बहुत से पल जेहन में आते हैं, लमहे भर की कौंध चमक जाती है आँखों में और फिर धीरे-धीरे सब कुछ खो जाने का अहसास तारी होने लगता है। कॉलेज इतना अच्छा कभी नहीं लगा। रैगिंग से फेयरवेल तक की यादें न्यूज़रील की तरह सामने से गुज़र रही हैं और कमबख्त दिल यह मानने को तैयार नहीं कि यह इस कॉलेज, इस कैम्पस में मेरी आखिरे-शब है।
कल ईशान की एक मेल मिली। एक बच्चे की कहानी थी, जिसकी माँ किसी फर्म में काम करती थी। शाम को जब लौटी, तो दरवाजे पर खड़े बच्चे ने पूछा- "माँ, तुम्हारी एक घण्टे की सेलरी कितनी होती है?" माँ ने हिसाब लगाकर बताया- 50 रुपये| बच्चे ने कहा- "क्या मुझे 25 रुपये मिल सकते हैं?" थोड़ा ना-नुकर करने के बाद माँ पैसे दे देती है। बच्चा दौड़कर जाता है और अपने कमरे में तकिये के नीचे से जमा किये हुए कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकालता है। माँ का चेहरा तमतमा जाता है। वह डाँटते हुए कहती है "मेरी दिनभर की मेहनत के बाद थके हुए घर आने पर तुम मुझसे पैसे माँगते हो.. शायद कुछ खिलौनों के लिये.. वो भी तब, जबकि तुम्हारे पास पहले से ही पैसे हैं.. शर्म नहीं आती तुम्हें?"
बच्चा कहता है- "मेरे पास 25 पहले से थे, 25 तुमने दिये.. यह लो माँ, तुम्हारे एक घंटे की कीमत.. क्या तुम कल एक घंटा पहले घर आ सकती हो, तुम्हारे साथ कुछ वक़्त चाहिये।"
ब्लॉगिंग मेरी हॉबी है, लेकिन मेरे दोस्त मेरा पैशन। कोर्स के आखिरी कुछ दिन अपने दोस्तों को पूरा वक़्त दे सकूँ, इसलिये पिछली पोस्ट के बाद ब्लॉगिंग को अल्पविराम देने का निर्णय ले लिया। कल की यह मेल मिलने के बाद लगा, कि मेरा निर्णय ग़लत नहीं था।
और ये रात.. कई दिनों के बाद आज मौसम बहुत खुशगवार है। तेज पुरवाई चल रही है। गर्मियों में इससे अच्छे मौसम की उम्मीद नहीं की जा सकती। काश यह रात एक उम्र भर चलती। काश अगली सुबह कभी न होती। आखिर क्यों बदलता वक़्त ऐसे मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ सारी कोशिशों के बाद भी यह हक़ीकत झुठलाई नहीं जा सकती, कि बस एक क़दम और.. और फिर लौटकर आना न होगा। और यह जानने के बाद भी यह क़दम उठाना मजबूरी क्यों बन जाता है?
आखिरी वाइवा के दौरान राहुल कहता है- "यार ज़िन्दगी तो डीजे(आमिर खान, रंग दे बसंती) की तरह होनी चाहिये। डिग्री पूरी होने के दो साल बाद भी कॉलेज में पड़े हुए हैं। क्यों? क्योंकि यहाँ अपनी "औक़ात" है.." मेरे चेहरे पे मुस्कान तैर जाती है। काश यह सच हो सकता।
क्या तो नहीं किया इन चार सालों में, अपार्ट फ्रॉम स्मोकिंग एंड ड्रिंकिंग। गानों की उल्टी-सीधी पैरोडी बनाना, चीफ वार्डेन के सामने सिर झुका के खड़े रहना। विवेक के साथ बतियाते हुए सुबह हो जाना (वेन्यू- बाथरूम)। अली-मिश्रा-मुर्गा-माथुर-शेट्टी के साथ विवादास्पद मुद्दों पर रात भर चलने वाली असंसदीय बहस। Life In SRMS बनाना। सुबह तीन लेक्चर बंक करके चौथी लेक्चर अटेंड करने पहुँचना। पता चलने पर कि फ़ैकल्टी ऐब्सेंट है, उल्टे पाँव लौट आना। नतीजतन शॉर्ट अटेंडेंस का फाइन देना, पिता की डाँट सुनकर रेगुलर हो जाना, पैसे वापस मिलना। अगले सेमेस्टर में फिर शॉर्ट। तोड़-फोड़ करने के जुर्म में एक महीना हॉस्टल से बाहर रहना। वॉर्डन के फर्जी सिगनेचर मारने पर पूरे सेमेस्टर गेटेड रहना। फ्रस्टेशन में प्रोजेक्ट लैब में बैठकर पूरे डिपार्टमेन्ट को गालियाँ देना। पूरे मुस्लिम बाहुल्य इलाके में एकमात्र हिन्दू कौशल के ढाबे पर खाना। एक सेमेस्टर के बाद पता चलना कि उसका नाम कौशल नही क़ौसर है- क़ौसर मुहम्मद। लेकिन उसके हाथ के बने खाने के जायके के आगे भाड़ में गई पंडिताई..।
दोस्ती का पहला उसूल तोड़ने का मन करता है। जी में आता है हर दोस्त से गले मिलकर उसे "थैंक-यू" बोलूँ। यह जानते हुए भी कि दोस्ती में "थैंक-यू" नहीं बोलते। लेकिन जिन दोस्तों के साथ यह खूबसूरत चार साल बीते हैं, उनका क़र्ज़ कैसे चुकेगा?
