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राहुल क्या वाकई इतने ही भोले हैं, या यह पीआर एजेंसी का मास्टरस्ट्रोक है..

राहुल द्वारा अर्नब को दिये गये इंटरव्यू के लतीफे बन रहे हैं| लेकिन इस इंटरव्यू से कुछ बातें खुलकर सामने आई, जो सबको समझ लेनी चाहिये- कांग्रेस के समर्थकों को भी, बीजेपी के भी..

1. राहुल की परवरिश बेहद ट्रॉमेटिक माहौल में हुई है.. वे भावनात्मक रूप से वंचित रहे हैं| वैवाहिक या गंभीर रोमांटिक सम्बन्ध इस कमी को पूरा कर सकते थे, जो नहीं हो पाया है|

2. उनका आईक्यू ख़राब से औसत के बीच में है.. समाज और देश के बारे में उनकी समझ एक औसत बीससाला ग्रेजुएट के बराबर है..

3. वे बहुत ज्यादा अंतर्मुखी, भयभीत, असुरक्षा के शिकार हैं| आवाज को ऊँचा करना, तैश दिखाना, पलट कर सवाल पूछना, बढ़ी हुई दाढ़ी, त्यौरियां उनका Ego Defense Mechanism है| उनका भय और असुरक्षा उनकी बॉडी लैंग्वेज से स्पष्ट है|

4. राहुल एनजीओ वालों के साथ बहुत ज्यादा समय बिता रहे हैं और देश के विकास की रणनीति के बारे में उन्हें लोक प्रशासन के किसी पहुंचे हुए प्रोफेसर ने चार बातें बता दी हैं| वे घुमा-फिरा कर वही सिस्टम-प्रोसेस-स्ट्रक्चर का पहाड़ा रट रहे हैं|

5. राहुल बेईमान नहीं हैं| वे खुद को बदलने और सीखने के लिए बेचैन हैं, लेकिन उनकी अपनी बौद्धिक सीमायें है| वे कुछ करने के लिये व्यग्र हैं, लेकिन समझ नहीं रहे हैं कि पिछले चार सालों में उनकी पार्टी की सरकार ने इतनी ज्यादा गंद मचा दी है, कि अब उनके द्वारा डिफेंस के लिये कुछ बचा नहीं है| इसी व्यग्रता में वे समकालीन विमर्श की दिशा बदलने का असफल, होपलेस प्रयत्न कर रहे हैं|

6. वे मोदी से फेस-टू-फेस लड़ना चाहते हैं, लेकिन घाघ राजनीतिज्ञ माँ ऐसा नहीं होने देना चाहती, क्योंकि हार की सूरत में फिर प्रियंका को लाने की आवाज उठेगी| सोनिया चाह रही हैं कि राहुल या तो बैकडोर से पीएम बन जाएँ या बीजेपी सुसाइड बटन दबा ले ताकि राहुल का मार्ग प्रशस्त हो|

7. राहुल राजनीति बिलकुल नहीं जानते हैं| उनके जैसे साधारण IQ वाले अतिभावुक व्यक्ति से राजनीति का मंझा खिलाड़ी होने की उम्मीद नहीं की जा सकती| लेकिन कोई अंतिम निर्णय देने से पहले यह याद रखना होगा, कि मोरारजी जैसे घाघ लोगों ने भी इंदिरा को शुरू में गूंगी गुड़िया समझने की गलती की थी|

मैं राहुल से सहानुभूति रखता हूँ| इस इंटरव्यू के बाद एक व्यक्ति के नाते राहुल के लिए मेरे मन में स्नेह और बढ़ गया है| बचपन के न भरे हुए जख्मों से जेहन पर पड़े अनगिनत घाव के साथ राहुल प्रेम और स्वीकार्यता के भूखे प्रतीत होते हैं| सोनिया की एक माँ के तौर पर यह असफलता है कि वे अपने पुत्र को ऐसी पीड़ा से गुजरने दे रही हैं|

