दूसरी संपूर्ण क्रांति

सोच रहा हूँ आज से ६४ साल पहले नोआखाली की एक झोंपड़ी में बैठे अस्सी बरस के उस बूढ़े को इस वक़्त कैसा लग रहा होगा..! जीते जी अप्रासंगिक हो जाने का दंश सहते हुए भी वह महात्मा दूसरों के बहाये लहू को धुलने की कोशिश कर रहा था..

बासठ साल की जीवन प्रत्याशा वाले देश में ६४ बरस तक जी लेना स्वयं में किसी उपलब्धि से कम नहीं है, तिसपर एक पूरा मुल्क़ इतना जी ले तो जश्न तो बनता ही है..

लेकिन इस जश्न पर यह तीरगी सी क्यों छाई है?..

सुबह दस बजे सोकर उठा और ढूंढने पर भी किसी चैनल पर प्रधानमंत्री के भाषण के फुटेज नहीं दिखे.. पता नहीं किसी ७४ बरस के बूढ़े को उस महात्मा के समकक्ष दिखाने की होड़ मची थी.. आखिर डीडी न्यूज़ पर प्रधानमंत्री का संबोधन देखने को मिला, लेकिन विद्वान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री भी उसी बावले बूढ़े की बात करते नज़र आये..

जब एक सफेद बालों वाला बूढ़ा किसी आज़ादी के जश्न को हाइजैक कर लेने की काबिलियत रखता हो, तो वह लोकतंत्र के सरकारी संस्करण के लिये खतरनाक साबित हो सकता है, यह मजमून १४-१५ अगस्त को मनीष तिवारी जैसों से लेकर सिब्बल व सोनी जैसों के चेहरे पर पसरी दहशत से साफ पता चल रहा था। अहंकार भरे, जहर बुझे बयान केवल उस आतंक को अंडरलाइन करते ही नजर आ रहे थे..

व्यक्तिगत तौर पर मैं जनलोकपाल बिल के कई प्रावधानों का विरोधी हूँ.. विशेषकर प्रधानमंत्री और उच्च न्यायपालिका को इसके दायरे में रखने का। किसी देश में टॉप एक्जीक्यूटिव को कमजोर करके आप कुछ नहीं पा सक्ते.. विशेषकर भारत जैसे व्यापक असमानताओं वाले परिवेश में किसी ईमानदार out of the box ideas की बहुत आवश्यकता है, जो जनलोकपाल की गिद्ध दृष्टि के रहते संभव नहीं है, अभी सोनिया जी के सामने मनमोहन सिंह की जो स्थिति है, कमोबेश वही स्थिति भावी प्रधानमंत्रियों की जनलोकपाल के समक्ष हो जायेगी। पुन: न्यापालिका की स्वतंत्रता पर आक्षेप संविधान निर्माता पितृपुरुषों के स्वप्नों की बर्बर हत्या के तुल्य होगी। इसके अतिरिक्त इसके अधिकांश (सभी नहीं) प्रावधान मुझे समीचीन लगते हैं.. हालांकि मैं उनपर यहां बहस नहीं चाहता।

सरकारी लोकपाल संयुक्त सचिव से नीचे की जाँच नहीं करेगा.. इस एलीट लोकपाल को दांत विहीन वॉचडॉग बनाया गया है जो सिर्फ़ भौंक सकता है, काट नहीं सकता। वहीं जनलोकपाल ऐसा खूंखार भेड़िया है, जिसके आँख-कान-नाक की जगह भी दांत ही दांत हैं। दोनों पर्याप्त रूप से ग़लत हैं, और जो मध्यमार्ग संयुक्त मसौदा समिति से निकलना चाहिये था, वह नहीं निकला तो दोनों पक्ष जिम्मेदार बनते हैं, विशेषकर सिविल सोसायटी पक्ष.. अपने ड्रॉफ्ट पर अड़ियल रवैया अपनाकर अन्ना की टीम भी परोक्ष रूप से संसद (and hence जनता) की सर्वोच्चता पर ही प्रश्नचिह्न लगा रही थी।

अप्रैल से अबतक सरकार के नपेतुले क़दमों का प्रशंसक था। सिविल सोसायटी को पर्याप्त इज़्ज़त बख्शते हुए उसे लोकपाल की संयुक्त मसौदा समिति में आमंत्रित करना, प्रोटोकॉल को धता बताते हुए रामदेव की अगवानी और कुत्सित राजनीति का प्रयास करने पर "रामलीला".. ये सभी कदम प्रशंसनीय थे, जम्हूरियत को मज़बूत करने वाले थे..