"थैंक-यू" दोस्तों, इस कॉलेज को चार साल साथ में झेलेबल बनाने के लिये..
"थैंक-यू" पंकज, इस कॉलेज को घर जैसा अहसास देने के लिये। "थैंक-यू" विवेक, मेरी अंतहीन बकवासें सुनने के लिये।
"थैंक-यू" नंदी, हर शाम मेरे साथ कौशल भाई को तकलीफ देने चलने के लिये..।
"थैंक-यू" अली भाई उन सारी गरमा-गरम बहसों के लिये, जो किसी भी वक़्त हाथापाई में तब्दील हो सकती थीं..।
"थैंक-यू" साबू, गौरव, अन्ना, देवांश, सिद्धार्थ, प्रज्ञा, सौम्यता, श्रुति और असंख्य जूनियर्स, मुझे अपने बड़े भाई सा स्नेह देने के लिये।
"थैंक-यू" तन्वी, सौम्या, वन्दना, कीर्ति, मेरी सारी बर्थडे पर कार्ड बनाने के लिये, ट्रीट में गाने गाने के लिये।
"थैंक-यू" जागृति, इस पूरे 4 सालx365 दिनx24 घंटे मेरा साथ देने मौजूद रहने के लिये।
कितनी उम्मीदें, कितने अरमान लिये हम ज़िन्दगी से दो-दो हाथ करने का हौसला पाले रखते हैं। अब सामने मुँह फाड़े असल ज़िन्दगी दिखती है तो डर लगता है कि तुम्हारे बिना कैसे जूझ सकूँगा इससे??
विचार गड्ड्मड्ड हो रहे हैं। शब्द संयोजन बिगड़ रहा है। अब बंद करता हूँ। पैकिंग करनी है। कैम्पस से आखिरी पोस्ट है। देखते हैं असल ज़िन्दगी रूमानियत का कितना हिस्सा सोख लेती है..! कुछ लाइनें याद आ रही हैं..
वक़्त की क़ैद में ज़िन्दगी है मगर / चन्द घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं
इनको खोकर मेरी जानेजाँ / उम्र भर न तरसते रहो
आज जाने की ज़िद न करो.. यूँ ही पहलू में बैठे रहो..