लेकिन राहुल राजनीति में रहकर गलती कर रहे हैं| उनके टेम्परामेंट के हिसाब से राजनीति उनके लिये सही जगह नहीं.. अपनी इस कमी को उन्हें ईमानदार तरीके से स्वीकार करना चाहिये कि जिन हाई-फाई विचारों को वे आगे बढ़ा रहे हैं, अपने अल्पज्ञान के कारण ऐसा करते हुए वे बेहद हास्यास्पद लग रहे हैं| ऐसा ही, जैसा पांचवी का छात्र पोस्ट-ग्रेजुएशन का प्रश्नपत्र हल कर रहा हो|

उन्हें प्रेम करना चाहिये, एक समर्पित स्त्री से विवाह करना चाहिये खासतौर पर यह देखते हुए कि उनके खानदान के ज्यादातर वैवाहिक सम्बन्धी समर्पित कम, सत्ता के आतुर ज्यादा रहे हैं|

मैं उम्मीद करता हूँ कि नरेन्द्र मोदी भी अपनी मैस्कुलिन छवि और अहम् को दरकिनार करते हुए, अपने व्यक्तित्व की तमाम कमजोरियाँ उद्घाटित करने का रिस्क लेते हुए मुख्यधारा के किसी निष्पक्ष पत्रकार(?) को कोई ऐसा ही इंटरव्यू देंगे| हालांकि राहुल के पास मुख्यधारा की सेक्युलर मीडिया का कुशन है, और दस साल बाद मुंह खोलने की लक्ज़री.. मोदी दोनों ही चीज़ें अफ्फोर्ड नहीं कर सकते|

(या तो ऊपर लिखी सारी बातें सत्य हैं, या फिर जापानी पीआर एजेंसी का दाँव काम कर गया..)

ए सैटरडे (A Saturday)


कल एक ऐसी घटना से साबका हुआ कि अब तक दिमाग उसी में उलझा हुआ है।

शनिवार दिन होने के नाते कल सभी पाँचों मित्र- विवेक, धीरेन्द्र, एके, आनन्द और मैं सब्जी लेने साप्ताहिक बाजार गये हुए थे। बाजार का सबसे अच्छा समय रात को होता है, तो करीब 8 बजे हम सभी बाजार में टहल-घूम रहे थे। एक दुकान पर कई सारी हरी सब्जियाँ थीं, तो हम बैठकर छाँटने लगे।

तभी मेरे पीछे आठ-नौ साल का एक बच्चा अपना थैला लिये आकर खड़ा हुआ और बड़ी मासूमियत से पूछा कि- “लौकी कैसे है..?” दुकानदार ने तीस के भाव बतलाए। बच्चे ने दुबारा पूछा- “कम नहीं होगा?” उसकी मासूमियत को देखते हुए हम लोगों ने दुकानदार से पैसे कम करने को कहा, वह भी तुरंत 25 में देने को तैयार हो गया। और उसे इंतजार करने को कहकर हमारी सब्जी देने लगा। बच्चा मेरे पीछे कुछ यूँ खड़ा था कि उसका थैला मेरे आगे फैला हुआ मुझे आधा ढँक रहा था।