लेकिन रामदेव प्रकरण के बाद तो जैसे ‘भारत सरकार’ ‘कांग्रेस सरकार’ में तब्दील हो गई, हर बात में अपना घृणित सांप्रदायिकता कार्ड खेलने लगी.. अन्ना और साथियों पर व्यक्तिगत आक्षेपों की झड़ी,... हद है। मनीष तिवारी जैसे भी अन्ना को ‘तुम’ कहकर संबोधित करने लगे। आरोप लगे कि उनके जन्मदिन पर ट्रस्ट ने 2.2 लाख खर्च किये, अगर यह बात सही भी है तो उन लोगों ने यह तोहमत लगाने की बेशर्मी कैसे दिखाई जो अपने जन्मदिन पर करोड़ों की माला पहनते हैं। जस्टिस सावंत की बात करने वाले जस्टिस सुखटंकार नाम गोल कर जाते हैं.. केवल इसी आरोप की कमी रह गई है कि अन्ना अपना कुर्ता कलफ नहीं करते.. जनता को तो सबों ने जैसे सल्फेट समझ रखा है.. घृणित है यह सब। माने अगर हमारे जैसे लाखों करोड़ के भ्रष्टाचारियों, हत्यारों, बलात्कारियों पर उंगली उठाने के लिये तुम्हें निष्पाप, निष्कलंक देवदूत होना पड़ेगा।

14-15 अगस्त को अन्ना के साथियों को अनशन की जगह देने के लिये जिस क़दर दौड़ाया गया, और बचकानी राजनीतिक स्वार्थपूर्ण शर्तें रखी गईं, यह देख-सुनकर अगर बापू की आत्मा बोल सकती, तो 15 अगस्त को प्रधानमंत्री को अपनी समाधि के आसपास फटकने भी नहीं देती.. यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें एक अदद असहमति के लिये भी जगह नहीं??

यह लोकतंत्र की विफलता की निशानी है कि अबतक सिविल सोसायटी ही फ्रंट पर है.. जीवंत लोकतंत्र में एकबार जनमत बन चुकने के बाद इस आंदोलन की बागडोर अबतक राजनीतिक दलों के हाथ में होनी चाहिये थी.. सत्ता परिवर्तन होने पर सत्तासुख उन्हीं को भोगना है, सिविल सोसायटी को नहीं। लेकिन अच्छा भी है.. विपक्ष में बैठी पार्टियां भी सत्ताधारी पार्टी की ही कार्बन कॉपी हैं, कई माय्नों में तो ओरिजिनल से भी ज्यादा खतरनाक.. इन गिद्धों को मौका न ही मिले तो अच्छा है।

निश्चित रूप से यह एक व्यापक लड़ाई की शुरुआत है.. दूसरी संपूर्ण क्रांति। लेकिन दुर्भाग्य था कि पहली संपूर्ण क्रांति केवल सत्ता परिवर्तन तक ही सीमित रह गई, इस क्रांति को कहीं ज्यादा गहरे उतरना होगा, व्यवस्था परिवर्तन को लक्ष्य करना होगा। ‘77 में चूकने के 34 साल बाद दुबारा मौका मिला है। इस बार चूके तो शायद दुबारा मौका न मिले। देश ‘77 की असफलता दुबारा नहीं झेल सकता। अब प्रश्न जनलोकपाल का नहीं, "जन-गण-मन" के "स्वाधिनायकत्व" का है..

समय- वही जब स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने की घोषणा की जा रही है
स्थान- वही शहर, जो बारिश में भीगता हुआ दम साधे अगली सुबह के इंतजार में है..      



------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
यह लेख 15 अगस्त को लिखा था.. आज सुबह पता चला कि अन्ना को गिरफ्तार कर लिया गया है, और |म को दो खबरें एक साथ। एक- उन्हें तिहाड़ में कलमाडी के साथ रखा गया है, दो- 87 वर्षीय जस्टिस राजेंद्र सच्चर को धारा 144 भंग करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, तब जबकि वह अकेले थे। दिन भर के कार्यकलाप पर कोई टिप्पणी नहीं.. यह उन बिरले दिनों में से है, जब एक की गलती पर पूरा राष्ट्र शर्मिंदा होता है। मैं इसे 30 जनवरी 1948 और 4 नवंबर 1974 के समकक्ष रखता हूँ.. क्या 25 जून 1975 की भी पुनरावृत्ति होगी, समय ही उत्तर देगा।


एक और बात.. ब्लॉग पर समय नहीं दे पाता हूँ.. लेखन के कीड़े को शांत रखने के लिये कभी कभार कुछ लिख दे रहा हूँ.. पढ़ अवश्य लेता हूँ, परन्तु मेरी अपनी पोस्ट पर भी संवाद कायम नहीं हो पाता है, आप लोगों की पोस्ट पर तो दूर की बात है.. इस अपराधबोध से बचने के लिये टिप्पणी का विकल्प बंद कर रहा हूँ.. जब व्यस्तता से मुक्ति मिलेगी, तब दुबारा चालू होगा..