बाद में: यह पोस्ट आलोक के लिये.. इस उम्मीद में कि अगली पोस्ट भी जल्द कर सकूँगा।
साढ़े तीन साल होने को आये मुझे बरेली में। एक ऐतिहासिक महत्व का शहर और कमिश्नरी होने के बावजूद इस शहर में एक बहुत बड़ी कमी है- सिनेमाहालों की। कुल जमा आठ-दस में से आधा दर्जन हॉल में या तो ‘जीने नहीं दूँगा’ और ‘चांडाल’ टाइप फिल्में लगी रहती हैं, या तो ‘सुनसान हवेली वीरान दरवाजा’टाइप.. आप समझ गये होंगे मैं क्या कहना चाह रहा हूँ।
पूर्वजन्म के पुण्यों के फलोदयस्वरूप यहाँ आने के चार-छ: महीने पहले एक सिनेमंदिर का जीर्णोद्धार हुआ, तो दूसरे का आने के साल भर भीतर। सच्ची बता रहे हैं, इन्हीं कुल जमा दो हॉलों के सहारे इतना लम्बा वक़्त इस खबीस कॉलेज में बिताया है।
सरस्वती शिशु मन्दिर से लगायत जीआईसी के दिनों तक XX क्रोमोसोम के सान्निध्य से कोसों दूर रहने के बाद जब लखनऊ जैसे शहर में ट्राईवैग और रूबिक्स के चार-चार सौ आईआईटियार्थियों के झुण्ड में पचास-साठ देवियों के दर्शन हुए तो चकित च विस्मित च किलकित च सस्मित (इन शॉर्ट भकुआये हुए) गच्च मन ने स्वयं से कहा- "ग़र फ़िरदौस बर रूये जमींअस्त, हमींअस्तो हमींअस्तो हमींअस्त "
लेकिन थोड़ा स्वाभिमान था, थोड़ी ग़ैरत, थोड़ा माँ-बाप के सपने पूरा करने का जोश, थोड़ा बड़े भाई का डर, थोड़ा छोटे शहर से कमाई हुई जीवन भर की परम चिरकुटई की पूँजी, और सबसे बढ़कर अलीगंज वाले बड़े हनुमान जी का शाप... साल बीत गया, लेकिन हमें किसी ने न तो घास डाली, न भूसा; और रिजल्ट आने के बाद जो जुताई हुई सो अलग।
बरेली में आने के बाद रही-सही ग़ैरत को तिलांजलि और बचे-खुचे स्वाभिमान को सुपुर्दे-खाक़ करने के बाद ऑपरेशन ‘एक से भले दो’ पर ध्यान केन्द्रित किया गया। रैगिंग के दरमियान समस्त चिरकुटाई झाड़कर फेंक दी(लगभग ही सही)। थोड़ा सीनियर्स के सिखाये गुर याद किये, थोड़ा लखनऊ में रात 11 बजे रेडियो सिटी पर आने वाले ‘लव गुरु’ के टिप्स रिवाइज किये और रैगिंग के दो महीने बाद छिली हुई कलमें वापस आते ही, और चेहरे की अनन्त गहराइयों तक खुरचकर साफ की गई दाढ़ी-मूँछ के पहले रेशों के नमूदार होते ही मैदान-ए-जंग में कूद पड़े..!
लगभग चार महीनों की अथक-अकथ मेहनत के बाल एक कन्या ने पहली बार हमारे सतत विविध भारती प्रसारण को अपना रेडियो ट्यून कर कृतार्थ किया। ये वही कन्या थी जो रैगिंग के दरम्यान सीनियर्स के अनुरोध(हुकुम) पर हमारे कंठ-ए-बेसुर द्वारा रेड़मारीकृत ‘तुम इतना जो मुस्करा रहे हो’ को सुनकर हँसते-हँसते लोटपोट हो गई थी.. और हमारी दीवानगी का आलम ये था कि उबासी लेने के बहाने भी अगर उसके दाँत दिख जायें तो पच्चीस-तीस ग़ज़लें लिख मारता था..!
उसकी दो चोटियों में बँधे लाल औ हरे रंग के रिबन्स में मुझे एक सुनहरे हिन्दुस्तान की तस्वीर दिखाई देती..(देशभक्ति का इतना ज्वार दुबारा नहीं चढ़ा कभी)। उसकी झुकी-झुकी सी नजर में मुझे अपने लिये शर्मो-हया नजर आती(ससुरी सब ग़लतफ़हमी थी)। कॉलेज के सालाना जलसे में जीटीआर(सेन्सर्ड) करने वाले सीनियर्स को पकड़-पकड़ कर खुद तो बाकायदे काटा ही, उसे भी अगणित चाट-पकौड़ी-मंचूरियन तुड़वाये।