तभी मुझे अपनी शर्ट की जेब में कुछ सरसराहट सी महसूस हुई। मुझे लगा कि मेरा गैलेक्सी S-2 वाइब्रेट कर रहा है, मैनें हाथ लगाकर चेक किया, मेरा वहम मात्र था। मैं शिमला मिर्च छाँटने हेतु आगे झुका, तभी वह सरसराहट दुबारा हुई। सचेत मस्तिष्क ने सुझाया कि मामला कुछ गड़बड़ है। मैनें कनखियों से देखा तो लगा कि वह बच्चा असहज रूप से आगे की ओर झुका हुआ है। मुझे मामला समझते देर नहीं लगी, लेकिन स्वाभाविक रिफ्लेक्स एक्शन को रोकते हुए मैनें प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया। हम सब्जियाँ लगभग ले चुके थे, लेकिन मैनें कुछ समय और व्यतीत कर कोशिश की कि उसे फोन चुराने का पूरा अवसर मिले। मैनें जबरदस्ती और सब्जियाँ लेने का निर्णय किया। मित्र समझ नहीं पा रहे थे कि मामला क्या है। बच्चे और अन्य का ध्यान बँटाते हुए मैनें शर्ट की तंग जेब में फँसे मोबाइल को ढीला किया और अगले 10-15 सेकेण्ड उसके उत्साहित हाथों से मोबाइल चुराये जाने की प्रक्रिया का आनन्द लेता रहा। साथ ही बगल में खड़े विवेक को फुसफुसाकर पीछे चल रही गतिविधि के बारे में बताया। वे सब चतुराईपूर्वक उसके पीछे खड़े हो गये। दुर्भाग्यवश जेब उसकी कल्पना से ज्यादा चुस्त निकली। हताश होकर मुझे तीन-चौथाई बाहर निकले फोन से ही संतोष करना पड़ा और पलटकर उसका हाथ पकड़ लिया। हम सब उसे लेकर अगले 20 मिनट बाजार में टहलते रहे और अपने सामान खरीदते रहे। बच्चे के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। न ही भय, न भागने का प्रयास, न रोना-गाना। पहली बार में ही उसने स्वीकार कर लिया कि वह चोरी करने का प्रयास कर रहा था।

किनारे लाकर पूछताछ करने पर उसने अपना नाम रोहन बताया। पुरानी दिल्ली स्टेशन पर माँ-बाप के साथ रहता है। वे भागलपुर के रहने वाले हैं, जगह कोई साहबगंज। दोनों मजदूरी करते हैं, वह स्कूल नहीं जाता, चोरी करता है। आज पहली बार फोन चोरी करने का प्रयास कर रहा था, बोहनी बिगड़ गई। माँ का फोन नंबर दिया।

बात करने पर उसकी माँ अनीता ने बताया कि वह अपने पति की तबीयत खराब हो जाने के कारण भागलपुर वापस आ गई है और रोहन उसी के साथ है। दुबारा कड़ाई से पूछने पर उसने कहा कि वह बच्चे को उसकी मौसी के सुपुर्द कर आई थी कि उसे कुछ दिन बाद भागलपुर पहुँचवा दे। वे बहुत गरीब हैं, एक बच्चा गोद में है आदि रोना धोना.. हम उसके बेटे को छोड़ दें और पुलिस के पास न ले जायें। दाल में कुछ काला पाकर मैनें कहा कि बच्चा पहले ही पुलिस को सौंपा जा चुका है और वे मुखर्जीनगर थाने में आकर बच्चे को रिसीव कर लें। उसने अपनी दूरी का रोना रोया और कहा कि हम बच्चे को छोड़ दें।

रोहन और उसकी माँ की बातों में कई विरोधाभास देखकर हमने मामले को आगे बढ़ाने का निश्चय किया। पुलिस की एक पैट्रोलिंग पार्टी आई, जिसे सारी स्थिति समझाई गई। लेकिन दिल्ली पुलिस की लिंग व बच्चों के प्रति संवेदनशीलता के खराब ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए मुझे बच्चे को सीधे उन्हें सौंपने में कोई समझदारी नहीं दिखी। मैनें चाइल्डलाइन को 1098 पर फोन किया, और उन्हें सारी स्थिति समझाई। उन्होंने इस क्षेत्र में काम करने वाले संबद्ध एनजीओ ’प्रयास’ से मुझे कनेक्ट किया। उनसे बात करता-करता मैं थोड़ा आगे आ गया तभी सेकेण्डों में एक विचित्र घटना घटी—