बेहतर होगा मैं न लिखूँ..




 कई दिनों से सोच रहा था, कि कुछ लिखूँ
कितना तो घट रहा है चारों ओर,
कितना तो सर की सरहदों में घुमड़ रहा है,
असंख्य अनुभूतियाँ, गंध, आवाजें, इमेजेस..



  
किस पर लिखूँ?
बंद चैनल के पार टकटकी बाँधे त्रिपोली की उस छ: साल की लड़की पर
टकटकी एक लहूलुहान लाश पर/जो शायद उसका पिता था,
और माहौल में नुमायां फ़ौजी बूटों की क़दमताल, एक-दो-एक


या फिर लिखूँ पेट्रोल की आग में धुआँ होते मुहम्मद बौज़िजी पर,


या फिर लिखूं उम्मीद पर-
एक आदिवासन की उम्मीद पर, कि एक दिन उसका बेटा स्कूल में होगा
न कि दण्डकारण्य/लालगढ़ के जंगलों में,
और उसके गाँव से गुज़रने वाली चौड़ी सड़क वहाँ से कोयला/अभ्रक ले जाने के लिये ही बस नहीं होगी
बल्कि लेकर भी आयेगी- डिस्पेंसरी, डॉक्टर, और मलेरिया की दवायें


या फिर लिखूँ नैनीताल की उस शाम पर-
जब गहराती शाम में बादल हमें छूकर गुज़र रहे थे
और उस ठंडी बेंच पर भीगते हुए तुमने फुसफुसाकर मेरे कानों में कहा था-
ये पहाड़ कितने अपने लगते हैं..? है ना..!


लेकिन नहीं, मैं प्रेम पर नहीं लिख सकता..!
तब, जबकि फूकूशिमा कभी भी पिघल सकता है,
और बेनगाज़ी में सत्ता समर्थक मिलीशिया कभी भी घुस सकती है...
तब, जबकि उन चौड़ी सड़कों से पलामू में अभी तक केवल पहुँच पाये हैं पेप्सी और रिचार्ज कूपन,
और विदर्भ में लाखों भूमिहीनों के पास सल्फास खरीदने के भी पैसे नहीं बचे हैं...
तब , जबकि इस वसंत रात्रि में प्रतिपल पास आता चाँद तुम्हारी याद दिला रहा है,
पर मैं डर रहा हूँ पूर्णिमा को संभावित ज्वार की ऊँचाई से...


मैं प्रेम पर कैसे लिख सकता हूँ..?
जब छ: सौ भूकम्प के झटकों और सुनामी के बाद धरती अपनी धुरी से खिसक गई है,
और तब, जबकि हमारे हमारे समय की सच्चाई के नेज़े हमारे ही सीनों में पैवस्त हुए जा रहे हैं..


बेहतर होगा मैं न लिखूँ..

पारिवारिक मूल्यों की संरक्षक एक आवारा मसीहा को अश्रुशेष श्रद्धांजलि..

गाँव आना हुआ। लोगबाग वही, धूर-धक्कड़ वही, पोखरे में काई भी उतनी ही, और उसमें नहा रहे महँगू के लौण्डों के बदन पर चीकट मैल भी उतनी ही.. लेकिन परिवार का एक अभिन्न सदस्य अनुपस्थित था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी घृतकौशिक गोत्र: त्रिप्रवर: बाभन परिवार की रसोई जुठारते मार्जार वंश की चश्मो-चिराग़, मेरी अग्रजा की लाडली "मोनू की बिलार" परिदृश्य से गायब थी.. आशंका सच निकली.. माँ की जानकारी ने अद्यतन किया कि बिलार जीवन रंगमंच पर अपनी भूमिका निभा कर प्रभु चरणों को प्राप्त हुई। दुखित हृद्य को एक ठेलनीय सामग्री की भूमिका बँधती दिखी। नया न लिखकर डायरी के पुराने पन्ने पलटे। एक संस्मरण चेंप देना सही समझा।

ये पोस्ट तब लिखी थी, जब शीतलहर अपने अगले पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ने को बेकरार थी, परम आदरणीय नारायण दत्त तिवारी की बूढ़ी ख्वाहिशें की चीनी खतम होने का नाम नहीं ले रही थी.. और भगवान अंशुमालि कुहासे से युद्ध में इज़्ज़त का फालूदा करवाने को जरा भी उत्सुक नहीं नजर आ रहे थे.. तारीख जनवरी माह के उत्तरार्ध का कोई भी दिन मान लें।

**********************************************************************************
"अईसन जाड़ त कब्बो नाहीं परल बाबू".. नरायन महतो खँखार कर बोले। "बुझात बाटे जइसे ई सीत बाता तूरि के करेजवा में धंसि जाई.."