बात शास्त्रसम्मत ढंग से आगे बढ़ रही थी। अगले कदम के रूप में सह-चलचित्रदर्शन का कार्यक्रम बना.. एकाध महीने तक इंतज़ार किया पूर्णतया शुद्ध-सुसंस्कृत-निरामिष फिल्म का। इंतजार ख़त्म हुआ.. फिल्म थी- विवाह (अपनी अंतरात्मा का कोल्ड-हॉर्टेड मर्डर करने के बाद कोई राजश्री ब्रदर्स की फिल्म देखने पहुँचा था.. आज तक रातों को चौंक कर उठ जाया करता हूँ- राधेकृष्ण की ज्योति अलौकिक).. रास्ते भर मारे खुशी से फूलते-पिचकते रहे। मार्ग में एक जगह ‘उसने’ इशारा करके खिड़की से बाहर देखने को कहा। जी धक से हो गया। अपशगुन के रूप में बाहर मुस्कुराती बजरंगबली की 100 फुटी प्रतिमा जैसे मुँह चिढ़ा रही थी। हे पवनसुत! यहाँ भी चैन नहीं लेने देंगे आप..। हृषीकेश पंचांग में बुरे सपने का फल नष्ट करने वाले सूत्र वाक्य-"लंकाया: दक्षिणे कोणे चूड़ाकर्णो नाम ब्राह्मण:, तस्य स्मरण मात्रेण दु:स्वप्नो सुस्वप्नो भवेत " को दोहराकर मन:शान्ति प्राप्त की..।
लेकिन बात निकली है तो फिर दूर तलक जायेगी। थियेटर था ‘प्रसाद’। बरेली वासी जिन वीरों को इस हॉल में पिक्चर देखने का ‘सौभाग्य’ प्राप्त हुआ है.. जैसे धीरू जी, या बर्ग-वार्ता वाले अनुराग शर्मा जी.., उनसे तस्दीक करा लीजियेगा.. किसी लकवाग्रस्त मरीज को बालकनी में बिठा दो, दस मिनट में सारी मुर्दा तंत्रिकाएं कराहने को जाग उठेंगी.. टिकट देखकर अटेंडेंट टॉर्चलाइट फेंकता हुआ(हॉल की तरफ कम, हमारी तरफ ज्यादा) बोला- "जे तीन रो छोड़कै अल्ली तरफ़ से सातवीं-आठवीं या पल्ली तरफ से तीसरी-चौथी पे बैठ जावो"
डिकोडिंग की सारी एल्गोरिदमें मिलकर भी हमें उस ब्रह्मदर्शन-सूत्र को हमारी भाषा मे नहीं समझा पाईं.. सारे कंपाइलर-इंटरप्रेटर फेल हो गये। गनीमत थी कि हॉल में ज्यादा लोग नहीं थे, वर्ना हमारी सीट तो मिल चुकी होती...
पाँच-सात मिनट सर्चित किये जाने के पश्चात एक सीट युगल मिला, जिसके चतुर्दिक वातावरण में ‘पान की पीकों का रैंडम डिस्ट्रिब्यूशन’ और ‘मूँगफली के छिलकों की डिस्क्रीट टाइम मार्कोव चेन’ अपने मिनिमा पर थी। जैसे तैसे कर उन सीटों में समाने की प्रक्रिया सम्पूर्ण हुई..।
असली संघर्ष अब प्रारम्भ हुआ। हर पाँच-सात मिनट पर बैठने की पोजिशन चेंज होने लगी। सीट और शरीर के संपर्क क्षेत्रफल को न्यूनतम करके, औ बार बार पहलू बदलकर दर्द का इक्वल एंड सस्टेनेबल डिस्ट्रिब्यूशन करने का प्रयास होने लगा..।
अंतत: एक घंटे की यंत्रणा सहन करने के पश्चात मेरा धैर्य जवाब दे गया। ‘उसकी’ पीड़ित नजरों का सामना करने में असफल होकर मैनें कहा-"लेट्स गो"। वह दूसरा शब्द सुनने के लिये रुकी भी नहीं..! ये प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया.. कि दिल करे हाय-हाय
एक वो दिन था, एक आज का दिन है। आपने सपनों पर जो तुषारापात उस दिन हुआ था, वह जमकर साढ़े तीन साल में ग्लेशियर बन गया.. पिघलता ही नहीं.. इसके बाद ‘उसने’कभी मेरी तरफ पलट कर नहीं देखा..!
यह थी एक प्रेम उड़ान की क्रैश-लैंडिंग..!
डिस्क्लेमर- इस कहानी के सभी पात्र व घटनाएं रीयल हैं.. नाम डिस्क्लोज नहीं कर रहा.."मैं ख़ुद भी एहतियातन उस तरफ से कम गुज़रता हूँ, कोई मासूम क्यों मेरे लिये बदनाम हो जाये "
ठेलनोपरांत- आज क्रिसमस है। कल रात से ही दो सरदार मित्र गुरविंदर और गुरप्रीत (संता क्लॉज-बंता क्लॉज) जिंगल बेल करते घूम रहे हैं.. और मैं आज ‘थ्री ईडियट्स’देखने जा रहा हूँ.. अब ये न पूछियेगा किसके साथ..! ऊँ सेंटाय नम:। आपकी-सबकी-मेरी क्रिसमस..