मेरे फोन पर लगे होने के दरमियान बच्चे ने मित्रों व पुलिस को बताया कि वे दो-तीन एक साथ काम करते हैं। एक ऑटोवाला उन्हें रोज सुबह लाकर किसी बाजार में छोड़ता है, और शाम को वही वापस ले जाता है। उनके वापस जाने का समय हो चुका है, अत: वो ऑटो उसे ढूँढ रहा होगा।

बाकी मित्र व पुलिस पार्टी जहाँ खड़े थे वह रास्ता आगे जाकर डेड-एंड में समाप्त होता है। बच्चे के बताने के दो-तीन मिनट के भीतर उसी डेड-एंड की तरफ से एक ऑटो तेज गति से आता दिखा और बच्चे ने चिल्लाकर बताया कि यह वही ऑटो है। कॉन्सटेबल ने उसे रुकने का इशारा दिया, तो ऑटो बेहद तेज गति से भागने का प्रयास करने लगा। पैट्रोलिंग पार्टी ने गाड़ी दौड़ाकर उसे पकड़ लिया। वह इस बात का कोई संतोषजनक उत्तर दे पाने में अक्षम था कि आखिरकार वह किस तरफ से आ रहा था? उसने बच्चे को पहचानने से इनकार किया, बच्चे ने उसकी शिनाख्त करते हुए बताया कि वह उसी के घर में रहता है। ड्राइवर के पास न तो कागज़ात पूरे थे, न ही ऑटो मालिक के फोन नम्बर पर बात हो पा रही थी। वह कसमें खा रहा था कि वह बच्चे को नहीं जानता, बच्चा अड़ा हुआ था कि वह उसी के घर में रहता है। यह पूछे जाने पर कि ड्राइवर के घर में कौन-कौन है, उसने बताया कि उसकी बीवी और बच्चे। ड्राइवर ने तुरंत कहा कि उसकी तो शादी ही नहीं हुई है, हम चाहें तो तस्दीक कर लें। थोड़ी देर बाद वह अपनी बात से पलट गया, कि शादी तो हुई है लेकिन कोई बच्चा नहीं है। वह अब बुरी तरह से फँस चुका था और मामला सुलझता नजर आ रहा था।

मैनें एनजीओ ’प्रयास’ को दुबारा संपर्क किया और उनसे आगे की कार्यवाही के बारे में पूछा। उन्होंने मुझे बच्चे को पैट्रोलिंग पार्टी को सौंप देने को कहा। पार्टी का फोन नंबर लेकर मैनें बच्चे को उन्हें सौंप दिया और हम सब बातचीत करते 9 बजे घर लौट आये।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी। घर लौटने के आधे घंटे के भीतर पुलिस ने मुझसे संपर्क किया और कॉलोनी के बाहर आने का अनुरोध किया। इस बीच उसकी माँ ने मेरे फोन पर कॉल करके बच्चे को दुबारा छोड़ देने का अनुरोध किया, अपनी ग़लती की माफी माँगी और अपनी ग़रीबी की दुहाई दी।

मैं जब बताई जगह पहुँचा तो पुलिस पार्टी, ऑटोवाला, बच्चा आदि सब हमारा इंतजार कर रहे थे। पता चला कि बच्चा साफ झूठ बोल रहा था। ऑटोवाला निर्दोष था। बच्चे ने बताया कि उसका मौसेरा भाई उसका हैंडलर है। उन्होंने उसे सिखा रखा है कि पुलिस के चंगुल में बेतरह फँस जाने पर दिखने वाले पहले ऑटो की तरफ इशारा कर दो।

