ना त्वम शोचितुमर्हसि





पिछ्ले तीन दिन बहुत गहमा-गहमी में बीते हैं, और इतना कुछ देख लिया है कि जीवन के सारे समीकरण बदले-बदले से नज़र आने लगे हैं।



दृश्य-



सोमवार (यहाँ साप्ताहिक अवकाश इसी दिन होता है) की शाम कैंटीन से लौटते वक़्त विपिन दिखाई देता है। चेहरे पर चिंता, हाथों में लीव कार्ड और क़दमों में तेज़ी. पूछने पर टाल देता है-नहीं!कुछ नहीं. पीछे से आते हुए रजत ने बताया 'पापा की तबीयत खराब है, घर जा रहा है'.



विपिन चला जाता है.



मेरा और विपिन का रिश्ता अज़ीब है. दूसरे सेमेस्टर में हम तीन(तीसरा विवेक) से पूरी क्लास, यहाँ तक की फैकल्टी भी त्रस्त रहती थी. क्या-क्या नाम मिले थे हमें- BBA ( बैक बेंचर्स एसोसिएशन), D.TEC (डिस्ट्रक्टिव थिंकर्स ऑफ EC ) और ना जाने क्या-क्या. हमारे काम ही ऐसे थे. केवल तीन चार कतारें भरी होने पर भी दसवीं(और आखरी!) कतार में बैठना, दूसरी-तीसरी क्लास के बच्चों की तरह रबर-शूटिंग, फैकल्टी के बोर्ड की तरफ मुड़ते ही क्लास का आसमान हीथ्रो एयरपोर्ट के आसमान से भी व्यस्त नज़र आता था. पढ़ाते समय फैकल्टी की नज़रें हम पर गड़ी रहती थीं. कहीं भी उजबकपने, इनकार, या नींद के लक्षण दिखे,तुरंत क्लास ओवर. आफ़त कौन मोल ले? तुर्रा ये कि बमुश्किल 15 लोग HOD की लेक्चर कर रहे हैं, और अटेंडेन्स 100%. उन्हें भी बोलना पड़ता था- इट सीम्स टू बी गुड स्ट्रेन्थ टुडे! किसी की भी अटेंडेन्स शॉर्ट हो रही हो, प्लीज़ कॉन्टेक्ट attendence@proxy.com



वहीं कुछ ग़लतफ़हमियाँ आईं, और सब ख़तम। एक दूसरे की शकल तक देखना गवारा नहीं। बात इतनी बिगड़ी कि पूरे दूसरे साल बातचीत तो दूर, हेलो तक नहीं हुई। अब तीसरे साल में जाकर कुछ सुधार था कि-



दृश्य-2



उसी रात मेस में मुझसे एक दोस्त ने पूछा-



विपिन के फादर का पता चला?



हां यार, बीमार हैं। विपिन घर तो गया है।



याने तुम्हें नही पता, ही इज नो मोर।



वॉट? कैसे?



एक्सीडेंट..... विपिन से ये बात छुपाई गयी है, ताकि घर सही से जा सके।



दृश्य-3



कानपुर का भैरोंघाट काफ़ी व्यस्त श्मशान है। एक ज़िम्मेदार प्रबंधक जीन्स-टी-शर्ट धारी, आँखों पर सेलेब्रिटी वाले चश्मे और कानों में सेलफोन का हैंडस्फ्री लगाए हुए नमूदार होते हैं। आनन फानन में आखरी रस्में निबटा कर मुखाग्नि दी गयी।



इसी बीच मैं कभी सबसे अलग, कभी सबके साथ रहकर भी एकांत में था। क्रूर मन भावुकता से उठकर दार्शनिकता की ओर चल पड़ा था। जिधर देखो उधर जलती चिताएँ, अंतिम संस्कार हेतु प्रतीक्षारत चार-पाँच शव, और तमाशबीनो की भीड़।



पास में एक चिता की ओर दृष्टि गयी। लकड़ियों से बाहर एक पैर निकला हुआ है। अचानक पंजा शरीर से अलग होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। निर्विकार चांडाल के हाथों ने उसे इतमीनान से सहेजकर पुनः अग्निसेज पर रख दिया।



एक दूसरी चिता आधी जल चुकी है। संबंधी घर जा चुके हैं। सहसा चांडाल आधी जली लाश को बाँस से गंगा में प्रवाहित कर देता है। लो एक वेटिंग तो क्लियर हुई। एक चिता और सजती है।



थोड़ी दूर पर अंतिम स्नान के लिए एक सात-आठ वर्ष के बालक का शव है। पंडित टोकते हैं- ऐसे नहीं, वैसे!



लेकिन आश्चर्यजनक! कहीं क्रंदन या विलाप की ध्वनि नहीं सुनाई पड़ती। शायद मैं चेतनाशून्य हो रहा हूँ।



नहीं मैं पूर्णतया चेतनावस्था में हूँ पंडित कम हैं, लाशें ज्यादा



लकड़ी का स्टॉक ख़तम हो रहा है। चार मन से ज़्यादा नहीं मिल पाएगी।



सूर्यास्त में मात्र आधे घंटे शेष हैं, कैसे हो पाएगा? रिश्तेदारों को भी जल्दी है।



लो लकड़ियाँ गीली हैं। आग नही पकड़ रहीं। फ़ुरसत ही कहाँ है किसी के पास रोने के लिए!



सोचता हूँ, क्या यही है जीवन का सौंदर्य? क्यों कहा गोस्वामी जी ने-'बड़े भाग मानुस तन पावा' जब चार मन लकड़ी और साढ़े तीन सेर घी ही अंतिम नियति है तो क्या अचीवेमेंट्स और क्या यश-पद-धन?



इतने मशीनी ढंग से सब कुछ घट रहा है, तो मानवीय संवेदनाएँ कहाँ मृत हो गयी हैं?और अगर नहीं मृत हुई हैं तो भी उनका मूल्य ही क्या है?



पास में गीता बाँच रहे एक पंडित की आवाज़ कानों में पड़ती है-



" ना त्वम शोचितुमर्हसि "

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    पूर्वांचल के एक छोटे से ज़िले महराजगंज के एक गाँव मे खालिस किसान परिवार में जन्मा..., बरेली --> दिल्ली, India

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