सच है, बहुत ठंड पड़ी इस साल। साल के पहले दिन सूरज ने अमर सिंह की तरह जो इस्तीफा दिया, सो पूरा महीना बीतने को आया, लेकिन नहिंये माने। गनीमत थी कि खिचड़ी के दिन दिख गये, वरना कुंभ में नहाने पहुंचे लोगों की आस्था का भ्रम टूटते देर न लगती। बहुतों ने नववर्ष का प्रथम स्नान खिचड़ी के ही दिन किया, और दूसरे स्नान की नौबत आज तलक नहीं आई।

कमबखत कुहरा लील गया कि डॉक्टर ने बेडरेस्ट की सलाह दे डाली। भगवान भुवनभास्कर बिलायमान हुए और बकौल के०पी० सक्सेना- "ठंड है कि किसी बूढ़े नेता की जिस्मानी हवस की तरह जाती ही नहीं"। असंख्य ऑक्टोजेनेरियन लोगबाग महाप्रयाण कर गये और अब भी लग रहा है कि पसलियाँ तोड़कर यह जाड़ा कलेजे में धंस जायेगा।

गेंहू की फसल पानी माँग रही है, लेकिन मौसम ऐसा नहीं हो पा रहा कि पानी चलाया जाय। बदली-कुहेसे-ओस में पाला मार गया तो? जनाउरों की हालत तो और गई गुजरी है। किसी छप्पर पे, बगीचे में बन्दरों को कुछ भी नहीं हासिल हो पा रहा। पत्तियां तक नोच-नोचकर खा गये, अब दूर-दूर तक कुछ भी नहीं। ठंड में कुड़कुड़ाते, एक टुकड़ा बेल पर सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट की जंग लड़्ते पेड़ों पर लटकायमान हैं।

उम्र के आखिरी पड़ाव पर चल रही घर की बिल्ली अपने पेट में ठंड लग जाने से परेशान है। सारा दिन कौड़े और चूल्हे के पास बिता रही है। जबतक चचेरे भाई-बहन छोटे थे, तबतक रोज ही उनका गिराया हुआ / उच्छिष्ठ दूध पीने को मिल जाया करता था। आदत इतनी बिगड़ गई कि रोटी-चावल का जायका ही अच्छा न लगे। सुबह पाँच बजे घर का दरवाजा खुलते ही दौड़कर बाहर से सीधे रसोई में.. अपने काम की चीजें ढूंढने में रत। माँ कहती है- "पूर्वजन्म में या तो इस घर की मलिकाईन रही होगी या कोई मुँहलगी कहाईन।" बड़ी बहन के आगे पीछे मँडराया करती। वह भी अम्माँ-बाबूजी की नजरों से बचाकर आलमारी से दूध-दही निकालते वक्त थोड़ा सा जानबूझकर गिरा देती। ग़ज़ब की सेलेक्टिव कंज्यूमर बिलार अगर दो दिन पुराना दही हो तो सूंघकर छोड़ देती। माँ चिढ़कर कहती- "इनके त सजाSव दही चाहीं" अम्मां को यह लगाव अच्छा नहीं लगता। वे बिल्लियों को धोखेबाज बतातीं। कहती हैं कि कुत्ते में स्वामिभक्ति होती है- "कुकुरा कहेला कि गोसैयां सलामत रहें कि कउरा पाईं, बिलरिया कहे कि गोसैयां आन्हर होखें कि एक्के में खाईं

विवाह के बाद बहन के ससुराल चले जाने के बाद बिल्ली का यह आखिरी मसीहा भी नहीं रहा। बेहतर भविष्य की तलाश में बिल्ली ने दूसरे घरों की तरफ पलायन किया। लगभग बीस-एक दिन बिल्ली नहीं दिखी। चिंतित होकर माँ ने दूसरे घरों में पता करवाया.. कोई सूचना न मिलने पर उदास मन से सबने यही माना कि उसकी इहलीला समाप्त हुई। लेकिन गाँव भर से मार-दुत्कार खाकर पुन: कंकालशेष बिल्ली वापस आई। और अब ये जाड़ा उसके प्राणों का ग्रहण बना हुआ है। चुल्हे और घर के अन्दर वाले कउड़े से शरीर तापकर किसी तरह जी रही है। हम लोगों के साथ तो बैठी रहती है, लेकिन बाबूजी के बैठने पर दूर हट जाती है। अब यह उनका लिहाज है या उनकी खड़ाऊं का भय, वही जाने।