तुरत-फुरत एक योजना बनी। फोन को स्पीकर पर रखकर बच्चे ने अपने मौसेरे भाई को कॉल किया और उसे लंबा हाथ लगने की सूचना दी। मौसेरे भाई ने बताया कि वह करनाल बाईपास पर है और दो घंटे से पहले वहाँ नहीं पहुँच सकता। लेकिन थोड़ी देर बात करने के बाद उसे शक हो गया और उसने फोन काट दिया। कॉन्स्टेबल के नौसिखियेपन ने एक संभावित लीड खत्म कर दी। अबतक मामला इतना ज्यादा उलझ चुका था कि समझ आना बन्द हो गया था कि कौन सही है कौन गलत? बच्चे द्वारा बताई जाने वाली हर बात दस मिनट के भीतर गलत साबित हो जा रही थी। उन्होंने मुझसे थाने चलकर आधिकारिक रपट दर्ज कराने को कहा। मैनें उनकी बात मान ली और उन्हीं के साथ तीमारपुर थाने पहुँचा।

विवेचक मुकेश कुमार (एस.आई) ने हमारा स्वागत किया। उन्होंने अबतक की प्रगति हमें बताई (जो हमें पहले से मालूम थी) और पूछा कि हमलोग इस मामले में आगे किस तरह बढ़ना चाहते हैं?

यह एक जटिल प्रश्न था। चाइल्डलाइन को फोन करने और आगे के आपाधापी वाले दो-तीन घंटों में हमें ठंडे दिमाग से विचार करने का मौका नहीं मिला था। पुलिस प्रणाली का एक हिस्सा होने के बावजूद मेरे मन में स्वाभाविक भय था कि औपचारिक शिकायत का बच्चे का भविष्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि हम एफ.आई.आर दर्ज कराते तो निश्चित रूप से वह बच्चा अवैध हाथों में जाने से बच जाता। फिर उसकी पृष्ठभूमि की पूरी जाँच होती, यदि वह किसी रैकेट या सिंडिकेट का हिस्सा होता तो उसका पर्दाफाश होने की संभावना थी, वह ट्रायल होने तक किसी शेल्टर में रहता न कि थाने में।

दूसरी तरफ औपचारिक शिकायत करने का भय यह था कि दोषसिद्धि पर उसे बाल/किशोर सुधार गृह में भेजा जाता। जहाँ से 99% संभावना थी कि वह एक शातिर अपराधी बनकर निकलता। (इन सुधार गृहों का ट्रैक रिकॉर्ड हताशाजनक स्तर तक खराब है) पुन: एन.जी.ओ. के कार्यकरण पर भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता था। रैकेट का पर्दाफाश इस बात पर निर्भर करता कि विवेचक ने तफ्तीश कितनी गहराई में जाकर की है और चार्जशीट कितनी मजबूत है?

इन सबको देखते हुए सामने मौजूद बच्चे का भविष्य बचाना एक चिंता की बात थी। यदि हम अपनी शिकायत वापस लेते तो बच्चा अपने विधिक अभिभावक/माँ-बाप को सौंप दिया जाता। ऐसी स्थिति में आगे कोई औपचारिक तफ्तीश नहीं होती, लेकिन वह सुधार गृह जाने से बच जाता। यह एक अच्छी स्थिति थी, लेकिन इसमें डर यह था कि माँ-बाप के आने तक बच्चा पुलिस अभिरक्षा में रखा जात्ता, जहाँ उसके साथ जाने कैसा सुलूक होता? और सबसे बढ़कर यदि उसके अभिभावक ही उसके हैंडलर हुए तो क्या? कहीं पुलिस अपना पल्ला झाड़ते हुए उसे किसी ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे को सौंपकर ही निश्चिंत न हो ले।

लेकिन विवेचना अधिकारी मुकेश का व्यवहार आश्चर्यजनक रूप से ग़ैर-पुलिसिया लगा। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि वे अपने स्तर से अनौपचारिक तफ्तीश किसी औपचारिक तफ्तीश से ज्यादा गंभीरता से करेंगे तथा बच्चे को उसके स्थानीय अभिभावक को नहीं बल्कि उसके असली माँ-बाप को ही सौंपा जायेगा। तथा इस दरम्यान बच्चा किसी सज्जन के घर पर रहेगा।

