीं जता सकतीं। निश्चित रूप से माँ-बाप ने बेहद उम्दा संस्कार दिये हैं.. और लड़कियों के पैरेंट्स की ड्रीम डेस्टिनेशन होता है यह कॉलेज।
चुनौती देता हूँ बजरंग दल, श्रीराम सेना और शिवसेना जैसे स्वघोषित संस्कृति के रक्षकों को.. इस अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठा कर दिखायें, मैं तुरन्त उनकी सदस्यता ग्रहण कर लूँगा..!
और इस दमघोंटू वातावरण में जी रहे एकाध पंछी वेलेंटाईन डे जैसे सिम्बोलिक दिन अगर साथ में कुछ समय व्यतीत करना चाहते हैं, या कोई दब्बू लड़का अपनी एकतरफा मुहब्बत का इज़हार करना चाहता है, तो भाईलोग मारते-पीटते हैं.. जबरिया शादी करा देते हैं, कालिख पोत कर शहर में घुमाते हैं.. उनको कानून हाथ में लेने से मना कर मेरठ की पुलिस ऑपरेशन मजनूँ चलाती है, सीओ साहिबा स्वयं लड़के-लड़कियों को कंटापित करती हैं.. संस्कृति के रक्षक कहते हैं कि हमारी सभ्यता में प्रेम के लिये कोई दिन विशेष निर्धारित नहीं- सही बात है भाई, तो फिर आज के दिन प्रेम की पींगे बढ़ा लेने दो, क्यों रोकते हो?
और अगर विरोध बाजारीकरण का है, तो फिर मदर्स-डे या फादर्स-डे का विरोध क्यों नहीं??
छोटे शहरों व कस्बों के माँ-बाप को अपने बच्चों को जीने का स्पेस मुहैया कराना ही होगा, अन्यथा उनका प्राकृतिक विकास अवरुद्ध ही होगा, कोई फायदा होने वाला नहीं। साथ ही साथ उन्हें अपने बच्चों पर, उन्हे दिये गये संस्कारों पर भरोसा करना ही होगा, इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं।
जो कहते हैं, कि पाश्चात्य सभ्यता के चलते युवाओं का चारित्रिक स्खलन हो रहा है, ऐसे स्व-नियुक्त नैतिकता के ठेकेदारों से कहना है कि हमारे नैतिक संबल बहुत मजबूत हैं, कृपया उनके बारे में न सोचें। आपको कोई हक़ नहीं इस सर्वसमावेशी प्राचीन सभ्यता के मठाधीश बनने का। जो लोग कहते हैं कि ये डे-वे मुक्त यौनाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, उनसे पूछना है कि ऐसा क्या है आज के दिन में, कि जो लड़की साल भर नैतिक बनी रहती है, वह आज के दिन ‘ससेप्टिबल’ हो जाती है..?
हमारी नैतिकता पर शक़ न करें.. बल्कि सच तो यह है कि नैतिकता का ढिंढोरा पीटने वाले यही सड़क छाप सेनानी होली के दिन राह चलती लड़कियों पर रंग भरे गुब्बारे चलाकर मारते हैं, मारें भी क्यों न, उस दिन उनकी सभ्यता इसकी इज़ाजत जो देती है। होली सांस्कृतिक है, लेकिन वेलेंटाईन डे नहीं..!
और अपने मित्रों से कहना है, कि प्रेम को अंतरतम से महसूस करें, वह किसी दिन, किसी व्यक्ति का मोहताज नहीं, किसी व्यक्ति से भी हो सकता है, शरीरी हो जरूरी नहीं, अशरीरी भी हो सकता है। जरूरी नहीं कि मुखर होकर ही अभिव्यक्त हो, मौन अभिव्यक्ति से क्या प्रेम न होगा..?
आज मेरी माँ का जन्मदिन है.. हैप्पी बर्थडे माँ, हैप्पी वेलेंटाईन डे।
और हाँ, सुबह वाली पोस्ट बस ये चेक करने के लिये थी, कि ब्लॉगजगत में लोग कितने खलिहर बैठे रहते हैं..
