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रैगिंग, फ़िरदौस, अलीगंज वाले बड़े हनुमान का शाप और सिनेमाहॉल में एक प्रेम उड़ान की क्रैश लैंडिंग…


साढ़े तीन साल होने को आये मुझे बरेली में। एक ऐतिहासिक महत्व का शहर और कमिश्नरी होने के बावजूद इस शहर में एक बहुत बड़ी कमी है- सिनेमाहालों की। कुल जमा आठ-दस में से आधा दर्जन हॉल में या तो ‘जीने नहीं दूँगा’ और ‘चांडाल’ टाइप फिल्में लगी रहती हैं, या तो ‘सुनसान हवेली वीरान दरवाजा’टाइप.. आप समझ गये होंगे मैं क्या कहना चाह रहा हूँ।

पूर्वजन्म के पुण्यों के फलोदयस्वरूप यहाँ आने के चार-छ: महीने पहले एक सिनेमंदिर का जीर्णोद्धार हुआ, तो दूसरे का आने के साल भर भीतर। सच्ची बता रहे हैं, इन्हीं कुल जमा दो हॉलों के सहारे इतना लम्बा वक़्त इस खबीस कॉलेज में बिताया है।

सरस्वती शिशु मन्दिर से लगायत जीआईसी के दिनों तक XX क्रोमोसोम के सान्निध्य से कोसों दूर रहने के बाद जब लखनऊ जैसे शहर में ट्राईवैग और रूबिक्स के चार-चार सौ आईआईटियार्थियों के झुण्ड में पचास-साठ देवियों के दर्शन हुए तो चकित च विस्मित च किलकित च सस्मित (इन शॉर्ट भकुआये हुए) गच्च मन ने स्वयं से कहा- "ग़र फ़िरदौस बर रूये जमींअस्त, हमींअस्तो हमींअस्तो हमींअस्त "

लेकिन थोड़ा स्वाभिमान था, थोड़ी ग़ैरत, थोड़ा माँ-बाप के सपने पूरा करने का जोश, थोड़ा बड़े भाई का डर, थोड़ा छोटे शहर से कमाई हुई जीवन भर की परम चिरकुटई की पूँजी, और सबसे बढ़कर अलीगंज वाले बड़े हनुमान जी का शाप... साल बीत गया, लेकिन हमें किसी ने न तो घास डाली, न भूसा; और रिजल्ट आने के बाद जो जुताई हुई सो अलग

बरेली में आने के बाद रही-सही ग़ैरत को तिलांजलि और बचे-खुचे स्वाभिमान को सुपुर्दे-खाक़ करने के बाद ऑपरेशन ‘एक से भले दो’ पर ध्यान केन्द्रित किया गया। रैगिंग के दरमियान समस्त चिरकुटाई झाड़कर फेंक दी(लगभग ही सही)। थोड़ा सीनियर्स के सिखाये गुर याद किये, थोड़ा लखनऊ में रात 11 बजे रेडियो सिटी पर आने वाले ‘लव गुरु’ के टिप्स रिवाइज किये और रैगिंग के दो महीने बाद छिली हुई कलमें वापस आते ही, और चेहरे की अनन्त गहराइयों तक खुरचकर साफ की गई दाढ़ी-मूँछ के पहले रेशों के नमूदार होते ही मैदान-ए-जंग में कूद पड़े..!

लगभग चार महीनों की अथक-अकथ मेहनत के बाल एक कन्या ने पहली बार हमारे सतत विविध भारती प्रसारण को अपना रेडियो ट्यून कर कृतार्थ किया। ये वही कन्या थी जो रैगिंग के दरम्यान सीनियर्स के अनुरोध(हुकुम) पर हमारे कंठ-ए-बेसुर द्वारा रेड़मारीकृत ‘तुम इतना जो मुस्करा रहे हो’ को सुनकर हँसते-हँसते लोटपोट हो गई थी.. और हमारी दीवानगी का आलम ये था कि उबासी लेने के बहाने भी अगर उसके दाँत दिख जायें तो पच्चीस-तीस ग़ज़लें लिख मारता था..!

उसकी दो चोटियों में बँधे लाल औ हरे रंग के रिबन्स में मुझे एक सुनहरे हिन्दुस्तान की तस्वीर दिखाई देती..(देशभक्ति का इतना ज्वार दुबारा नहीं चढ़ा कभी)। उसकी झुकी-झुकी सी नजर में मुझे अपने लिये शर्मो-हया नजर आती(ससुरी सब ग़लतफ़हमी थी)। कॉलेज के सालाना जलसे में जीटीआर(सेन्सर्ड) करने वाले सीनियर्स को पकड़-पकड़ कर खुद तो बाकायदे काटा ही, उसे भी अगणित चाट-पकौड़ी-मंचूरियन तुड़वाये।