मुझे पता था कि इन दावों/वादों के गलत साबित होने की संभावना बहुत ज्यादा है लेकिन दूसरे विकल्प में उसके भविष्य के बर्बाद होने की संभावना कहीं ज्यादा लग रही थी। यह एक एथिकल डाइलेमा था, जिसमें कानून/नैतिकता का झुकाव पहले विकल्प की तरफ स्पष्टत: था, लेकिन हम लोगों ने अंतरात्मा की आवाज पर ज्यादा भरोसा करते हुए मुकेश जी की सद्भावना पर दाँव लगाने का निश्चय किया। फोन नंबरों तथा जानकारी के आदान-प्रदान हुए और मैनें लिखित तौर पर अपनी शिकायत वापस ली। मुकेश ने हमें धन्यवाद दिया और हम रात के 11:30 बजे घर वापस लौटे।

सोचा था कि मामले से जुड़ी कुछ तस्वीरें भी पोस्ट करूँगा, लेकिन मन नहीं कर रहा। शायद फिर कभी..

अपडेट: रात के 3:30 बजे मेरा फोन बजा। मुकेश का फोन था। वे 4 बजे मेरे कमरे पर आये, नींद से जगाने के लिये माफी माँगी। मुझे जो बात बताई, उसका शक तो था लेकिन सुनकर पाँव तले जमीन खिसक गई। जिनका दावा बच्चा कर रहा है, वे उसके माँ-बाप नहीं हैं। उन सबके फोन अब बंद हो चुके हैं। वह शायद अनाथ है या बहुत पहले अपहृत। फिलहाल उसके बांगलादेशी होने की संभवानाएं टटोली जा रही हैं। मुकेश मुझे अपडेट देकर, दुबारा माफी माँगकर, एक गिलास पानी पीकर सीढ़ियों से नीचे उतर चुके हैं। मैं नीचे देखता हूँ, बच्चा अँधेरे में उनका हाथ पकड़कर चल रहा है। दिल्ली पुलिस का यह दुर्लभ मानवीय चेहरा ड्यूटी खतम होने के बाद भी पसीने से लथपथ दौड़धूप कर रहा है और मुझे महसूस हो रहा है कि शायद मेरी अंतरात्मा ने सही सलाह दी थी। जानता हूँ कि अभी उम्मीद करना Hopelessly Early होगा, लेकिन एक चुटकी उम्मीद अभी कायम है।
     

सिद्धार्थ का दूसरा महाभिनिष्क्रमण..

गत 20 जनवरी को मेरे बड़े भाई डॉ० सिद्धार्थ Ischemic Heart and Brain Disorders पर शोध करने के लिये 3 साल के लिये दक्षिण कोरिया के लिये रवाना हुए.. परिवार में किसी की पहली विदेश यात्रा है यह.. सबका विचलित होना स्वाभाविक है.. मेरे विचलन का परिणाम है ये कुछ पंक्तियाँ..




भैया,
जा रहे हो तुम ना,
इस वतन से, इस आबो-हवा से दूर
नये लोगों के बीच
नई परिस्थितियों के बीच..




देखो-
तुम्हें विदा करने कौन आया है....!

गाँव के बाहर कच्चे आम के बागीचे/टपकते महुए के बाग
उसके पार धान के खेत/पम्पिंग-सेट के हौदे
कर्बला पर के साँप-बिच्छुओं की अनगिन दंतकथायें
पेड़ की कोटरों में छिपे चिड़ियों के अंडे
वे सारे तोते, जो तुमने पोसे
तुम्हारे खींचे कबड्डी-चीके के पाले/गाड़ी गईं विकेट
तुम्हारी लखनी/दुबरछिया के डंडे/सतगाँवा की गोटियाँ
तुम्हारा पहला बल्ला/सॉरी, मैनें तोड़ दिया था उसे
और तुम्हारी पहली ट्रॉफियाँ- जीते गये अनगिनत कंचे
जो मैनें हारे, सीखने की प्रक्रिया में.....