तो भगवान भुवनभास्कर, बहुत हुई गुंडागर्दी.. अब चाहे पुरानी पार्टी में लौटिये या नई बनाइये। जो भी हो, एक विशाल जनसमूह प्रतीक्षारत है.. आइये, जनसभा को संबोधित कीजिये। किसी पीड़ित आत्मा की पुकार की एक बानगी पेश है-
वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहा है
मैं क्या कर रहा हूँ तू क्या कर रहा है
कड़ाके की सर्दी है और तू कमीने
जनाजे पे मेरे हवा कर रहा है।


पुनश्च: बिलार जाड़ा तो खेप गई, लेकिन घर में काम करने वाली मतवा ने एक दिन उद्घोषणा की कि बिलार को दरवाजे पर एक पुआल के ढेर पर ब्रह्मलीन पाया गया।  

झंडूबाम, वेयो-हेयो, अनजाना..ऐ..ऐ..ऐ.., यानी जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ हो गई उसको अब बेवा के माथे की शिक़न तक ले चलो।


अच्छा गाना बनाया है रहमान साहब ने- जियो, उठो, बढ़ो, जीतो..! इसी के साथ कई और गीत भी आजकल रेडियो पर सुनने को मिल जाते हैं- "मुन्नी बदनाम", "पी लूं..", "अनजाना..ऎ..ऎ..ऎ", और न जाने क्या क्या। बाजार की भाषा में ये सब चार्टबस्टर हैं। युवाओं की जुबान पर चढ़े, उन्हीं की धुनों में रचे बसे। परफेक्ट यूथ मैटेरियल।

लेकिन इनमें सब्सटांस कहाँ है? जनता की तथाकथित माँग और पसंद को ध्यान में रखकर बनाये जाने की दुहाई देते ये गीत न सिर्फ इनके रचयिता गीत(?)कारों के बौद्धिक दीवालियेपन का सुबूत देते हैं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को बौद्धिक जड़ता के धीमे जहर से सुला देने की पूँजीवादी-बाजारवादी दुश्चेष्टा की अनुगूँज भी इन बे-बहर-ओ-ताल गानों में सुनाई देती है।

क्या हमारा युवा केवल किसी की साँसों की शबनम पीने और जिस्म ओढ़्ने को ही बेताब बैठा है, या किसी के प्यार में झंडूबाम हो जाना ही उसके समर्पण की पराकाष्ठा है ? मुझे ऐसा नहीं लगता, अन्यथा इन गीतों को देख-सुनकर मुस्करा देने वाले युवाओं के बाजू दुष्यन्त की कालजयी.. "हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये" सुनकर नहीं फड़क उठते, भले ही उसे "हल्ला बोल" में कितने भी रॉक तरीके से पेश किया गया हो! यह तो बाजार की शक्तियां हैं, जो विश्व के विशालतम युवावर्ग को बौद्धिक आर्सेनिक पिलाकर चिर-शीतनिद्रा में सुलाये रखने पर आमादा हैं, ताकि इस बड़े उपभोक्ता वर्ग की नींद जब भी टूटे, तो एक बहुराष्ट्रीय उत्पाद खरीदने भर के लिये। विवेकानन्द की धरती पर पूरी एक पीढ़ी को पहले इस धीमे जहर के आगोश में सुलाना, फिर ऊर्जाहीनता के लिये रीवाइटल और क्लाउड-९ बेचना एक भद्दे मजाक के अलावा और कुछ नहीं। यही बाजार है जो "महँगाई डायन" जैसे अपील करने वाले गीत को भी डीजे मिक्स बनाकर नाइटक्लबों के अँधेरे में एलएसडी और टकीला के साथ कॉकटेल बनाकर बेच देता है। कभी सर्वहारा संगीत के बारे में सुना था। पता नहीं था क्या होता है यह? अब लगता है कि "महँगाई डायन" जैसा ही कुछ होता होगा। तो एलएसडी-टकीला-सर्वहारा संगीत का यह कॉकटेल बेहद मारक, बेहद बेचनीय साबित होता है। पूँजीवाद हर चीज, यहाँ तक कि अपने धुरविरोधी का भी बेहतरीन इस्तेमाल करना जानता है।

पीयूष मिश्रा का "जिस कवि की कल्पना में ज़िन्दगी हो प्रेमगीत, उस कवि को आज तुम नकार दो/भीगती मसों में आज फूलती रगों में आज आग की लपट का तुम बघार दो" इस सड़ांध में बादे-बहार की तरह आता है। प्रसून जोशी, स्वानंद किरकिरे भी प्राय: सार्थक गीत रचते नजर आते हैं। लेकिन इनकी बौद्धिक रचनायें वह प्रभाव नहीं पैदा कर पातीं, जो बड़वई के एक मुदर्रिस की "डायन" पैदा कर जाती है। किरकिरे का "देस मेरा रंगरेज ये बाबू" वो भदेसपन नहीं पैदा कर पाता, फिर भी असंख्य बौद्धिक अफीमचियों की जमात में ये इक्के-दुक्के नाम पूरे होशो-हवास में नजर आते हैं।