7:00 AM
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By कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
साढ़े तीन साल होने को आये मुझे बरेली में। एक ऐतिहासिक महत्व का शहर और कमिश्नरी होने के बावजूद इस शहर में एक बहुत बड़ी कमी है- सिनेमाहालों की। कुल जमा आठ-दस में से आधा दर्जन हॉल में या तो ‘जीने नहीं दूँगा’ और ‘चांडाल’ टाइप फिल्में लगी रहती हैं, या तो ‘सुनसान हवेली वीरान दरवाजा’टाइप.. आप समझ गये होंगे मैं क्या कहना चाह रहा हूँ।
पूर्वजन्म के पुण्यों के फलोदयस्वरूप यहाँ आने के चार-छ: महीने पहले एक सिनेमंदिर का जीर्णोद्धार हुआ, तो दूसरे का आने के साल भर भीतर। सच्ची बता रहे हैं, इन्हीं कुल जमा दो हॉलों के सहारे इतना लम्बा वक़्त इस खबीस कॉलेज में बिताया है।
सरस्वती शिशु मन्दिर से लगायत जीआईसी के दिनों तक XX क्रोमोसोम के सान्निध्य से कोसों दूर रहने के बाद जब लखनऊ जैसे शहर में ट्राईवैग और रूबिक्स के चार-चार सौ आईआईटियार्थियों के झुण्ड में पचास-साठ देवियों के दर्शन हुए तो चकित च विस्मित च किलकित च सस्मित (इन शॉर्ट भकुआये हुए) गच्च मन ने स्वयं से कहा- "ग़र फ़िरदौस बर रूये जमींअस्त, हमींअस्तो हमींअस्तो हमींअस्त "
लेकिन थोड़ा स्वाभिमान था, थोड़ी ग़ैरत, थोड़ा माँ-बाप के सपने पूरा करने का जोश, थोड़ा बड़े भाई का डर, थोड़ा छोटे शहर से कमाई हुई जीवन भर की परम चिरकुटई की पूँजी, और सबसे बढ़कर अलीगंज वाले बड़े हनुमान जी का शाप... साल बीत गया, लेकिन हमें किसी ने न तो घास डाली, न भूसा; और रिजल्ट आने के बाद जो जुताई हुई सो अलग।
बरेली में आने के बाद रही-सही ग़ैरत को तिलांजलि और बचे-खुचे स्वाभिमान को सुपुर्दे-खाक़ करने के बाद ऑपरेशन ‘एक से भले दो’ पर ध्यान केन्द्रित किया गया। रैगिंग के दरमियान समस्त चिरकुटाई झाड़कर फेंक दी(लगभग ही सही)। थोड़ा सीनियर्स के सिखाये गुर याद किये, थोड़ा लखनऊ में रात 11 बजे रेडियो सिटी पर आने वाले ‘लव गुरु’ के टिप्स रिवाइज किये और रैगिंग के दो महीने बाद छिली हुई कलमें वापस आते ही, और चेहरे की अनन्त गहराइयों तक खुरचकर साफ की गई दाढ़ी-मूँछ के पहले रेशों के नमूदार होते ही मैदान-ए-जंग में कूद पड़े..!
लगभग चार महीनों की अथक-अकथ मेहनत के बाल एक कन्या ने पहली बार हमारे सतत विविध भारती प्रसारण को अपना रेडियो ट्यून कर कृतार्थ किया। ये वही कन्या थी जो रैगिंग के दरम्यान सीनियर्स के अनुरोध(हुकुम) पर हमारे कंठ-ए-बेसुर द्वारा रेड़मारीकृत ‘तुम इतना जो मुस्करा रहे हो’ को सुनकर हँसते-हँसते लोटपोट हो गई थी.. और हमारी दीवानगी का आलम ये था कि उबासी लेने के बहाने भी अगर उसके दाँत दिख जायें तो पच्चीस-तीस ग़ज़लें लिख मारता था..!