महिया में डूबा भूजा/अलाव में भुना आलू
नेपाली रबर की गुलेल- बहुत शिकार किये थे तुमने
पाठशाला के मौलवी साहब के डंडे
पोखरे का शिव मंदिर/घाट की सीढ़ियाँ/शिवरात्रि का मेला
नागपंचमी के दिन पुतरी पीटने के ताल-तलैये
दशहरे की रामलीला/ठाकुर जी का झूलन


बाबूजी का अखबार-ऐनक-खड़ाऊँ/अम्माँ का मीसा हुआ भात/चटनी
सोते हुए माँ के हाथों की खिलाईं रोटी/दी गई थपकियाँ
पापा के हाथ/बिना जिनके पकड़े दूध तुम्हारे गले से नीचे नहीं उतरता था
छोटे चाचा/जो रामलीला में तुम्हारे पीछे खड़े होकर तुम्हें
चतुर्भुज विष्णु का रूप देते/जबकि तुम स्टेज पर उँघ रहे होते
बड़े चाचा की लेग-स्पिन होती गेंदे
हर छुट्टी में तुम्हारे-मेरे पीछे पेट की दवा और पानी का गिलास लेकर दौड़ती बहन
जिसका पाणिग्रहण कराके विदा किया है तुमने अभी
टिल्लू, आदित्य, छुटकी, छोटा बाबू/तुम जिनके लिये बाबाभैया हो
और मैं..!


और भी हैं....
लखनऊ यूनिवर्सिटी के लेक्चर हॉल/सिमैप की लैब
क्लासिक की चटनी/बादशाहनगर का प्लेटफॉर्म/गोरखनाथ एक्सप्रेस
रविवार को मौसी के घर का खाना/गंजिंग
रीगल सिनेमा/पालिका बाजार/नाथू के समोसे
कोटला फीरोजशाह के बंद दरीचों के बाशिंदे
बुआ की बनाई घुघनी/दिल्ली की ठंड
और...और...और...


और भी असंख्य चीजे हैं, जो विदा करती हैं तुम्हें
ये और कुछ नहीं, तुम्हारे अस्तित्व के कण हैं/तुम्हारे फंडामेंटल पार्टिकल्स
ये सारे रंग/खुशबुयें/स्वाद/इमेजेस/महसूसियात/श्रुतियां/स्मृतियां
सहेज कर ले जाना अपने साथ
खुद को कभी अकेला नहीं पाओगे/अजनबियों के बीच भी
निस्वार्थ प्रेम रहा है इनका/किसी प्रतिदान की आकांक्षा नहीं




लेकिन मेरी एक आस है.....


सदियों पहले तुम्हारे ही एक  नेमसेक ने घर छोड़ा था
तो दुनिया को मिली थी ज्ञान, सत्य की अद्भुत विरासत
शांति के अनंतिम शिखर..
मैं चाहूँगा-
इस गाँव-गिराँव-समाज-राज्य-राष्ट्र को कुछ मिले तुमसे
सुना तुमने!


मैं चाहूँगा,
यह सिद्धार्थ का दूसरा महाभिनिष्क्रमण सिद्ध हो..!

जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......

प्रिय मित्रों,
आज अपनी एक ऐसी कृति पोस्ट कर रहा हूँ, जो मेरे दिल के बेहद करीब है। बचपन गाँव में गुजारने के बाद मैं शहर में रहा तो ज़रूर, लेकिन दिल से गाँव की कसक आज भी नहीं छूट पाई है। कभी दुनिया भर के स्वार्थ और दोस्ती के लिबास में छुपी मक्कारी से दिल दुखा, तो टीस के उन्ही पलों में यह कविता कागज़ पर उतर आई.....