चिरकाल से भारतीय संगीत ईश्वर और प्रेम के इर्द-गिर्द घूमता आया है। बेहतरीन गजलगो और कवियों-शास्त्रीय गीतकारों की यह धरती स्वाभाविकत: श्रृंगार के लिये ही लिखती-रचती रही है। लेकिन प्रेम की रूमानियत को इस बाजार ने बेहद भद्दे तरीके से बेचना शुरु कर दिया है। युवा भावनाओं की अभिव्यक्ति के नाम पर रचे कुछ सार्थक गीतों में भी एक विक्रयवाद का पुट नजर आता है। विडंबना तो यह है कि संस्कार और सभ्यता के नाम पर हम जिस पाश्चात्य संगीत का आज तक धुरविरोध करते आये, उसने "Give Me Freedom, Give Me Fire" जैसे जज़्बे से भरे गीत रचे। वहीं हमारे अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध संगीतकार काँख-कूँखकर "लागी रे अब लागी रे लगन, जागी रे मन जीत की अगन" जैसी बेहूदा पंक्तियों पर टिक जाते हैं। विकल्पहीनता की स्थिति में वेयो-हेयो जैसे निरर्थक शब्दों का प्रयोग करने वाले इस निहायती गैर-भारतीय मुर्दा सपरेटे गीत में थोड़ी ऊर्जा तब प्रतीत होती है, जब पंजाबी ढोल नगाड़ों की बीट्स सुनाई देती है। मार्केटिंग बुरी चीज नहीं, बशर्ते सही चीज की सही ढंग से की जाये। जबर्दस्त मार्केटिंग हुए "वाका वाका" में खूबसूरत शकीरा के परालौकिक नृत्य के अलावा "You Are A Good Soldier Chosing Your Battle" जैसी खूबसूरत पंक्तियां भी थीं। और हमारी मार्केटिंग "मुन्नी बदनाम" पर आकर रुक जाती है।

बाजार का डर स्वाभाविक है। यदि यह विशाल युवाऊर्जा जाग उठती है, तो सबसे पहले सदियों के इस औपनिवेशिक-नवऔपनिवेशिक, पूँजीवादी-नवपूँजीवादी शोषण का हिसाब माँगेगी। इस्लिये इसके सोये रहने में ही बाजार की भलाई है। लेकिन यदा-कदा युवा भावनाओं को आवाज़ देते "ये हौसला कैसे झुके", "लक्ष्य", "लेफ्ट राइट लेफ्ट" जैसे गीत भी आते रहने चाहिये। ढाई सौ सालों से सोई "द ग्रेट इंडियन एनर्जी" को जगाने के लिये विवेकानन्द के अलावा सीनों में आग जलाने वाले दुष्यन्त और "आज हिमाल तुमन को धत्यूछ" की पुकार देने वाले गिर्दा की भी जरूरत पड़ेगी। नजीर-दिनकर-धूमिल की इस जमीन पर यह बौद्धिक शीतनिद्रा लंबी तो है, लेकिन चिरस्थायी नहीं। तभी तो कहीं से विद्रोह फूट पड़ता है-

भूख के अहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो
या ग़ज़ल को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो
जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ हो गई
उसको अब बेवा के माथे की शिक़न तक ले चलो। 
      
ठेलनोपरांत: पुख्ता खबरें हैं कि बिरजू महाराज सहित अन्य छ: विख्यात शास्त्रीय नर्तकों, जिन्हें कॉमनवेल्थ थीम सांग पर परफ़ारमेंस देनी थी, उन्होंने बोल में परिवर्तन के अनुरोध को रहमान द्वारा अस्वीकार कर देने के बाद प्रस्तुति न देने का फैसला किया है। अब शायद उनके दबाव में आकर प्रसून जोशी व रहमान ने गीत के बोल व धुन में थोड़ा बदलाव किया है। वस्तुस्थिति तो २३ को पता चलेगी, वैसे मुझे कोई खास उम्मीद नहीं नजर आती।  

चरण चुंबन और Saving Own Ass से अच्छा है तथाकथित "घटिया" निर्णय लेना..