बात शास्त्रसम्मत ढंग से आगे बढ़ रही थी। अगले कदम के रूप में सह-चलचित्रदर्शन का कार्यक्रम बना.. एकाध महीने तक इंतज़ार किया पूर्णतया शुद्ध-सुसंस्कृत-निरामिष फिल्म का। इंतजार ख़त्म हुआ.. फिल्म थी- विवाह (अपनी अंतरात्मा का कोल्ड-हॉर्टेड मर्डर करने के बाद कोई राजश्री ब्रदर्स की फिल्म देखने पहुँचा था.. आज तक रातों को चौंक कर उठ जाया करता हूँ- राधेकृष्ण की ज्योति अलौकिक).. रास्ते भर मारे खुशी से फूलते-पिचकते रहे। मार्ग में एक जगह ‘उसने’ इशारा करके खिड़की से बाहर देखने को कहा। जी धक से हो गया। अपशगुन के रूप में बाहर मुस्कुराती बजरंगबली की 100 फुटी प्रतिमा जैसे मुँह चिढ़ा रही थी। हे पवनसुत! यहाँ भी चैन नहीं लेने देंगे आप..। हृषीकेश पंचांग में बुरे सपने का फल नष्ट करने वाले सूत्र वाक्य-"लंकाया: दक्षिणे कोणे चूड़ाकर्णो नाम ब्राह्मण:, तस्य स्मरण मात्रेण दु:स्वप्नो सुस्वप्नो भवेत " को दोहराकर मन:शान्ति प्राप्त की..।

लेकिन बात निकली है तो फिर दूर तलक जायेगी। थियेटर था ‘प्रसाद’। बरेली वासी जिन वीरों को इस हॉल में पिक्चर देखने का ‘सौभाग्य’ प्राप्त हुआ है.. जैसे धीरू जी, या बर्ग-वार्ता वाले अनुराग शर्मा जी.., उनसे तस्दीक करा लीजियेगा.. किसी लकवाग्रस्त मरीज को बालकनी में बिठा दो, दस मिनट में सारी मुर्दा तंत्रिकाएं कराहने को जाग उठेंगी.. टिकट देखकर अटेंडेंट टॉर्चलाइट फेंकता हुआ(हॉल की तरफ कम, हमारी तरफ ज्यादा) बोला- "जे तीन रो छोड़कै अल्ली तरफ़ से सातवीं-आठवीं या पल्ली तरफ से तीसरी-चौथी पे बैठ जावो"

डिकोडिंग की सारी एल्गोरिदमें मिलकर भी हमें उस ब्रह्मदर्शन-सूत्र को हमारी भाषा मे नहीं समझा पाईं.. सारे कंपाइलर-इंटरप्रेटर फेल हो गये। गनीमत थी कि हॉल में ज्यादा लोग नहीं थे, वर्ना हमारी सीट तो मिल चुकी होती...

पाँच-सात मिनट सर्चित किये जाने के पश्चात एक सीट युगल मिला, जिसके चतुर्दिक वातावरण में ‘पान की पीकों का रैंडम डिस्ट्रिब्यूशन’ और ‘मूँगफली के छिलकों की डिस्क्रीट टाइम मार्कोव चेन’ अपने मिनिमा पर थी। जैसे तैसे कर उन सीटों में समाने की प्रक्रिया सम्पूर्ण हुई..।

असली संघर्ष अब प्रारम्भ हुआ। हर पाँच-सात मिनट पर बैठने की पोजिशन चेंज होने लगी। सीट और शरीर के संपर्क क्षेत्रफल को न्यूनतम करके, औ बार बार पहलू बदलकर दर्द का इक्वल एंड सस्टेनेबल डिस्ट्रिब्यूशन करने का प्रयास होने लगा..।

अंतत: एक घंटे की यंत्रणा सहन करने के पश्चात मेरा धैर्य जवाब दे गया। ‘उसकी’ पीड़ित नजरों का सामना करने में असफल होकर मैनें कहा-"लेट्स गो"। वह दूसरा शब्द सुनने के लिये रुकी भी नहीं..! ये प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया.. कि दिल करे हाय-हाय

एक वो दिन था, एक आज का दिन है। आपने सपनों पर जो तुषारापात उस दिन हुआ था, वह जमकर साढ़े तीन साल में ग्लेशियर बन गया.. पिघलता ही नहीं.. इसके बाद ‘उसने’कभी मेरी तरफ पलट कर नहीं देखा..!

यह थी एक प्रेम उड़ान की क्रैश-लैंडिंग..!

डिस्क्लेमर- इस कहानी के सभी पात्र व घटनाएं रीयल हैं.. नाम डिस्क्लोज नहीं कर रहा.."मैं ख़ुद भी एहतियातन उस तरफ से कम गुज़रता हूँ, कोई मासूम क्यों मेरे लिये बदनाम हो जाये "

ठेलनोपरांत- आज क्रिसमस है। कल रात से ही दो सरदार मित्र गुरविंदर और गुरप्रीत (संता क्लॉज-बंता क्लॉज) जिंगल बेल करते घूम रहे हैं.. और मैं आज ‘थ्री ईडियट्स’देखने जा रहा हूँ.. अब ये न पूछियेगा किसके साथ..! ऊँ सेंटाय नम:। आपकी-सबकी-मेरी क्रिसमस..

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