शाम
के अंधेरे कमरे में याद की किरणें आती हैं,
साथ ये अपने लाखों किस्से कई 'फ़साने लाती हैं.

सारी दुनिया सोई पड़ी थी जब अपने अपने टपरे में

तब गाँव के उस पुश्तैनी घर के कोने वाले कमरे में-

दी मेरे रोने की आवाजें पहली बार सुनाईं थीं,
बूढे घर के कोने कोने में खुशियाँ ही छाईं थीं.
मेरी किलकारी
के स्वर उस घर में फ़िर-फ़िर गूंजे थे
और
पुरनियों के कंठों से सोहर के स्वर फूटे थे.
यह सब केवल स्वप्न था मैनें यह रहस्य पहचाना है
जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......




है याद मुझे स्नेहिल माँ की गोदी की वह गरमाई भी,
और पिता के उन्ही प्रतिष्ठित कन्धों की ऊंचाई भी.
भइया ने नापा तो पाया मैं डेढ़ हाथ का बौना था,
और दीदी के लिए मैं आया नया नया खिलौना था.
थाम पिता की उंगलियाँ जब मैंने पहले कदम रखे,
तबसे सारी राह चला हूँ बिना रुके और बिना थके.
है याद मुझे मौलवी साब को चिढा स्कूल से भाग जाना,
नमक जेब में हाथ में डंडा, अमिया तोड़-तोड़ खाना।



सावन के उफने खेतों में मछली पकड़ने का वो कांटा,

और पकड़े जाने पर भईया के हाथों का वह चांटा.
यह सब केवल स्वप्न था मैनें यह रहस्य पहचाना है,
जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......



यूँ पंख लगाकर गया बचपना केवल यादें छोड़ गया,
छठें साल का पहला दिन ही सारे सपने तोड़ गया.
लाख खुशी होने पर भी कुछ टूट गया सा लगता था,
शहर के शोर-ओ-गुल में गाँव छूट गया सा लगता था.
कूलर
की ठंडक में भी अमराई की लू याद आती
थी,
और गर्मी की सूनी दुपहरें सदा रुलाकर जातीं थीं.
वे दोस्त नहीं, वे बाग़ नहीं, वह
गन्ने की मिठास नहीं,
दो-चार टिकोरे खाने के बाद
उठने वाली प्यास नहीं.
सभ्य शहरियों के खेलों में ओल्हा-पाती का अहसास नहीं,
इन सभी बनावटी चेहरों में कहीं छुपा उल्लास नहीं.
मानव-मन की गहराई में मिटटी की बू-बास नहीं,
बागी मन विद्रोह कर उठा शहर की दुनिया रास नहीं.
यह सब केवल स्वप्न था मैनें यह रहस्य पहचाना है,
जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है......


यह जीवन मात्र मधुर स्मृतियों का प्यारा कोलाज कहाँ !
इस क्षणभंगुर जीवन में जो कुछ कल था अब वह आज कहाँ !
हैं शब्द वहीं और अर्थ वहीं, हैं सुर भी वहीं पर साज कहाँ !
हैं अकबर और ज़फर के वंशज पर वह तख्त-ओ-ताज कहाँ !
है वही बचपना दिल में जवाँ लेकिन अब वह अंदाज कहाँ !
कुछ छुपा नहीं परदों में अब वे कल के पोशीदा राज कहाँ !
वादे थे जिनसे वफाओं के वे आज मेरे हमराज कहाँ !
अब शाहिद-सैफ-करीना हैं, संयोगिता-पृथ्वीराज कहाँ !
यह सब केवल स्वप्न था मैंने ये रहस्य पहचाना है,
जीवन खुशियों का ताना तो संघर्षों का बाना है.......



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    पेशे से पुलिसवाला.. दिल से प्रेमी.. दिमाग से पैदल.. हाईस्कूल की सनद में नाम है कार्तिकेय| , Delhi, India

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