कुछ दिनों पूर्व ब्लॉगिंग में मेरे पथ-प्रदर्शक सिद्धार्थ जी का एक लेख व्यापक बहस का मुद्दा बना था। मैं मैदाने-जंग से एज-यूजुअल अनुपस्थित था। अब सोच रहा हूँ अपना पक्ष रखके भागते भूत की लंगोटी तो सहेज ही लूँ.. क्या पता  कॉमनवेल्थ गेमों में जो इज्जत नीलाम होने वाली है, उस समय अपनी इज्जत ढंकी रह जाये। 

प्रश्न यह है कि जिन प्रोफ़ेश्नल डिग्री धारकों, जैसे इंजीनियर, डॉक्टर आदि को प्रशासनिक क्षेत्र में आने से रोकने की बात की गई है, उन्होंने अपने प्रोफेशन का चयन किन परिस्थितियों में किया। मेरी व्यक्तिगत मान्यता व अनुभव यह है कि दसवीं के विद्यार्थी की शारीरिक-मानसिक परिपक्वता के कितने भी दावे कर लिये जायें, वस्तुस्थिति यही होती है कि प्लस टू के स्तर पर विषय चयन में उनका सबसे बड़ा प्रेरक तत्व संगी साथियों की अभिरुचि ही होती है। खासतौर पर गोबरपट्टी, उसमें भी मध्यम-निम्न मध्यमवर्गीय माता-पिताओं की दमित आकांक्षायें होती हैं कि उनका बेटा या बेटी इंजीनियर डॉक्टर बने। ये फ्रॉयडीय दमित इच्छाएं भी हो सकती हैं, लेकिन वर्तमान सामाजिक परिवेश में आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से इस प्रवृत्ति की सीधी आलोचना किया जाना भी श्रेयस्कर नहीं है।

तो बचपन से ही जहाँ बच्चे को यह सिखाया जा रहा हो कि बेटा अगर अंकल पूछें कि क्या बनोगे? तो बोलना इं..जी..नि..य..र.., या बेटी के केस में डॉक्टर।वहाँ वह बच्चा दसवीं तक आते आते अपना मानसिक स्तर इनके परे सोच सकने तक उठा ले, तो यह उसकी प्रबल इच्छाशक्ति ही होगी, कोई सामान्य परिस्थिति नहीं। तिसपर उसके सभी हमउम्र साथियों की यही सोच... इस भेड़ियाधसान में उसे कहाँ स्कोप है निरपेक्ष भाव से अपने कैरियर संबंधी निर्णय ले पाने का, या अन्य विकल्पों के बारे में सोच सकने का। यही विकल्पहीन की गई जनता ही जब आंखें मूंदे बंसल, फिटजी, आकाश के प्रश्नों के घोटे लगाये प्रथम-द्वितीय या तृतीय श्रेणी के कॉलेजों में दाखिला ले लेती है, और जब सत्य का साक्षात्कार होता है तो उनके हाथों के तोते उड़ जाते हैं। मेरे पास आज भी दोस्तों के एसएमएस आते हैं- " निगाह आज तलक ढूंढती है उस आदमी को, जिसने कहा था बी.टेक कर लो- बड़ा स्कोप है।"

एकाध बिरले कॉलेजों को छोड़ दिया जाय तो लगभग सभी इंजीनियरिंग कॉलेज इतनी सड़ांध मारती शिक्षा पद्धति से जुड़े हैं, जहाँ छात्र का चार वर्षीय कार्यक्रम बन जाता है येन-केन-प्रकारेण बैक बचाना। शिक्षकों के आगे-पीछे घूमकर, चरण-चुंबन के द्वारा इन्टर्नल जुटाना ताकि ग्रेड प्वाइंट/ परसेंटेज ठीक-ठाक बन सके। फ़िर इधर उधर से चुराये आइडिया को किसी तरह प्रोजेक्ट के रूप में पूरा करना। एकाध आईआईटी को छोड़ दें तो कहीं नवाचार, अनुसंधान पर कोई बल नहीं। स्मार्टनेस के नाम पर अभिरुचि घटियापन के सबसे निचले स्तरों को पार कर जाती है, ये सब इस प्रणाली के एड-ऑन हैं।  

कम्पनियों की भी यही परिस्थिति है। अधिकतम उदासीन और बॉस-चरणसेवी बनकर हर कोई “Saving Own Ass” में लगा हुआ है। आप बताइये- एक महात्वाकांक्षी, चुनौती स्वीकारने वाला और प्रतिभाशाली युवा अब क्या करे? इनमें वे विकल्पहीन भी होते हैं, और तुलनात्मक रूप से जानबूझकर यहाँ फ़ंसे युवा भी, जिनके सामने इस सेक्टर की हक़ीकत अब उजागर हुई है। अब अगर इसी सेक्टर में रहना है तो धीरे से विदेश की राह पकड़ लो.. तब भी लोगों की आलोचना का शिकार बनना है। भारतीय कंपनियां इन्फोसिस, टीसीएस, टेक-महेन्द्रा, एयरटेल, रिलायंस आदि सभी कर्मचारियों के लिये यातना शिविर बनी हुई हैं.. क्यों इन कंपनियों को अमेरिका में “Body Shops” कहकर हिकारत भरी नजरों से देखा जाता है, कारण यहाँ की व्याप्त घटिया कार्यसंस्कृति है जो किसी महात्वाकाँक्षी युवा को संतुष्ट कर पाने में असफल है। उपभोक्ता संतुष्टि के मामले में सेपिएन्ट, एसेंचर जैसी कम्पनियों की तुलना मॆं हमारी कम्पनियां कहाँ ठहरती हैं?