उसकी दो चोटियों में बँधे लाल औ हरे रंग के रिबन्स में मुझे एक सुनहरे हिन्दुस्तान की तस्वीर दिखाई देती..(देशभक्ति का इतना ज्वार दुबारा नहीं चढ़ा कभी)। उसकी झुकी-झुकी सी नजर में मुझे अपने लिये शर्मो-हया नजर आती(ससुरी सब ग़लतफ़हमी थी)। कॉलेज के सालाना जलसे में जीटीआर(सेन्सर्ड) करने वाले सीनियर्स को पकड़-पकड़ कर खुद तो बाकायदे काटा ही, उसे भी अगणित चाट-पकौड़ी-मंचूरियन तुड़वाये।
बात शास्त्रसम्मत ढंग से आगे बढ़ रही थी। अगले कदम के रूप में सह-चलचित्रदर्शन का कार्यक्रम बना.. एकाध महीने तक इंतज़ार किया पूर्णतया शुद्ध-सुसंस्कृत-निरामिष फिल्म का। इंतजार ख़त्म हुआ.. फिल्म थी- विवाह (अपनी अंतरात्मा का कोल्ड-हॉर्टेड मर्डर करने के बाद कोई राजश्री ब्रदर्स की फिल्म देखने पहुँचा था.. आज तक रातों को चौंक कर उठ जाया करता हूँ- राधेकृष्ण की ज्योति अलौकिक).. रास्ते भर मारे खुशी से फूलते-पिचकते रहे। मार्ग में एक जगह ‘उसने’ इशारा करके खिड़की से बाहर देखने को कहा। जी धक से हो गया। अपशगुन के रूप में बाहर मुस्कुराती बजरंगबली की 100 फुटी प्रतिमा जैसे मुँह चिढ़ा रही थी। हे पवनसुत! यहाँ भी चैन नहीं लेने देंगे आप..। हृषीकेश पंचांग में बुरे सपने का फल नष्ट करने वाले सूत्र वाक्य-"लंकाया: दक्षिणे कोणे चूड़ाकर्णो नाम ब्राह्मण:, तस्य स्मरण मात्रेण दु:स्वप्नो सुस्वप्नो भवेत " को दोहराकर मन:शान्ति प्राप्त की..।
लेकिन बात निकली है तो फिर दूर तलक जायेगी। थियेटर था ‘प्रसाद’। बरेली वासी जिन वीरों को इस हॉल में पिक्चर देखने का ‘सौभाग्य’ प्राप्त हुआ है.. जैसे धीरू जी, या बर्ग-वार्ता वाले अनुराग शर्मा जी.., उनसे तस्दीक करा लीजियेगा.. किसी लकवाग्रस्त मरीज को बालकनी में बिठा दो, दस मिनट में सारी मुर्दा तंत्रिकाएं कराहने को जाग उठेंगी.. टिकट देखकर अटेंडेंट टॉर्चलाइट फेंकता हुआ(हॉल की तरफ कम, हमारी तरफ ज्यादा) बोला- "जे तीन रो छोड़कै अल्ली तरफ़ से सातवीं-आठवीं या पल्ली तरफ से तीसरी-चौथी पे बैठ जावो"
डिकोडिंग की सारी एल्गोरिदमें मिलकर भी हमें उस ब्रह्मदर्शन-सूत्र को हमारी भाषा मे नहीं समझा पाईं.. सारे कंपाइलर-इंटरप्रेटर फेल हो गये। गनीमत थी कि हॉल में ज्यादा लोग नहीं थे, वर्ना हमारी सीट तो मिल चुकी होती...
पाँच-सात मिनट सर्चित किये जाने के पश्चात एक सीट युगल मिला, जिसके चतुर्दिक वातावरण में ‘पान की पीकों का रैंडम डिस्ट्रिब्यूशन’ और ‘मूँगफली के छिलकों की डिस्क्रीट टाइम मार्कोव चेन’ अपने मिनिमा पर थी। जैसे तैसे कर उन सीटों में समाने की प्रक्रिया सम्पूर्ण हुई..।
असली संघर्ष अब प्रारम्भ हुआ। हर पाँच-सात मिनट पर बैठने की पोजिशन चेंज होने लगी। सीट और शरीर के संपर्क क्षेत्रफल को न्यूनतम करके, औ बार बार पहलू बदलकर दर्द का इक्वल एंड सस्टेनेबल डिस्ट्रिब्यूशन करने का प्रयास होने लगा..।
अंतत: एक घंटे की यंत्रणा सहन करने के पश्चात मेरा धैर्य जवाब दे गया। ‘उसकी’ पीड़ित नजरों का सामना करने में असफल होकर मैनें कहा-"लेट्स गो"। वह दूसरा शब्द सुनने के लिये रुकी भी नहीं..! ये प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया.. कि दिल करे हाय-हाय
एक वो दिन था, एक आज का दिन है। आपने सपनों पर जो तुषारापात उस दिन हुआ था, वह जमकर साढ़े तीन साल में ग्लेशियर बन गया.. पिघलता ही नहीं.. इसके बाद ‘उसने’कभी मेरी तरफ पलट कर नहीं देखा..!