तो दूसरा विकल्प बचता है कैरियर स्विच करने का, और समझदार लोग वह करते भी हैं। आप फाउल नहीं रो सकते.. वे गैर विज्ञान विषय, जैसे दर्शन-लोकप्रशासन-समाजशास्त्र-मनोविज्ञान, यहां तक कि हिन्दी-उर्दू-पालि लेकर इन्हीं विषयों के ग्रेजुएट-पोस्टग्रेजुएट से स्पर्धा करते हैं और सफल होते हैं। आप इन्हें रोकने की वक़ालत क्यों करते हैं? संरक्षणवादी प्रवृत्तियां छोड़िये, मुक्त प्रतिस्पर्द्धा का जमाना है।

दूसरा प्रश्न उठा सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ का । आप तेजी से बदलती परिस्थितियों के सन्दर्भ में देखें, खासकर नब्बे पूर्व और आज। आर्थिक सुधारों, वैश्वीकरण से पूर्व प्रशासन की चुनौतियां क्या थीं, और अब क्या हैं? साइबर क्राइम, पर्यावरण संरक्षण, ई-वेस्ट, आपदा प्रबंधन, आर्थिक अपराध, ग्राहकोन्मुखता, आर्थिक अपराध, जल संसाधन प्रबंध, सूचना क्रांति, ई-गवर्नेंस, डिजिटलीकरण, पेपरलेस ऑफिस आदि प्रमुख प्राशासनिक चुनौतियां और दायित्व नब्बे से पूर्व कहां थे? आज ये लोकसेवा का बहुत बड़ा कार्यक्षेत्र निर्मित करते हैं, और प्रशासन में विशेषज्ञता की माँग करते हैं। लक्षण तो यही बताते हैं कि सामन्यज्ञों के दिन बस लदने वाले हैं। समान विषय लेकर चयनित व साक्षात्कार में पहुँचे दो अभ्यर्थियों, जिनमें से एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि का है और दूसरा गैर वैज्ञानिक पृष्ठभूमि का.. में से चयन करने में आयोग को कोई समस्या नहीं होती। और यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि एक बी.टेक. या एमबीबीएस बंदा किसी बीए-एमए का हक़ मार रहा है, बल्कि उपलब्धि यह है कि देश को एक योग्य प्रशासक मिल रहा है, जो समस्या निदान (Troubleshooting) में ज्यादा सक्षम है। इंजीनियर मुख्यमंत्री द्वारा शासित बिहार का विकास मॉडल, जो दशकों से पिछड़े राज्य को 11.5% की विकास दर तक पहुँचाता है, या अपराधियों का आधुनिक डाटाबेस इस्तेमाल करने वाली यूपी पुलिस, जो इस कार्य के लिये लखनऊ के पूर्व एसएसपी नवनीत सिकेरा(बी.टेक) की शुक्रगुजार है, या फिर रानीखेत के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट डॉ. अडप्पा कार्तिक, जो हर हफ्ते वहाँ की गरीब पहाड़ी जनता के लिये मुफ़्त चिकित्सा शिविर आयोजित करते हैं... ये सब बदलाव की खुशनुमा हवा के झोंके हैं। इनसे वंचित कराना किसी के साथ न्याय नहीं होगा.. न तो इन प्रतिभाओं के लिये, न ही पहले से ही भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और सदियों पुराने नियम कानूनों में जकड़ी अफसरशाही के लिये।

मौज में: वैसे भी इनके प्रशासन में आने से इंजीनियरिंग सेक्टर का कुछ बिगड़ने वाला नहीं। नैस्कॉम के सर्वे के मुताबिक नये नवेले पास-आउट में से लमसम 80% किसी तकनीकी नौकरी के लायक नहीं होते।        



    Review My Blog at HindiBlogs.org

    अपनी खबर..

    My photo
    पेशे से पुलिसवाला.. दिल से प्रेमी.. दिमाग से पैदल.. हाईस्कूल की सनद में नाम है कार्तिकेय| , Delhi, India

    अनुसरणकर्ता

    Your pictures and fotos in a slideshow on MySpace, eBay, Facebook or your website!view all pictures of this slideshow

    विजेट आपके ब्लॉग पर

    त्वम उवाच..

    कौन कहाँ से..