यह थी एक प्रेम उड़ान की क्रैश-लैंडिंग..!
डिस्क्लेमर- इस कहानी के सभी पात्र व घटनाएं रीयल हैं.. नाम डिस्क्लोज नहीं कर रहा.."मैं ख़ुद भी एहतियातन उस तरफ से कम गुज़रता हूँ, कोई मासूम क्यों मेरे लिये बदनाम हो जाये "
ठेलनोपरांत- आज क्रिसमस है। कल रात से ही दो सरदार मित्र गुरविंदर और गुरप्रीत (संता क्लॉज-बंता क्लॉज) जिंगल बेल करते घूम रहे हैं.. और मैं आज ‘थ्री ईडियट्स’देखने जा रहा हूँ.. अब ये न पूछियेगा किसके साथ..! ऊँ सेंटाय नम:। आपकी-सबकी-मेरी क्रिसमस..
5:00 AM
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By कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
पहली ख़ता- स्वप्न
(..आगे)
सुगंध
याद है मुझे अब भी-वो रुत,
वो फिज़ा, जब हम
पहली बार मिले थे;
नरम जाड़ों के दिन थे वे,
और अचानक चलने लगी वो पुरवाई
समेट लाती थी अपने आँचल में तरह तरह की खुश-बूएं
याद है मुझे अब भी-
जब पहली बार मेरे कानों में गूँजी थी
तुम्हारी वो मिठास घोलती आवाज़.
और याद हैं तुम्हारी वो शरारतें-
आधी रात को चिढ़ाने वाली ‘मिस्ड काल्स’
लड़ते-लड़ते बीत जाने वाली रातें,
और सूरज के उगते ही मुँह छुपाकर सो जाना!
जब पहली बार मेरे कानों में गूँजी थी
तुम्हारी वो मिठास घोलती आवाज़.
और याद हैं तुम्हारी वो शरारतें-
आधी रात को चिढ़ाने वाली ‘मिस्ड काल्स’
लड़ते-लड़ते बीत जाने वाली रातें,
और सूरज के उगते ही मुँह छुपाकर सो जाना!
याद है मुझे अब भी-
छोटी-छोटी बातों पर तुम्हारा रूठ जाना,मेरा तुम्हें परेशान करना
और आखिरकार सुलह हो जाना।
और-
कि जब बातें किये बीत जाये एक अरसा
तो नामालूम सी बेचैनी का तारी हो जाना।

सफ़र
नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
जब पहली बार तुम्हारी आँखों से टपके उन क़तरों ने
तय किया था सफ़र
मेरी रूह तक का,
और भिगोते चले गये थे मुझे-
अन्दर, बेहद अन्दर तक!
नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
जब हँसने-खिलखिलाने के दौरान
छा जाती थी खामोशी,
और उसे तोड़ता एक आँसू-
छलक उठता था कभी मेरी आँख में
कभी तुम्हारी
जब हँसने-खिलखिलाने के दौरान
छा जाती थी खामोशी,
और उसे तोड़ता एक आँसू-
छलक उठता था कभी मेरी आँख में
कभी तुम्हारी
नहीं भुलाये जा सकते वे लमहे
तुमसे ज़ुदा होने के
माँ की नम आँखों के
पिता के बेचैन हो टहलने के।
नहीं पता था क्या शक़्ल अख्तियार करेगी
ये ज़ुदाई..
29 अक्टूबर 2005
रात्रि 1:45 बजे, लखनऊ
ठेलनोपरांत- पोस्ट को तारीख़ के सन्दर्भ में देखा जाय..
तुमसे ज़ुदा होने के
माँ की नम आँखों के
पिता के बेचैन हो टहलने के।
नहीं पता था क्या शक़्ल अख्तियार करेगी
ये ज़ुदाई..
29 अक्टूबर 2005
रात्रि 1:45 बजे, लखनऊ
ठेलनोपरांत- पोस्ट को तारीख़ के सन्दर्भ में देखा जाय..
(जारी..)
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